होम > Blog

Blog / 23 Sep 2026

VRRR के माध्यम से RBI ने ₹71,971 करोड़ की तरलता अवशोषित की

संदर्भ:

हाल ही में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 22 सितंबर 2026 को एक दिवसीय परिवर्तनीय दर रिवर्स रेपो (Variable Rate Reverse Repo—VRRR) नीलामी के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली से ₹71,971 करोड़ की तरलता अवशोषित की। इस कदम का उद्देश्य अतिरिक्त तरलता का प्रबंधन करना और अल्पकालिक मुद्रा बाजार दरों को मौद्रिक नीति के अनुरूप बनाए रखना है।

VRRR क्या है?

      • परिवर्तनीय दर रिवर्स रेपो (VRRR) एक नीलामी-आधारित तरलता-अवशोषण उपकरण है, जिसके माध्यम से बैंक अपनी अतिरिक्त धनराशि को RBI के पास अस्थायी रूप से जमा करते हैं। इसमें ब्याज दर बाजार द्वारा निर्धारित होती है।
      • रिवर्स रेपो: बैंक RBI को धन उधार देते हैं।
      • VRRR: ब्याज दर नीलामी के माध्यम से निर्धारित होती है।
      • उद्देश्य: अतिरिक्त या अस्थायी तरलता को अवशोषित करना।

यह भारित औसत कॉल दर (Weighted Average Call Rate-WACR) को नीति रेपो दर के अनुरूप बनाए रखने में मदद करता है। RBI अपनी तरलता प्रबंधन व्यवस्था के तहत VRRR नीलामी का उपयोग करता रहा है।

RBI Absorbs ₹71,971 Crore Liquidity through VRRR

वर्तमान तरलता की स्थिति:

      • वर्तमान में बैंकिंग प्रणाली में लगभग ₹4.92 लाख करोड़ की अतिरिक्त तरलता होने का अनुमान है। इतनी अधिक तरलता से रातोंरात मुद्रा बाजार की ब्याज दरों पर नीचे की ओर दबाव पड़ सकता है और वे RBI द्वारा निर्धारित वांछित परिचालन स्तर से नीचे जा सकती हैं।
      • इसलिए RBI तरलता प्रबंधन उपकरणों का उपयोग करके वित्तीय परिस्थितियों में संतुलन और स्थिरता बनाए रखता है।

अतिरिक्त तरलता के कारण:

वर्तमान अतिरिक्त तरलता के प्रमुख कारण हैं:

      • FCNR(B) जमाओं में भारी वृद्धि: विदेशी मुद्रा अनिवासी (FCNR-B) जमाओं के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त विदेशी मुद्रा प्रवाह आया है।
      • RBI के साथ करेंसी स्वैप: इस प्रकार के परिचालन से बैंकों के पास उपलब्ध रुपये की तरलता में बदलाव हो सकता है।
      • सरकारी व्यय: महीने के अंत में वेतन, पेंशन और अन्य सरकारी भुगतानों पर होने वाला खर्च बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त तरलता डालता है।

RBI तरलता को क्यों अवशोषित कर रहा है?

      • मुद्रास्फीति पर नियंत्रण: अत्यधिक तरलता से ऋण और समग्र मांग में वृद्धि हो सकती है, जिससे मुद्रास्फीति संबंधी दबाव बढ़ सकता है।
      • मौद्रिक नीति का प्रभावी संचरण: तरलता प्रबंधन से अल्पकालिक बाजार ब्याज दरों को नीति दर के अनुरूप बनाए रखने में मदद मिलती है।
      • वित्तीय स्थिरता: यह अतिरिक्त धनराशि के अत्यधिक प्रवाह को रोकता है, जिससे बैंकों द्वारा सट्टात्मक या अधिक जोखिम वाले ऋण देने की प्रवृत्ति को नियंत्रित किया जा सकता है।
      • पूंजी प्रवाह का प्रबंधन: बड़े पैमाने पर पूंजी या विदेशी मुद्रा प्रवाह से रुपये की तरलता बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में RBI को अतिरिक्त तरलता को निष्फल (Sterilise) करने की आवश्यकता पड़ सकती है।

कानूनी और संस्थागत ढाँचा:

      • भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934
        • धारा 17: RBI के बैंकिंग और मौद्रिक परिचालन, जिसमें तरलता प्रबंधन संबंधी गतिविधियाँ शामिल हैं, के लिए वैधानिक ढाँचा प्रदान करती है।
        • धारा 42(1): RBI को अनुसूचित बैंकों के लिए नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio-CRR) निर्धारित करने का अधिकार देती है।
        • स्थायी जमा सुविधा (Standing Deposit Facility-SDF) को धारा 17 में संशोधन के माध्यम से सक्षम किया गया। सामान्य संपार्श्विक-आधारित रिवर्स रेपो परिचालन के विपरीत, SDF के माध्यम से RBI बिना किसी संपार्श्विक (Collateral) के तरलता अवशोषित कर सकता है।
      • बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949
        • धारा 24: वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio-SLR) के लिए वैधानिक ढाँचा प्रदान करती है, जिसके तहत बैंकों को निर्धारित मात्रा में तरल परिसंपत्तियाँ बनाए रखना आवश्यक है।

तरलता अवशोषण के प्रमुख उपकरण:

उपकरण

प्रकृति

तंत्र

SDF

एक दिवसीय

बैंक बिना संपार्श्विक के अपनी अतिरिक्त धनराशि RBI के पास जमा करते हैं

VRRR

अल्पकालिक

नीलामी के माध्यम से तरलता का अवशोषण

OMO Sales

दीर्घकालिक/स्थायी

RBI सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री करता है

CRR

संरचनात्मक

बैंक RBI के पास नकद आरक्षित रखते हैं

MSS

संरचनात्मक

विशेष प्रतिभूतियों के माध्यम से अतिरिक्त तरलता को अवशोषित किया जाता है

LAF कॉरिडोर के बारे में:

      • SDF: कॉरिडोर की निचली सीमा (Floor)
      • रेपो दर: केंद्रीय नीति दर
      • MSF: कॉरिडोर की ऊपरी सीमा (Ceiling)
      • RBI इस ढाँचे का उपयोग अल्पकालिक ब्याज दरों और बैंकिंग प्रणाली में तरलता की स्थिति को प्रभावित करने के लिए करता है।

भारत के लिए महत्व:

      • मूल्य स्थिरता बनाए रखने में सहायता।
      • मौद्रिक नीति के प्रभावी संचरण (Transmission) में सुधार।
      • मुद्रा बाजार में व्यवस्थित एवं सुचारु संचालन सुनिश्चित करना।
      • अत्यधिक अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करना।
      • तरलता प्रबंधन और ऋण की उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना।

निष्कर्ष:

RBI का VRRR परिचालन नीति रेपो दर में बदलाव किए बिना प्रणालीगत तरलता को सूक्ष्म रूप से समायोजित (Fine-tune) करने का उदाहरण है। ऐसे उपकरण मौद्रिक स्थिरता बनाए रखने, मौद्रिक नीति के प्रभावी संचरण और वित्तीय बाजारों के सुचारु संचालन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj