संदर्भ:
हाल ही में वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) इंडिया द्वारा प्रकाशित एक कार्यपत्र (Working Paper) में पाया गया है कि सर्दियों में कचरा जलाने की घटनाओं, जलाए जाने वाले कचरे की मात्रा और उससे होने वाले उत्सर्जन की दर गर्मियों की तुलना में तीन गुना तक अधिक हो सकती है। यह अध्ययन 2019 से 2026 के बीच भारत के 11 प्रदूषित शहरों में किए गए मैदानी सर्वेक्षणों पर आधारित है।
मुख्य निष्कर्ष:
- टियर-2 शहरों में सबसे अधिक मात्रा में कचरा जलाया गया। इन शहरों में कचरा जलाने की मात्रा गर्मियों में लगभग 21 टन प्रतिदिन से बढ़कर सर्दियों में 41 टन प्रतिदिन हो गई।
- टियर-3 शहरों में कचरा जलाने की घटनाओं की दर सबसे अधिक रही। सर्दियों के दौरान यहाँ लगभग 49.6 घटनाएँ प्रति वर्ग किलोमीटर प्रतिदिन दर्ज की गईं।
- गरीब इलाकों में कचरा जलाने की घटनाएँ काफी अधिक देखी गईं। टियर-2 शहरों के गरीब क्षेत्रों में लगभग 84 घटनाएँ प्रति वर्ग किलोमीटर प्रतिदिन दर्ज की गईं।
- कागज और प्लास्टिक जलाए जाने वाली प्रमुख सामग्रियों में शामिल थे।
- खुले में कचरा जलाने से अध्ययन किए गए शहरों में कुल शहरी PM2.5 और PM10 उत्सर्जन का 1% से भी कम हिस्सा उत्पन्न हुआ। हालांकि, इसका प्रभाव स्थानीय स्तर पर काफी गंभीर हो सकता है, क्योंकि कचरा अक्सर घरों, सड़कों और कचरा डंपिंग स्थलों के पास जलाया जाता है।
सर्दियों में कचरा जलाने की घटनाएँ क्यों बढ़ जाती हैं?
सर्दियों में हवाएँ कमजोर होती हैं, वातावरण अधिक स्थिर रहता है और तापमान प्रतिलोमन (Temperature Inversion) की स्थिति बनती है। इन परिस्थितियों में प्रदूषकों का वातावरण में फैलाव सीमित हो जाता है और वे जमीन के पास जमा होने लगते हैं।
कचरा जलाने की घटनाएँ इसलिए भी बढ़ती हैं क्योंकि कुछ कमजोर और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लोग गर्मी पाने के लिए कचरे का उपयोग करते हैं। इसके अलावा, मौसमी कचरा निपटान की आदतें और अपर्याप्त नगरपालिका कचरा-संग्रह व्यवस्था भी खुले में कचरा जलाने को बढ़ावा देती हैं।
वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य पर प्रभाव:
खुले में कचरा जलाने से PM2.5, PM10, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और अन्य विषैले प्रदूषक निकलते हैं। प्लास्टिक और मिश्रित कचरे को जलाना विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है।
वायु प्रदूषण से श्वसन संबंधी बीमारियाँ, अस्थमा का बढ़ना, हृदय एवं रक्तवाहिका संबंधी रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों का कैंसर जैसी स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं।
हालाँकि खुले में कचरा जलाने का कुल शहरी उत्सर्जन में हिस्सा छोटा हो सकता है, लेकिन मानव बस्तियों के नजदीक होने के कारण इससे लोगों को कम समय में प्रदूषण की बहुत अधिक मात्रा का सामना करना पड़ सकता है।
सामाजिक-आर्थिक पहलू:
अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि प्रदूषण पर्यावरणीय असमानता (Environmental Inequality) का भी मुद्दा है।
गरीब समुदायों को अक्सर अपर्याप्त कचरा-संग्रह सेवाओं का सामना करना पड़ता है और वे कचरा डंपिंग स्थलों तथा कचरा जलाने वाले स्थानों के अधिक करीब रहते हैं। इसलिए केवल कानूनी कार्रवाई और निगरानी बढ़ाने से इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।
सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम:
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में कई उपाय शुरू किए हैं। इनमें “कचरा-संवेदनशील” (Waste-Sensitive) स्थलों की पहचान, निरीक्षण व्यवस्था को मजबूत करना, कचरा प्रबंधन कर्मचारियों को प्रशिक्षण देना और जागरूकता अभियान चलाना शामिल है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने भी कचरा प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने और कर्मचारियों को गर्मी पाने के लिए कचरा जलाने के विकल्प के रूप में हीटिंग सुविधाएँ उपलब्ध कराने पर जोर दिया है।
आगे की राह:
- घर-घर कचरा संग्रहण और स्रोत पर कचरे का पृथक्करण मजबूत किया जाए।
- वैज्ञानिक और विकेंद्रीकृत कचरा प्रसंस्करण का विस्तार किया जाए।
- बार-बार कचरा जलाए जाने वाले हॉटस्पॉट क्षेत्रों की पहचान और निगरानी की जाए।
- कमजोर और जरूरतमंद श्रमिकों के लिए सुरक्षित हीटिंग के विकल्प उपलब्ध कराए जाएँ।
- कड़े नियमों और कार्रवाई के साथ नगरपालिका सेवाओं में सुधार किया जाए।
- बेहतर निगरानी के लिए GIS और सैटेलाइट मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाए।
निष्कर्ष:
WRI का अध्ययन दर्शाता है कि सर्दियों में खुले में कचरा जलाना भले ही स्थानीय स्तर की समस्या हो, लेकिन यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण चिंता है।
इस समस्या से निपटने के लिए केवल मौसमी कार्रवाई या सर्दियों के दौरान अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है। इसके बजाय पूरे वर्ष वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन, मजबूत शहरी स्थानीय निकाय, सामाजिक सुरक्षा और टिकाऊ शहरी नियोजन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
