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Blog / 24 Oct 2026

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) में व्यापक बदलाव

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्र सरकार ने आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के स्वरूप और संरचना में बदलाव करने का निर्णय लिया है, ताकि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले श्रमिकों की पहचान की जा सके तथा अवैतनिक घरेलू कार्य, देखभाल संबंधी कार्य, स्वयंसेवी कार्य और प्रशिक्षु के रूप में किए जाने वाले कार्यों में भागीदारी का आकलन किया जा सके। ये बदलाव जनवरी 2027 से लागू होने निर्धारित हैं। इनका उद्देश्य भारत के श्रम संबंधी आँकड़ों को अधिक व्यापक बनाना और रोजगार के बदलते स्वरूपों का बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।

      • सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अंतर्गत राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) ने नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, शैक्षणिक संस्थानों और आम जनता से 23 अक्टूबर, 2026 से 15 दिनों के भीतर टिप्पणियाँ और सुझाव आमंत्रित किए हैं।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) में व्यापक बदलाव

पृष्ठभूमि:

      • पारंपरिक रोजगार आँकड़ों की कुछ सीमाएँ हैं, जिसके कारण गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के योगदान का सही आकलन नहीं हो पाता। इन श्रमिकों को अक्सर स्वरोजगार या आकस्मिक श्रमिकों जैसी व्यापक श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है। इसी प्रकार, खाना पकाने, सफाई करने, बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की देखभाल जैसी अवैतनिक घरेलू गतिविधियों को भी पारंपरिक रोजगार संकेतकों में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया जाता है।
      • आँकड़ों में यह अदृश्यता श्रम बल भागीदारी का सटीक आकलन करने, लैंगिक असमानताओं को समझने और लक्षित कल्याणकारी नीतियाँ बनाने में कठिनाइयाँ उत्पन्न करती है।
      • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 गिग श्रमिकों और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को मान्यता देती है तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक रूपरेखा उपलब्ध कराती है। ई-श्रम पोर्टल असंगठित श्रमिकों के पंजीकरण में सहायता करता है और उन्हें कल्याणकारी पहलों तक पहुँच प्रदान करने में मदद करता है। PLFS के बेहतर आँकड़े नीति-निर्माताओं को इन व्यवस्थाओं की पहुँच और प्रभावशीलता का आकलन करने में सहायता कर सकते हैं।

जनवरी 2027 से प्रस्तावित प्रमुख बदलाव:

      • प्रस्तावित सुधारों में नमूना चयन ढाँचे के अंतर्गत एक समर्पित द्वितीय चरण स्तर (Second Stage Stratum- SSS) की शुरुआत शामिल है, ताकि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले श्रमिकों वाले परिवारों की पहचान की जा सके। उपलब्ध अवधारणा-पत्र के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में चार और शहरी क्षेत्रों में पाँच स्तर निर्धारित किए जाएँगे।
      • संशोधित प्रश्नावलियों के माध्यम से ऐप-आधारित कार्यों में संलग्न परिवार के सदस्यों की सीधे पहचान की जाएगी। सर्वेक्षण में अवैतनिक घरेलू सेवाओं, देखभाल संबंधी कार्यों और स्वयं के उपयोग के लिए वस्तुओं के उत्पादन पर भी अधिक ध्यान दिया जाएगा। अतिरिक्त संकेतकों की सहायता से अल्परोजगार और श्रम के अपर्याप्त उपयोग का आकलन किया जा सकेगा, जिससे रोजगार की स्थितियों की अधिक व्यापक तस्वीर सामने आएगी।

भारत के लिए महत्त्व:

      • यह सुधार अवैतनिक देखभाल संबंधी कार्यों का दस्तावेजीकरण करके महिलाओं के आर्थिक योगदान को बेहतर ढंग से समझने में सहायता कर सकता है। ऐसे कार्य अक्सर महिलाओं की सवेतन रोजगार में भागीदारी को सीमित करते हैं।
      • गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों की बेहतर पहचान से उचित पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा और कार्य परिस्थितियों से संबंधित साक्ष्य-आधारित नीतियों को समर्थन मिल सकता है।
      • अधिक विश्वसनीय आँकड़े स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और ऐसे श्रमिकों के लिए पोर्टेबल कल्याणकारी लाभों को लक्षित करने में भी सुधार कर सकते हैं, जो बार-बार अपनी नौकरी या प्लेटफॉर्म बदलते हैं। समग्र रूप से, ये बदलाव साक्ष्य-आधारित शासन को मजबूत कर सकते हैं और रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा में मौजूद कमियों की पहचान करने में मदद कर सकते हैं।

चुनौतियाँ:

      • इस सुधार के क्रियान्वयन में गिग, प्लेटफॉर्म और अनौपचारिक रोजगार को एकसमान रूप से परिभाषित करने, अनियमित कार्य घंटों और आय के अनेक स्रोतों का आकलन करने तथा सवेतन रोजगार एवं अवैतनिक घरेलू गतिविधियों के बीच दोहरी गणना को रोकने जैसी कठिनाइयाँ सामने आ सकती हैं।
      • उत्तरदाताओं की निजता की रक्षा करना, सर्वेक्षण की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना और बेहतर आँकड़ों को वास्तविक कल्याणकारी लाभों में परिवर्तित करना भी आवश्यक होगा।

निष्कर्ष:

PLFS में प्रस्तावित व्यापक बदलाव भारत के श्रम बाजार को आधिकारिक आँकड़ों में बेहतर ढंग से दर्ज करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रोजगार और अवैतनिक देखभाल संबंधी कार्यों को मान्यता देकर यह सुधार लैंगिक संवेदनशील नीति-निर्माण, समावेशी विकास और लक्षित सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा दे सकता है। बेहतर मापन के साथ श्रम अधिकारों और कल्याणकारी नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक है, ताकि सार्थक परिणाम प्राप्त किए जा सकें।

 

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