होम > Blog

Blog / 07 Mar 2026

तिरुमंगई आलवार की कांस्य प्रतिमा की भारत वापसी | सांस्कृतिक विरासत संरक्षण

संदर्भ:
हाल ही में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एश्मोलियन म्यूज़ियम (Ashmolean Museum) ने 16वीं शताब्दी की संत तिरुमंगई आलवार की एक कांस्य प्रतिमा भारत को वापस सौंप दी है। यह प्रतिमा अब तमिलनाडु के थाडिकोंबू स्थित श्री
सौंदराराजा पेरुमल मंदिर में पुनः स्थापित की जाएगी, जहां से यह मूल रूप से संबंधित है। इस कांस्य प्रतिमा को संग्रहालय ने वर्ष 1967 में सोथेबी (Sotheby’s) नीलामी से खरीदा था।

संत तिरुमंगई आलवार के बारे में-

संत तिरुमंगई आलवार दक्षिण भारत के बारह आलवार संतों में से एक थे, जो वैष्णव भक्ति परंपरा से जुड़े थे। उन्हें आलवार संतों में अंतिम और सबसे अधिक रचनाएँ करने वाला संत माना जाता है। वे भगवान विष्णु के प्रति अपनी अगाथ भक्ति और भक्ति साहित्य में योगदान के लिए प्रसिद्ध थे।

  • उनका जीवनकाल लगभग 8वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास माना जाता है।
  • प्रारंभ में वे कालियन (Kaliyan) नामक एक सैन्य कमांडर थे, जो बाद में विष्णु के भक्त संत बन गए।
  • उन्होंने कई भक्ति स्तोत्रों की रचना की, जो दिव्य प्रबंधम (Divya Prabandham) का हिस्सा हैं। यह लगभग 4,000 तमिल भक्ति भजनों का संकलन है।
  • तिरुमंगई आलवार को श्रीरंगम मंदिर के विकास में योगदान देने का भी श्रेय दिया जाता है।  

    Tirumankai Alvar Dhyeya IAS

कांस्य प्रतिमा के बारे में-

यह कलाकृति संत तिरुमंगई आलवार की 16वीं शताब्दी की कांस्य प्रतिमा है, जो मूल रूप से तमिलनाडु के थाडिकोंबू स्थित श्री सौंदराराजा पेरुमल मंदिर से संबंधित है।

प्रतिमा की प्रमुख विशेषताएँ:

  • इसकी ऊँचाई लगभग 57–60 सेंटीमीटर है।
  • इसे पारंपरिक दक्षिण भारतीय कांस्य ढलाई तकनीक से बनाया गया है।
  • इसका उपयोग मंदिर के धार्मिक अनुष्ठानों और जुलूसों में किया जाता था।

प्रतिमा की वापसी की प्रक्रिया

प्रतिमा की प्रामाणिकता और मूल स्थान की पुष्टि के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुरोध पर एश्मोलियन म्यूज़ियम ने इसका वैज्ञानिक धातु परीक्षण (Metal Analysis) कराया।

जांच में प्रतिमा की उत्पत्ति प्रमाणित होने के बाद संग्रहालय ने इसे भारत को लौटाने पर सहमति जताई थी। इस प्रतिमा के हस्तांतरण का आधिकारिक समारोह लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में आयोजित किया गया, जिसके साथ ही इस कलाकृति की औपचारिक वापसी पूरी हुई।

प्रतिमा की वापसी का महत्व

1. सांस्कृतिक विरासत की पुनर्स्थापना
इस प्रतिमा की वापसी एक धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक को उसके मूल मंदिर में पुनः स्थापित करने का प्रतीक है।

2. कलाकृतियों की वापसी का वैश्विक अभियान
आज कई देश औपनिवेशिक काल या अवैध रूप से बाहर ले जाई गई कलाकृतियों को वापस लाने के प्रयास कर रहे हैं।

3. सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूती
यह घटना संग्रहालयों, विद्वानों और सरकारों के बीच सहयोग को दर्शाती है, जिससे सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।

4. मंदिर की प्राचीन मूर्तियों की सुरक्षा
यह मामला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और तमिलनाडु आइडल विंग CID जैसी संस्थाओं की भूमिका को भी रेखांकित करता है, जो चोरी हुई कलाकृतियों का पता लगाने में महत्वपूर्ण कार्य करती हैं।

निष्कर्ष

तिरुमंगई आलवार की कांस्य प्रतिमा की वापसी केवल एक कलाकृति की वापसी नहीं है, बल्कि यह आस्था से जुड़े एक पवित्र प्रतीक का उसके मूल पूजा स्थल से पुनर्मिलन है। यह घटना संग्रहालयों की नैतिक जिम्मेदारी और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व को भी उजागर करती है।

 

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj