सदर्भ:
हाल ही में 'विश्व असमानता लैब' (World Inequality Lab-WIL) द्वारा जारी एक शोध पत्र, "भारत में भूमि असमानता: प्रकृति, इतिहास और बाजार", ने ग्रामीण भारत में भूमि स्वामित्व में असमानता के आंकड़ों को उजागर किया है। यह रिपोर्ट न केवल आर्थिक असमानता को दर्शाती है, बल्कि भारत के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ग्रामीण भूमि का वितरण अत्यधिक विषम है:
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- केंद्रीकरण: शीर्ष 10% ग्रामीण परिवारों के पास कुल भूमि का 44% हिस्सा है। वहीं, शीर्ष 1% के पास 18% और शीर्ष 5% के पास 32% भूमि संचित है।
- भूमिहीनता की स्थिति: भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 46% परिवार भूमिहीन हैं। पंजाब जैसे कृषि-समृद्ध राज्य में भूमिहीनता की दर सबसे अधिक (73%) है।
- गाँव स्तर का विश्लेषण: औसतन, एक गाँव के सबसे बड़े भूस्वामी के पास गाँव की कुल भूमि का 12.4% हिस्सा होता है। कुछ मामलों (3.8% गाँवों) में, एक ही व्यक्ति आधी से अधिक भूमि का स्वामी है।
- केंद्रीकरण: शीर्ष 10% ग्रामीण परिवारों के पास कुल भूमि का 44% हिस्सा है। वहीं, शीर्ष 1% के पास 18% और शीर्ष 5% के पास 32% भूमि संचित है।
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असमानता के ऐतिहासिक और संरचनात्मक कारक:
रिपोर्ट इस असमानता के पीछे तीन मुख्य कारणों को रेखांकित करती है:
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- औपनिवेशिक विरासत (Colonial Legacy): अध्ययन से पता चलता है कि जिन क्षेत्रों में ब्रिटिश काल के दौरान 'ज़मींदारी व्यवस्था' (जहाँ ज़मींदार कर वसूलते थे और भूमि के मालिक थे) लागू थी, वहाँ आज भी उन क्षेत्रों की तुलना में अधिक असमानता है जहाँ 'रैयतवाड़ी' या 'रियासतें' थीं। ऐतिहासिक संस्थागत व्यवस्थाओं का प्रभाव आज भी भूमि वितरण पर हावी है।
- जाति और सामाजिक पदानुक्रम: भूमि स्वामित्व और सामाजिक स्थिति के बीच गहरा संबंध है। जिन गाँवों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी अधिक है, वहाँ भूमिहीनता और भूमि के छोटे आकार की समस्या अधिक गंभीर है। उच्च जातियों का भूमि पर ऐतिहासिक वर्चस्व आज भी कायम है।
- कृषि-पारिस्थितिकी (Agro-ecology): उपजाऊ और संसाधनों से संपन्न क्षेत्रों में भूमि का संकेंद्रण अधिक देखा गया है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से शक्तिशाली समूहों ने लाभप्रद संपत्तियों पर अपना नियंत्रण मजबूत किया।
- औपनिवेशिक विरासत (Colonial Legacy): अध्ययन से पता चलता है कि जिन क्षेत्रों में ब्रिटिश काल के दौरान 'ज़मींदारी व्यवस्था' (जहाँ ज़मींदार कर वसूलते थे और भूमि के मालिक थे) लागू थी, वहाँ आज भी उन क्षेत्रों की तुलना में अधिक असमानता है जहाँ 'रैयतवाड़ी' या 'रियासतें' थीं। ऐतिहासिक संस्थागत व्यवस्थाओं का प्रभाव आज भी भूमि वितरण पर हावी है।
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राज्य-वार प्रदर्शन:
भूमि असमानता के मामले में भारत के राज्यों में भारी विविधता है:
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- उच्च असमानता वाले राज्य: केरल (गिनी गुणांक 90), बिहार, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भूमि वितरण सबसे अधिक असमान है।
- कम असमानता वाले राज्य: कर्नाटक और राजस्थान जैसे राज्यों में भूमि वितरण तुलनात्मक रूप से अधिक संतुलित है (गिनी गुणांक 65 से कम)।
- उच्च असमानता वाले राज्य: केरल (गिनी गुणांक 90), बिहार, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भूमि वितरण सबसे अधिक असमान है।
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भूमि सुधारों की समीक्षा:
स्वतंत्रता के बाद भारत ने मध्यस्थों के उन्मूलन, जोत की सीमा (Land Ceiling) और चकबंदी जैसे भूमि सुधार लागू किए। हालाँकि, यह रिपोर्ट उनकी सीमाओं को उजागर करती है:
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- क्रियान्वयन में कमी: 'सीलिंग एक्ट' को बेनामी संपत्ति हस्तांतरण और कानूनी खामियों के कारण प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका।
- बाजार की भूमिका: आधुनिक बुनियादी ढांचे और सिंचाई सुविधाओं के विकास ने भूमि के मूल्य को बढ़ाया है, जिससे बड़े भूस्वामियों की संपत्ति में और वृद्धि हुई है, जबकि सीमांत किसान बाजार की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए हैं।
- डिजिटलीकरण की चुनौती: भूमि रिकॉर्ड के आधुनिकीकरण के बावजूद, वास्तविक स्वामित्व और कब्जे (possession) के बीच का अंतर अभी भी एक बड़ी बाधा है।
- क्रियान्वयन में कमी: 'सीलिंग एक्ट' को बेनामी संपत्ति हस्तांतरण और कानूनी खामियों के कारण प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका।
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आगे की राह:
भूमि केवल एक आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और गरिमा का साधन है। इस असमानता को दूर करने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:
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- प्रभावी भूमि सीमा कानून: राज्य सरकारों को भूमि सीमा कानूनों की समीक्षा करनी चाहिए और अधिशेष भूमि को वास्तव में भूमिहीनों में वितरित करना चाहिए।
- सहकारी खेती (Cooperative Farming): छोटे और सीमांत किसानों को सामूहिक खेती के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि वे संसाधनों और बाजार का बेहतर लाभ उठा सकें।
- सामाजिक समावेशन: भूमि आवंटन नीतियों में हाशिए पर रहने वाले समुदायों (SC/ST) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- पारदर्शी डेटा: 'डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स आधुनिकीकरण कार्यक्रम' (DILRMP) को और अधिक पारदर्शी और समावेशी बनाने की आवश्यकता है।
- प्रभावी भूमि सीमा कानून: राज्य सरकारों को भूमि सीमा कानूनों की समीक्षा करनी चाहिए और अधिशेष भूमि को वास्तव में भूमिहीनों में वितरित करना चाहिए।
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निष्कर्ष:
भूमि असमानता भारत में केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के लिए एक चुनौती है। यदि भारत को "समावेशी विकास" के लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो उसे भूमि सुधारों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा।

