संदर्भ:
हाल ही में, तमिलनाडु के पूंपुहार (कावेरीपूम्पट्टिनम) के तट से दूर किए गए नए जलमग्न पुरातात्विक उत्खनन से इसके व्यापक समुद्री संपर्कों के नए प्रमाण मिले हैं। तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग (TNSDA) ने इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी के सहयोग से पश्चिम एशिया के एक टॉरपीडो जार का टुकड़ा, मिट्टी के चार रिंग वेल (वृत्ताकार कुएँ) और 250 से अधिक मृद्भांड अवशेष प्राप्त किए हैं।
पूंपुहार के बारे में:
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- पूंपुहार तमिलनाडु के मयिलादुथुराई जिले में बंगाल की खाड़ी के तट पर कावेरी नदी के मुहाने पर स्थित है। यह प्रारंभिक चोलों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था और संगम तथा उत्तर-संगम साहित्य में इसका प्रमुख उल्लेख मिलता है।
- इस नगर को परंपरागत रूप से मरुवूरपक्कम, पट्टिनप्पक्कम और नालंगाडी में विभाजित किया गया था, जो इसके समुद्री, आवासीय और व्यापारिक स्वरूप को दर्शाते हैं।
- पूंपुहार तमिलनाडु के मयिलादुथुराई जिले में बंगाल की खाड़ी के तट पर कावेरी नदी के मुहाने पर स्थित है। यह प्रारंभिक चोलों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था और संगम तथा उत्तर-संगम साहित्य में इसका प्रमुख उल्लेख मिलता है।
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प्रमुख पुरातात्विक खोजें:
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- पश्चिम एशियाई टॉरपीडो जार का टुकड़ा मिलना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऐसे पात्रों का उपयोग समुद्री व्यापार मार्गों के माध्यम से शराब और तेल जैसे तरल पदार्थों के परिवहन के लिए किया जाता था। इसकी उपस्थिति से संकेत मिलता है कि पूंपुहार के पश्चिम एशिया तथा व्यापक हिंद महासागर–भूमध्यसागरीय व्यापार नेटवर्क के साथ संपर्क थे।
- समुद्र तल पर मिले चार रिंग वेल संभवतः एक पुराचैनल (Palaeochannel) के अस्तित्व का संकेत देते हैं। पुराचैनल से आशय किसी प्राचीन नदी की उस धारा से है, जो बाद में तटीय परिवर्तनों के कारण जलमग्न हो गई। चमकीले/ग्लेज्ड मृद्भांडों सहित 250 से अधिक मृद्भांड अवशेष मिलने से भी यहाँ व्यापारिक गतिविधियों के प्रमाण और मजबूत होते हैं।
- पश्चिम एशियाई टॉरपीडो जार का टुकड़ा मिलना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऐसे पात्रों का उपयोग समुद्री व्यापार मार्गों के माध्यम से शराब और तेल जैसे तरल पदार्थों के परिवहन के लिए किया जाता था। इसकी उपस्थिति से संकेत मिलता है कि पूंपुहार के पश्चिम एशिया तथा व्यापक हिंद महासागर–भूमध्यसागरीय व्यापार नेटवर्क के साथ संपर्क थे।
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चोल साम्राज्य के बारे में:
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- साम्राज्यवादी चोल (9वीं–13वीं शताब्दी ईस्वी) का उदय विजयालय चोल के अधीन हुआ, जिन्होंने लगभग 850 ईस्वी में तंजावुर पर अधिकार किया। राजराजा प्रथम ने चोल शक्ति का विस्तार किया और तंजावुर में बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। इसके बाद राजेंद्र प्रथम ने श्रीलंका में अभियानों तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय की ओर प्रसिद्ध नौसैनिक अभियान के माध्यम से साम्राज्य का और विस्तार किया।
- चोलों ने एक शक्तिशाली समुद्री क्षमता विकसित की, जिसने बंगाल की खाड़ी और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच व्यापार तथा सांस्कृतिक संपर्कों को बढ़ावा दिया।
- साम्राज्यवादी चोल (9वीं–13वीं शताब्दी ईस्वी) का उदय विजयालय चोल के अधीन हुआ, जिन्होंने लगभग 850 ईस्वी में तंजावुर पर अधिकार किया। राजराजा प्रथम ने चोल शक्ति का विस्तार किया और तंजावुर में बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। इसके बाद राजेंद्र प्रथम ने श्रीलंका में अभियानों तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय की ओर प्रसिद्ध नौसैनिक अभियान के माध्यम से साम्राज्य का और विस्तार किया।
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प्रशासन और अर्थव्यवस्था:
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- चोल प्रशासन अपनी विकसित स्थानीय संस्थाओं के लिए जाना जाता है। साम्राज्य को मुख्य रूप से इस प्रकार संगठित किया गया था: मंडलम्, वलनाडु, नाडु, गाँव
- उत्तरमेरूर अभिलेख ग्राम सभाओं और प्रतिनिधियों के चयन के लिए प्रयुक्त कुडवोलै प्रणाली के महत्वपूर्ण प्रमाण प्रदान करते हैं।
- कावेरी डेल्टा में विकसित व्यापक सिंचाई व्यवस्था ने कृषि को समर्थन दिया, जबकि भूमि राजस्व राज्य की आय का एक प्रमुख स्रोत था।
- चोल प्रशासन अपनी विकसित स्थानीय संस्थाओं के लिए जाना जाता है। साम्राज्य को मुख्य रूप से इस प्रकार संगठित किया गया था: मंडलम्, वलनाडु, नाडु, गाँव
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कला और वास्तुकला:
चोलों ने द्रविड़ मंदिर वास्तुकला, कांस्य मूर्तिकला और धार्मिक कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। बृहदेश्वर मंदिर तथा अन्य महान जीवंत चोल मंदिर (Great Living Chola Temples) इस काल की स्थापत्य और सांस्कृतिक उपलब्धियों को प्रदर्शित करते हैं।
भारत के लिए महत्व:
यह उत्खनन निम्नलिखित विषयों को समझने में मदद करता है:
प्राचीन हिंद महासागर व्यापार नेटवर्क
प्रारंभिक तमिल समुद्री इतिहास
चोलों की व्यापारिक और नौसैनिक गतिविधियाँ
प्राचीन नगरीकरण
तटीय और समुद्र-स्तर में होने वाले परिवर्तन
दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिम एशिया के साथ भारत के सांस्कृतिक संबंध
निष्कर्ष:
पूंपुहार में हुई जलमग्न पुरातात्विक खोजें भारत के समुद्री अतीत को समझने में समुद्री पुरातत्व (Marine Archaeology) के महत्व को दर्शाती हैं। कावेरीपूम्पट्टिनम के प्रारंभिक चोल बंदरगाह से लेकर बाद के साम्राज्यवादी चोलों के नौसैनिक विस्तार तक, तमिल क्षेत्र ने व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र के साथ भारत के व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जलमग्न विरासत की निरंतर वैज्ञानिक खोज और संरक्षण से भारत की समुद्री सभ्यता, व्यापारिक नेटवर्क और तटीय इतिहास की समझ को और गहरा किया जा सकता है।
