भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) मौद्रिक नीति समीक्षा
संदर्भ:
हाल ही में, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने वित्तीय वर्ष 2026-27 की अपनी पहली द्विमासिक बैठक के निर्णय घोषित किए। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और घरेलू मुद्रास्फीति के दबाव को ध्यान में रखते हुए, आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली समिति ने ‘तटस्थ’ (Neutral) नीति रुख अपनाया और रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का निर्णय लिया।
मुख्य नीतिगत दरें:
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दर का नाम |
वर्तमान स्थिति |
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रेपो रेट (Repo Rate) |
5.25% (अपरिवर्तित) |
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रिवर्स रेपो रेट (SDF) |
5.00% |
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बैंक दर (Bank Rate) |
5.50% |
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नकद आरक्षित अनुपात (CRR) |
3.00% |
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वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) |
18.00% |

प्रमुख आर्थिक अनुमान:
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- विकास दर (GDP Growth Forecast): आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 6.9% लगाया है। हालांकि यह पिछले वर्ष (7.6%) की तुलना में कम है, लेकिन वैश्विक मंदी के संकेतों के बावजूद भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। विकास दर में इस कमी का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष (अमेरिका-ईरान तनाव) के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आया व्यवधान है।
- मुद्रास्फीति (Inflation - CPI): वित्त वर्ष 2027 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति का अनुमान 4.6% रखा गया है।
- चुनौतियां: कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और खाद्य कीमतों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव।
- रणनीति: आरबीआई का लक्ष्य मुद्रास्फीति को 4% के मध्यम अवधि के लक्ष्य के करीब लाना है, जबकि विकास को भी समर्थन देना है।
- चुनौतियां: कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और खाद्य कीमतों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव।
- विकास दर (GDP Growth Forecast): आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 6.9% लगाया है। हालांकि यह पिछले वर्ष (7.6%) की तुलना में कम है, लेकिन वैश्विक मंदी के संकेतों के बावजूद भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। विकास दर में इस कमी का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष (अमेरिका-ईरान तनाव) के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आया व्यवधान है।
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प्रमुख नीतिगत सुधार:
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- व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business): आरबीआई ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए कार्यशील पूंजी तक पहुंच आसान बनाने के लिए TReDS (Trade Receivables Discounting System) पर उचित सावधानी (Due Diligence) की आवश्यकता को समाप्त करने का प्रस्ताव दिया है। यह कदम छोटे उद्यमियों को नकदी के संकट से उबारने में मदद करेगा।
- वित्तीय बाजार में समावेश: अब गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) और आवास वित्त कंपनियों (HFCs) को 'टर्म मनी मार्केट' में भाग लेने की अनुमति दी गई है। इससे वित्तीय प्रणाली में तरलता (Liquidity) बढ़ेगी और ऋण वितरण की प्रक्रिया मजबूत होगी।
- बैंकिंग सुधार: बैंकों के बोर्डों को अब दैनिक कार्यों के बजाय नीतिगत मामलों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी गई है। साथ ही, इन्वेस्टमेंट फ्लक्चुएशन रिजर्व (IFR) को बनाए रखने की अनिवार्यता को हटाने का प्रस्ताव है, जिससे बैंकों के पास परिचालन के लिए अधिक पूंजी उपलब्ध होगी।
- व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business): आरबीआई ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए कार्यशील पूंजी तक पहुंच आसान बनाने के लिए TReDS (Trade Receivables Discounting System) पर उचित सावधानी (Due Diligence) की आवश्यकता को समाप्त करने का प्रस्ताव दिया है। यह कदम छोटे उद्यमियों को नकदी के संकट से उबारने में मदद करेगा।
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मौद्रिक नीति समिति के बारे में:
मौद्रिक नीति समिति (MPC), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) का 6-सदस्यीय वैधानिक निकाय है, जो मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक विकास संतुलन के लिए रेपो जैसी नीतिगत दरें तय करता है। 2016 में गठित, यह वर्ष में कम से कम चार बार बैठक करती है।
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- गठन: 6 सदस्य- 3 RBI (गवर्नर सहित), 3 भारत सरकार द्वारा नियुक्त।
- अध्यक्ष: RBI गवर्नर।
- मुख्य कार्य: 4% (±2% सहनशीलता) मुद्रास्फीति प्राप्त करने के लिए नीतिगत दरें निर्धारित करना।
- निर्णय प्रक्रिया: प्रत्येक सदस्य का 1 वोट; टाई होने पर गवर्नर का निर्णायक वोट।
- महत्व: MPC भारत में मौद्रिक नीति में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्थिरता सुनिश्चित करती है।
- गठन: 6 सदस्य- 3 RBI (गवर्नर सहित), 3 भारत सरकार द्वारा नियुक्त।
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निष्कर्ष:
आरबीआई का 'तटस्थ' रुख यह दर्शाता है कि केंद्रीय बैंक अब केवल मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आर्थिक विकास की गति को भी बनाए रखना चाहता है। भविष्य की मौद्रिक नीति पूरी तरह से आने वाले डेटा और वैश्विक शांति की स्थिति पर निर्भर करेगी।
