संदर्भ:
हाल ही में केंद्रीय जल आयोग (CWC) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 178 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल उपयोगी भंडारण क्षमता का लगभग 70% है। यह पिछले 10 वर्षों के औसत 76.62% से कम है और वर्ष 2025 की इसी अवधि में दर्ज 79% की तुलना में भी कम है। यह स्थिति महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में सूखा घोषित किए जाने के बीच और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्षेत्रवार जल भंडारण की स्थिति:
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- दक्षिण भारत में जल भंडारण का दबाव सबसे अधिक है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का केवल 50% (27.926 BCM) जल भंडारित है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 87.25% था। 28 सितंबर तक इस क्षेत्र में सामान्य से 23% कम वर्षा दर्ज की गई है।
- उत्तर भारत में हिमाचल प्रदेश, पंजाब और राजस्थान के जलाशयों में लगभग 62% (12.431 BCM) जल भंडारण है, जो पिछले वर्ष के 92.3% की तुलना में काफी कम है।
- पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के 31 जलाशयों में लगभग 73% (16.157 BCM) जल भंडारण है। इस क्षेत्र में मौसमी वर्षा में लगभग 25% की कमी रही है। हालांकि, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही है।
- गुजरात, महाराष्ट्र और गोवा के जलाशयों में लगभग 84.61% जल भंडारण है, जबकि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के जलाशयों में लगभग 85.55% भंडारण है। दोनों क्षेत्रों में जल भंडारण का स्तर वर्ष 2025 की इसी अवधि की तुलना में कम है।
- दक्षिण भारत में जल भंडारण का दबाव सबसे अधिक है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का केवल 50% (27.926 BCM) जल भंडारित है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 87.25% था। 28 सितंबर तक इस क्षेत्र में सामान्य से 23% कम वर्षा दर्ज की गई है।
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मानसून में कमी और अल नीनो:
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- 28 सितंबर तक भारत में सामान्य से लगभग 12% कम वर्षा हुई है। जून में वर्षा में 35.4% की बड़ी कमी दर्ज की गई, जबकि अगस्त में 16.3% की कमी रही। 1 से 28 सितंबर के बीच वर्षा में लगभग 5% की कमी दर्ज की गई।
- अल नीनो (El Niño) एक ऐसी आवधिक जलवायु घटना है, जिसमें उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि होती है। इसके मजबूत होने को अनियमित वर्षा और लंबे समय तक रहने वाले शुष्क दौर से जोड़ा गया है। हालांकि, भारत का मानसून कई समुद्री और वायुमंडलीय कारकों से प्रभावित होता है। इसलिए केवल अल नीनो को क्षेत्रीय वर्षा में होने वाली विविधता का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता।
- 28 सितंबर तक भारत में सामान्य से लगभग 12% कम वर्षा हुई है। जून में वर्षा में 35.4% की बड़ी कमी दर्ज की गई, जबकि अगस्त में 16.3% की कमी रही। 1 से 28 सितंबर के बीच वर्षा में लगभग 5% की कमी दर्ज की गई।
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जलाशयों में जल भंडारण क्यों महत्वपूर्ण है?
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- दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की वार्षिक वर्षा में 70% से अधिक योगदान देता है और उन जलाशयों को भरता है जो निम्नलिखित आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:
- पेयजल की आपूर्ति
- सिंचाई और कृषि
- जलविद्युत उत्पादन
- औद्योगिक आवश्यकताएँ
- भूजल पुनर्भरण
- पेयजल की आपूर्ति
- इसलिए मानसून के अंत में जलाशयों में जल स्तर कम होने से शुष्क मौसम के दौरान कृषि, पेयजल और ऊर्जा संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।
- दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की वार्षिक वर्षा में 70% से अधिक योगदान देता है और उन जलाशयों को भरता है जो निम्नलिखित आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:
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प्रमुख चिंताएँ:
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- वर्तमान स्थिति भारत की जलवैज्ञानिक सूखा (Hydrological Drought) के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है। इसके साथ ही वर्षा का असमान वितरण, भूजल का अत्यधिक दोहन, सिंचाई में अक्षमता और अधिक पानी वाली फसलों का बढ़ता प्रचलन भी प्रमुख चिंताएँ हैं।
- सतही जल की उपलब्धता कम होने से भूजल पर निर्भरता और उसका दोहन बढ़ सकता है। इससे अंतर्राज्यीय जल विवादों की स्थिति भी और गंभीर हो सकती है।
- वर्तमान स्थिति भारत की जलवैज्ञानिक सूखा (Hydrological Drought) के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है। इसके साथ ही वर्षा का असमान वितरण, भूजल का अत्यधिक दोहन, सिंचाई में अक्षमता और अधिक पानी वाली फसलों का बढ़ता प्रचलन भी प्रमुख चिंताएँ हैं।
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आगे की राह:
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- भारत को एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (Integrated Water Resource Management) को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इसके लिए नदी-घाटी आधारित योजना, वर्षा जल संचयन, जलग्रहण क्षेत्र का विकास और भूजल पुनर्भरण जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं।
- इसके अलावा, सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण, सूखा-रोधी फसलों और जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देकर पानी की मांग को कम किया जा सकता है। जलाशयों की वास्तविक समय में निगरानी तथा केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है।
- भारत को एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (Integrated Water Resource Management) को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इसके लिए नदी-घाटी आधारित योजना, वर्षा जल संचयन, जलग्रहण क्षेत्र का विकास और भूजल पुनर्भरण जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं।
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निष्कर्ष:
वर्ष 2026 में जलाशयों की स्थिति यह दर्शाती है कि भारत की जल चुनौती केवल कितनी वर्षा हुई, इस पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वर्षा कब हुई, कहाँ हुई और उपलब्ध जल का कितनी कुशलता से प्रबंधन किया गया, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। दीर्घकालिक जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जलवायु-अनुकूल, एकीकृत और टिकाऊ जल प्रबंधन प्रणाली विकसित करना आवश्यक है।

