संदर्भ:
हाल ही में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा कि भारत, प्रोजेक्ट कुशा के तहत एक स्वदेशी लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली विकसित करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य रूस की S-400 ट्रायम्फ और अमेरिका की MIM-104 पैट्रियट जैसी उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों की क्षमताओं की तरह स्वदेशी प्रणाली तैयार करना है।
प्रोजेक्ट कुशा के बारे में:
-
-
- प्रोजेक्ट कुशा एक स्वदेशी लंबी दूरी की सतह-से-आकाश मिसाइल (एसएएम) प्रणाली है, जिसे महत्वपूर्ण सैन्य और नागरिक परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए विकसित किया जा रहा है। इसका विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा किया जा रहा है। ईआर-एसएएम प्रणाली को लगभग 400 किलोमीटर तक की दूरी पर मौजूद हवाई खतरों को निष्क्रिय करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
- इस परियोजना में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड रडार प्रणालियों और संपूर्ण सिस्टम एकीकरण की जिम्मेदारी निभा रही है। यह प्रणाली भारतीय वायु सेना की एकीकृत वायु कमान एवं नियंत्रण प्रणाली (Integrated Air Command and Control System) से जुड़ी होगी, जिससे वास्तविक समय में लक्ष्य की पहचान, खतरे का मूल्यांकन और समन्वित सैन्य कार्रवाई संभव हो सकेगी।
- प्रोजेक्ट कुशा एक स्वदेशी लंबी दूरी की सतह-से-आकाश मिसाइल (एसएएम) प्रणाली है, जिसे महत्वपूर्ण सैन्य और नागरिक परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए विकसित किया जा रहा है। इसका विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा किया जा रहा है। ईआर-एसएएम प्रणाली को लगभग 400 किलोमीटर तक की दूरी पर मौजूद हवाई खतरों को निष्क्रिय करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
-

मुख्य विशेषताएँ:
-
-
- तीन-स्तरीय संरचना:
- इस प्रणाली में तीन प्रकार के इंटरसेप्टर (अवरोधक मिसाइल) शामिल हैं:
- एम1: लगभग 150 किलोमीटर की रेंज
- एम2: लगभग 250 किलोमीटर की रेंज
- एम3: लगभग 350–400 किलोमीटर की रेंज
- एम1: लगभग 150 किलोमीटर की रेंज
- यह बहु-स्तरीय ढाँचा अतिरिक्त सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जिससे किसी एक परत के विफल होने पर दूसरी परत प्रभावी भूमिका निभा सके। ये इंटरसेप्टर लड़ाकू विमानों, ड्रोन (यूएवी), क्रूज़ मिसाइलों, सटीक निर्देशित हथियारों तथा कुछ बैलिस्टिक खतरों को निशाना बनाने में सक्षम हैं। इनकी अधिकतम गति मैक 5.5 तक हो सकती है और अंतिम चरण में लक्ष्य को भेदने के लिए उन्नत सीकर तकनीक का उपयोग किया जाता है।
- इस प्रणाली में तीन प्रकार के इंटरसेप्टर (अवरोधक मिसाइल) शामिल हैं:
- रडार, सेंसर और नेटवर्क-केंद्रित युद्ध प्रणाली:
- प्रोजेक्ट कुशा में लंबी दूरी के निगरानी रडार, फायर-कंट्रोल रडार और कमांड नोड्स को एकीकृत किया गया है। यह प्रणाली ज़मीन, हवा और भविष्य में संभावित रूप से अंतरिक्ष आधारित स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं को एक साथ जोड़ती है।
- इस नेटवर्क-केंद्रित डिज़ाइन के कारण एक ही समय में कई लक्ष्यों की निगरानी, खतरों की स्वचालित प्राथमिकता तय करना और पूरे युद्ध क्षेत्र में समन्वित जवाबी कार्रवाई संभव हो पाती है। यह प्रणाली पूरी तरह से आईएसीसीएस के साथ एकीकृत होगी।
- प्रोजेक्ट कुशा में लंबी दूरी के निगरानी रडार, फायर-कंट्रोल रडार और कमांड नोड्स को एकीकृत किया गया है। यह प्रणाली ज़मीन, हवा और भविष्य में संभावित रूप से अंतरिक्ष आधारित स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं को एक साथ जोड़ती है।
- मिशन सुदर्शन चक्र का हिस्सा:
- प्रोजेक्ट कुशा, मिशन सुदर्शन चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मिशन वर्ष 2035 तक भारत के लिए बहु-स्तरीय वायु एवं मिसाइल रक्षा कवच विकसित करने की दीर्घकालिक योजना है।
- प्रोजेक्ट कुशा अन्य वायु रक्षा और मिसाइल रक्षा प्रणालियों के साथ मिलकर भारत की लंबी दूरी की सुरक्षा व्यवस्था का मुख्य आधार बनेगा।
- प्रोजेक्ट कुशा, मिशन सुदर्शन चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मिशन वर्ष 2035 तक भारत के लिए बहु-स्तरीय वायु एवं मिसाइल रक्षा कवच विकसित करने की दीर्घकालिक योजना है।
- तीन-स्तरीय संरचना:
-
प्रभाव और महत्व:
-
-
- वर्तमान में भारत रूस से आयातित एस-400 वायु रक्षा प्रणालियों पर निर्भर है। प्रोजेक्ट कुशा के सफल विकास और तैनाती से यह निर्भरता कम होगी।
- इससे भारत को स्वदेशी उत्पादन, सॉफ़्टवेयर और भविष्य के उन्नयन पर पूर्ण नियंत्रण मिलेगा, तैनाती में अधिक लचीलापन आएगा और भविष्य में निर्यात की संभावनाएँ भी खुलेंगी। साथ ही, भू-राजनीतिक दबावों और आपूर्ति शृंखला से जुड़ी सीमाओं में भी कमी आएगी।
- वर्तमान में भारत रूस से आयातित एस-400 वायु रक्षा प्रणालियों पर निर्भर है। प्रोजेक्ट कुशा के सफल विकास और तैनाती से यह निर्भरता कम होगी।
-
कुशा बनाम एस-400 बनाम पैट्रियट:
|
विशेषता |
प्रोजेक्ट कुशा |
एस-400 ट्रायम्फ |
एमआईएम-104 पैट्रियट |
|
मूल |
भारत |
रूस |
संयुक्त राज्य अमेरिका |
|
अधिकतम सीमा |
~400 किमी (एम3) |
400 किमी तक |
~160 km (वैरिएंट के हिसाब से अलग-अलग) |
|
केंद्र |
बहुस्तरीय हवाई रक्षा |
लंबी दूरी के बहु-लक्ष्य |
मजबूत बैलिस्टिक मिसाइल फोकस (PAC-3) |
|
एकीकरण |
आईएसीसीएस के साथ पूर्ण स्वदेशी एकीकरण |
आयातित प्रणाली |
नाटो-एकीकृत |
|
रणनीतिक नियंत्रण |
पूर्ण घरेलू नियंत्रण |
आपूर्तिकर्ता-निर्भर |
आपूर्तिकर्ता-निर्भर |
जहाँ एस-400 युद्ध में परखी जा चुकी प्रणाली है और पैट्रियट का भी व्यापक युद्ध अनुभव रहा है, वहीं प्रोजेक्ट कुशा भारत को सॉफ़्टवेयर पर पूर्ण नियंत्रण, बेहतर एकीकरण क्षमता और भविष्य में स्वतंत्र रूप से उन्नयन करने की सुविधा प्रदान करता है।
निष्कर्ष:
एम1, एम2 और एम3 इंटरसेप्टरों का चरणबद्ध परीक्षण जारी है और लगभग वर्ष 2030 तक इस प्रणाली को सशस्त्र बलों में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। मिसाइलों की तकनीकी क्षमता के साथ-साथ, प्रोजेक्ट कुशा की सफलता भारत की एकीकृत वायु रक्षा प्रणाली की समग्र मजबूती पर निर्भर करेगी। यह परियोजना रणनीतिक आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगी।
