संदर्भ:
हाल ही में लागू किए गए ‘द सुप्रीम कोर्ट (नंबर ऑफ जजेस) अमेंडमेंट ऑर्डिनेंस, 2026’ के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 (मुख्य न्यायाधीश सहित) कर दी गई है। इस अध्यादेश के बाद पाँच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति से न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यपालिका के साथ इसके संबंधों पर एक नई बहस छिड़ गई है।
अध्यादेश से जुड़े प्रमुख संवैधानिक प्रावधान:
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- अनुच्छेद 124(1): यह स्पष्ट करता है कि भारत का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा और संसद को कानून द्वारा न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है।
- अनुच्छेद 123: यह राष्ट्रपति को संसद के अवकाश (recess) के दौरान अध्यादेश जारी करने की शक्ति देता है, जो एक स्थायी कानून के समान ही प्रभावी होता है।
- अनुच्छेद 124(1): यह स्पष्ट करता है कि भारत का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा और संसद को कानून द्वारा न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है।
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नियुक्ति प्रक्रिया और उसके निहितार्थ:
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- मौजूदा रिक्तियाँ बनाम अध्यादेश निर्मित पद: जब यह अध्यादेश लागू किया गया, तब न्यायालय में स्वीकृत 34 पदों में से केवल 32 न्यायाधीश कार्यरत थे (2 पद पहले से खाली थे)।
- नौकरियों का अस्थायी स्वरूप: इन पाँच नियुक्तियों में से दो ने पहले से रिक्त पदों को भरा, लेकिन शेष तीन न्यायाधीश अध्यादेश द्वारा बनाए गए पदों पर आसीन हुए। ये तीन पद तभी तक बने रहेंगे, जब तक यह अध्यादेश प्रभावी रहता है या किसी स्थायी अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जाता।
- मौजूदा रिक्तियाँ बनाम अध्यादेश निर्मित पद: जब यह अध्यादेश लागू किया गया, तब न्यायालय में स्वीकृत 34 पदों में से केवल 32 न्यायाधीश कार्यरत थे (2 पद पहले से खाली थे)।
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प्रमुख चिंताएँ:
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- न्यायिक स्वतंत्रता: सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015) मामले में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को असंवैधानिक घोषित किया था, और नियुक्तियों में न्यायपालिका की प्रधानता को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना था। आलोचकों का तर्क है कि अध्यादेश के माध्यम से सृजित पदों पर न्यायाधीशों की नियुक्ति उन्हें ऐसी स्थिति में रखती है, जहाँ उनके पद अंततः संसद द्वारा अध्यादेश की पुष्टि पर निर्भर होते हैं, जिससे कार्यपालिका पर निर्भरता की धारणा उत्पन्न हो सकती है।
- कार्यकाल की सुरक्षा: यदि संसद अध्यादेश को कानून में परिवर्तित नहीं करती है, तो स्वीकृत न्यायाधीश संख्या पुनः 34 हो जाएगी। इससे उन न्यायाधीशों की स्थिति को लेकर एक अभूतपूर्व संवैधानिक प्रश्न उत्पन्न होता है जिनकी नियुक्ति अध्यादेश से सृजित पदों पर हुई है।
- संस्थागत निष्पक्षता की छवि: न्यायिक स्वतंत्रता केवल वास्तविक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि जनविश्वास भी महत्वपूर्ण है। यह संभावना कि न्यायाधीश ऐसे पदों पर कार्यरत हों जो विधायी स्वीकृति पर निर्भर हों, न्यायपालिका की कार्यपालिका से संस्थागत दूरी को लेकर चिंता पैदा कर सकती है।
- न्यायिक स्वतंत्रता: सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015) मामले में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को असंवैधानिक घोषित किया था, और नियुक्तियों में न्यायपालिका की प्रधानता को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना था। आलोचकों का तर्क है कि अध्यादेश के माध्यम से सृजित पदों पर न्यायाधीशों की नियुक्ति उन्हें ऐसी स्थिति में रखती है, जहाँ उनके पद अंततः संसद द्वारा अध्यादेश की पुष्टि पर निर्भर होते हैं, जिससे कार्यपालिका पर निर्भरता की धारणा उत्पन्न हो सकती है।
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पृष्ठभूमि:
राष्ट्रपति ने 16 मई 2026 को संविधान के अनुच्छेद 123 के अंतर्गत एक अध्यादेश जारी किया, जिसके द्वारा सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करते हुए सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 (भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित) कर दी गई।
न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
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- बढ़ता लंबित मामलों का बोझ: अप्रैल 2026 तक सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या 92,000 से अधिक हो गई थी, जिससे न्यायिक क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता स्पष्ट हुई।
- संवैधानिक पीठें: अनुच्छेद 145(3) के अनुसार संवैधानिक मामलों की सुनवाई के लिए कम से कम पाँच न्यायाधीशों की पीठ आवश्यक होती है। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से अधिक संवैधानिक पीठों का गठन संभव होता है।
- न्यायिक दक्षता में सुधार: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश प्रतिदिन अनेक मामलों की सुनवाई करते हैं। अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से कार्यभार कम होगा तथा निर्णयों की गुणवत्ता एवं गति में सुधार होगा।
- बढ़ता लंबित मामलों का बोझ: अप्रैल 2026 तक सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या 92,000 से अधिक हो गई थी, जिससे न्यायिक क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता स्पष्ट हुई।
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निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश संख्या में वृद्धि का उद्देश्य लंबित मामलों को कम करना और न्यायिक दक्षता को बढ़ाना है। किंतु अध्यादेश के माध्यम से न्यायिक पदों का सृजन न्यायिक स्वतंत्रता और कार्यकाल की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करता है। यद्यपि संसद इसे विधेयक द्वारा प्रतिस्थापित कर सकती है, यह प्रकरण न्यायिक संस्थानों की विश्वसनीयता बनाए रखने हेतु कार्यपालिका से स्पष्ट दूरी की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
