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Blog / 18 Feb 2026

ऑरेंज इकोनॉमी: भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक उत्थान का नया क्षितिज

सन्दर्भ:

इक्कीसवीं सदी की वैश्विक व्यवस्था में आर्थिक शक्ति का मापदंड अब केवल सेवा या औद्योगिक उत्पादन नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म, सांस्कृतिक प्रभाव और विचारों की गति भी है जो कल्पना, नवाचार और बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) के धरातल पर आकार ले रही है। इसी संदर्भ में 'ऑरेंज इकोनॉमी' (Orange Economy) की अवधारणा उभरकर आई है, जहाँ रचनात्मकता को आर्थिक विकास के मुख्य चालक के रूप में देखा जा रहा है।

      • भारत जैसे विविध और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र के लिए, ऑरेंज इकोनॉमी न केवल विकास का एक इंजन है, बल्कि यह अपनी 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) को वैश्विक स्तर पर सुदृढ़ करने का एक रणनीतिक माध्यम भी है। इसी महत्त्व को देखते हुए हाल में भारत सरकार ने केंद्रीय बजट 2026-27 में भारत की क्रिएटिव इंडस्ट्री को देश की सर्विस-लेड ग्रोथ स्ट्रैटेजी के केंद्र में रखा। यह पहली बार है जब सरकार ने इतनी साफ तौर पर ऑरेंज इकोनॉमी यानी क्रिएटिव इकोनॉमी को मुख्यधारा में लाने का संकेत दिया है।

ऑरेंज इकोनॉमी

ऑरेंज इकोनॉमी, जिसे सामान्यतः क्रिएटिव इकोनॉमीभी कहा जाता है, उन आर्थिक गतिविधियों का समूह है जो विचारों, ज्ञान, सांस्कृतिक पूंजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों पर आधारित होती हैं। इसमें फिल्म एवं संगीत उद्योग, एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग एवं कॉमिक्स (AVGC), डिजिटल कंटेंट निर्माण, डिजाइन एवं फैशन, विज्ञापन एवं प्रकाशन, सांस्कृतिक पर्यटन और लाइव एंटरटेनमेंट एवं मीडिया क्षेत्र शामिल हैं

इन क्षेत्रों में आर्थिक मूल्य का स्रोत भौतिक उत्पाद नहीं, बल्कि रचनात्मक अभिव्यक्तिहोती है अर्थात् यह अर्थव्यवस्था आइडिया-ड्रिवन” (Idea-driven) होती है, जहाँ कल्पना और नवाचार आर्थिक उत्पादन के मूल कारक बन जाते हैं।  वैश्विक स्तर पर, रचनात्मक उद्योग अब आर्थिक मुख्यधारा का हिस्सा बन चुके हैं, जो विभिन्न देशों की जीडीपी में 0.5% से लेकर 7% तक का योगदान दे रहे हैं।

ऑरेंज इकोनॉमी शब्द सबसे पहले कोलंबिया के पूर्व राष्ट्रपति इवान ड्यूक मार्केज और संस्कृति मंत्री फेलिपे बुइत्रागो ने दिया था। उन्होंने 2013 में अपनी किताब The Orange Economy: An Infinite Opportunity में इस कॉन्सेप्ट को विस्तार से समझाया। ऑरेंज रंग दुनियाभर में रचनात्मकता, संस्कृति और बदलाव का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि इस इकोनॉमी के लिए ऑरेंज शब्द चुना गया।

भारतीय संदर्भ में ऑरेंज इकोनॉमी का महत्व:

भारत की ऑरेंज इकोनॉमी कई कारणों से विशेष महत्व रखती है-

      • रोजगार सृजन का नया माध्यम- रचनात्मक उद्योगों में फिल्म निर्माण, गेमिंग, डिजाइन, डिजिटल मार्केटिंग और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में लाखों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होता है। यह क्षेत्र विशेष रूप से युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर प्रदान करता है।
      • सेवा क्षेत्र आधारित विकास- ऑरेंज इकोनॉमी सेवा क्षेत्र को गति प्रदान करती है, जिससे होटल, पर्यटन, विज्ञापन, लॉजिस्टिक्स और मीडिया जैसे सहायक क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं।
      • सॉफ्ट पावर का विस्तार- भारतीय सिनेमा, योग, भारतीय भोजन, शास्त्रीय संगीत एवं सांस्कृतिक उत्सव विश्व स्तर पर भारत की पहचान को सुदृढ़ करते हैं। इस प्रकार यह अर्थव्यवस्था आर्थिक विकास के साथ-साथ कूटनीतिक प्रभाव को भी बढ़ाती है।
      • निर्यात संवर्धन- डिजिटल प्लेटफॉर्म और OTT सेवाओं के माध्यम से भारतीय कंटेंट वैश्विक बाजारों तक पहुँच रहा है, जिससे सांस्कृतिक उत्पादों का निर्यात बढ़ रहा है।

मुख्य उद्योग रिपोर्टों (जैसे FICCI-EY रिपोर्ट) और सरकारी अनुमानों पर आधारित आंकड़ों के अनुसार भारतीय मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र का मूल्य 2024 में लगभग ₹2.5 ट्रिलियन आँका गया है, जिसके 2027 तक ₹3.067 ट्रिलियन तक पहुँचने का अनुमान है। यह क्षेत्र प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 1 करोड़ (10 मिलियन) से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है। कुल राजस्व का लगभग एक-तिहाई हिस्सा डिजिटल मीडिया से आता है, जो उत्पादन और वितरण के मॉडल को पूरी तरह बदल रहा है। ऑनलाइन गेमिंग (₹232 बिलियन), एनीमेशन और VFX (₹103 बिलियन) और लाइव इवेंट्स (₹100+ बिलियन) जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है।

ये सभी आंकड़े दर्शाते हैं कि रचनात्मकता अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि एक 'रणनीतिक क्षमता' बन गई है।

Orange Economy

ऑरेंज इकोनॉमी के प्रमुख स्तंभ:

ऑरेंज इकोनॉमी का सबसे तकनीकी और गतिशील हिस्सा AVGC-XR (Animation, Visual Effects, Gaming, Comics and Extended Reality) है।

      • एनीमेशन और VFX: भारत आज दुनिया के लिए एक वैश्विक उत्पादन आधार (Global Production Base) बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय फिल्मों, स्ट्रीमिंग कंटेंट और विज्ञापनों में भारतीय टीमों का योगदान लगातार बढ़ रहा है। भारतीय कलाकार और इंजीनियर जटिल वैश्विक वर्कफ्लो का हिस्सा हैं, जो भारत की तकनीकी गहराई को प्रदर्शित करता है।
      • गेमिंग उद्योग: भारत दुनिया के सबसे बड़े गेमिंग बाजारों में से एक बनकर उभरा है। यह अब केवल एक शौक नहीं, बल्कि एक सामाजिक स्थान बन गया है। मोबाइल उपकरणों की सुलभता ने गेमिंग को छोटे शहरों और गांवों तक पहुँचा दिया है, जिससे एक विशाल उपभोक्ता आधार तैयार हुआ है।

सरकार की नीतिगत पहल और संस्थागत ढांचा:

भारत सरकार ने ऑरेंज इकोनॉमी की क्षमता को पहचानते हुए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:

      • IICT (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीज): इसे एक राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (National Centre of Excellence) के रूप में स्थापित किया गया है। यह संस्थान प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और उद्योग के बीच की खाई को पाटने का काम करेगा।
      • शिक्षा और कौशल विकास: भविष्य की मांग को देखते हुए 15,000 माध्यमिक स्कूलों और 500 कॉलेजों में 'AVGC कंटेंट क्रिएटर लैब्स' स्थापित करने की योजना है। लक्ष्य यह है कि 2030 तक इस क्षेत्र के लिए आवश्यक 20 लाख पेशेवरों की फौज तैयार की जा सके।
      • WAVES (वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरटेनमेंट समिट): यह मंच क्रिएटर्स, स्टार्टअप्स और नीति निर्माताओं को एक साथ लाता है, जिससे विचारों का आदान-प्रदान और व्यापारिक निवेश संभव हो पाता है।
      • क्रिएट इन इंडिया चैलेंज: यह पहल स्थानीय प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें वैश्विक मंच प्रदान करने के लिए शुरू की गई है।

चुनौतियां:

यद्यपि भारत की ऑरेंज इकोनॉमी तीव्र गति से विकसित हो रही है, तथापि इसके समक्ष अनेक संरचनात्मक चुनौतियाँ विद्यमान हैं:

      • बौद्धिक संपदा संरक्षण (IP Protection): रचनात्मक उद्योगों, जैसे फिल्म, संगीत, एनीमेशन, गेमिंग एवं डिजिटल कंटेंट का प्रमुख आधार बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) होता है। किन्तु भारत में पायरेसी, अनधिकृत प्रतिलिपि निर्माण एवं कॉपीराइट उल्लंघन की घटनाएँ व्यापक हैं। इससे क्रिएटर्स को उनके कार्य का समुचित आर्थिक प्रतिफल नहीं मिल पाता, जिससे नवाचार एवं निवेश की प्रवृत्ति प्रभावित होती है। अतः एक सुदृढ़ कानूनी ढाँचा तथा प्रभावी प्रवर्तन तंत्र की आवश्यकता है।
      • कौशल अंतराल (Skill Gap): ऑरेंज इकोनॉमी का विस्तार कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग, ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) तथा वर्चुअल रियलिटी (VR) जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों पर निर्भर करता जा रहा है। हालांकि, वर्तमान शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रणाली इन तकनीकी परिवर्तनों के अनुरूप पर्याप्त रूप से अद्यतन नहीं है। परिणामस्वरूप उद्योग की आवश्यकताओं एवं उपलब्ध मानव संसाधन के कौशल के बीच असंगति उत्पन्न हो जाती है, जो उत्पादकता एवं प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करती है।
      • बुनियादी ढाँचा: रचनात्मक उद्योगों के विकास के लिए उच्च गति वाले इंटरनेट, डिजिटल उत्पादन उपकरण, रिकॉर्डिंग स्टूडियो, पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाएँ तथा डिज़ाइन लैब्स जैसे आधुनिक अवसंरचना की आवश्यकता होती है। किन्तु भारत में ऐसी सुविधाएँ मुख्यतः महानगरों तक सीमित हैं। ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इनका अभाव क्षेत्रीय असमानता को बढ़ाता है तथा प्रतिभाओं के समुचित उपयोग में बाधा उत्पन्न करता है।
      • पूंजी की कमी: रचनात्मक स्टार्टअप्स का प्रमुख निवेश बौद्धिक संपदा एवं रचनात्मक विचारों के रूप में होता है, न कि पारंपरिक भौतिक परिसंपत्तियों (जैसे भूमि या मशीनरी) के रूप में। इस कारण बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थाएँ उन्हें ऋण प्रदान करने में संकोच करती हैं, क्योंकि उनके पास गिरवी रखने हेतु ठोस संपत्ति का अभाव होता है। परिणामस्वरूप नवाचार-आधारित उद्यमों के लिए वित्तीय संसाधनों तक पहुँच सीमित हो जाती है।

आगे की राह:

      • ऑरेंज इकोनॉमी के सतत एवं समावेशी विकास के लिए एक सहयोगात्मक मॉडल अपनाना अत्यंत आवश्यक है, जिसमें सरकार, उद्योग और शैक्षणिक संस्थान मिलकर एक सशक्त इकोसिस्टमका निर्माण करें, ताकि नवाचार, कौशल विकास और उद्यमिता को संस्थागत समर्थन मिल सके। भारत में रचनात्मक उद्योगों के विस्तार के लिए शिक्षा, कौशल एवं संस्थागत ढाँचे में निवेश किया जा रहा है, जिससे प्रतिभा को वैश्विक बाजारों से जोड़ा जा सके।
      • इसके साथ ही, बेंगलुरु, हैदराबाद और मुंबई जैसे स्थापित रचनात्मक केंद्रों के अतिरिक्त टियर-2 एवं टियर-3 शहरों में क्रिएटिव क्लस्टर्सविकसित करना आवश्यक है, जिससे स्थानीय प्रतिभाओं को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सके और क्षेत्रीय असंतुलन को कम किया जा सके।
      • समावेशी विकास की दृष्टि से यह भी आवश्यक है कि ग्रामीण भारत की कला, शिल्प एवं सांस्कृतिक परंपराओं को रचनात्मक अर्थव्यवस्था में सम्मिलित किया जाए, ताकि वोकल फॉर लोकलपहल को वैश्विक पहचान मिल सके और स्थानीय सृजनात्मकता को अंतरराष्ट्रीय मंच प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी उभरती तकनीकों का उपयोग कलाकारों के प्रतिस्थापन के बजाय उनकी रचनात्मक क्षमता को सुदृढ़ करने हेतु किया जाना चाहिए, जिससे तकनीकी प्रगति और मानवीय सृजनशीलता के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।

निष्कर्ष:

ऑरेंज इकोनॉमी भारत के लिए 'विकसित भारत @ 2047' के सपने को साकार करने का एक अनिवार्य स्तंभ है। यह एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जो कभी खत्म न होने वाले संसाधन 'मानवीय कल्पना' पर आधारित है। भारत के लिए ऑरेंज इकोनॉमी केवल राजस्व का स्रोत नहीं है, बल्कि यह भारत की 'सॉफ्ट पावर' को बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है। हमारी फिल्में, संगीत, योग और सांस्कृतिक विरासत जब डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से दुनिया भर में पहुँचती हैं, तो वे भारत की एक सकारात्मक छवि निर्मित करती हैं। यह 'सांस्कृतिक कूटनीति' (Cultural Diplomacy) का एक आधुनिक रूप है, जो व्यापार और द्विपक्षीय संबंधों में भारत की शक्ति को बढ़ाता है।

 

UPSC/PCS मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न: ऑरेंज इकोनॉमी की अवधारणा क्या है? भारत में ऑरेंज इकोनॉमी के विकास हेतु सरकार द्वारा उठाए गए नीतिगत कदमों का मूल्यांकन कीजिए।