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Blog / 15 Jan 2026

भारत की ब्रिक्स (BRICS) अध्यक्षता 2026

सन्दर्भ: 

हाल ही में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के अंतर्गत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 का आधिकारिक लोगो, थीम और वेबसाइट लॉन्च किया।

भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली, इससे पहले ब्राज़ील ने 2025 में 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की थी।

ब्रिक्स (BRICS) के विषय में:

      BRICS उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक अंतरराष्ट्रीय समूह है, जिसमें प्रारंभ में ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन (BRIC) शामिल थे। यह शब्द 2001 में एक ब्रिटिश अर्थशास्त्री द्वारा इन देशों की तेज़ आर्थिक वृद्धि क्षमता को दर्शाने के लिए गढ़ा गया था।

      इस समूह को 2006 में औपचारिक रूप दिया गया और पहला BRIC शिखर सम्मेलन 2009 में आयोजित हुआ। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद यह समूह BRICS कहलाया।

हाल के वर्षों में सदस्यता का विस्तार हुआ है:

      2024: मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात पूर्ण सदस्य बने।

      2025: इंडोनेशिया समूह में शामिल हुआ।

भारत की अध्यक्षता: थीम और प्राथमिकताएँ:

भारत की अध्यक्षता में BRICS की थीम- लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण जो इस विश्वास को दर्शाती है कि BRICS देशों के बीच बढ़ा हुआ सहयोग साझा वैश्विक चुनौतियों से संतुलित, समावेशी और विकासोन्मुख तरीके से निपटने में मदद कर सकता है।

यह थीम क्षमता-वृद्धि , नवाचार-आधारित विकास और सतत विकास मार्गों के महत्व को रेखांकित करती है।

भारत की अध्यक्षता चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित होगी:

      लचीलापन : स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में संस्थागत एवं संरचनात्मक क्षमताओं को मजबूत करना।

      नवाचार : प्रौद्योगिकी, स्टार्टअप्स, MSMEs और उभरती तकनीकों में सहयोग को बढ़ावा देना ताकि सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का जन-केंद्रित समाधान किया जा सके।

      सहयोग : राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में सहयोग को सुदृढ़ करना, जिसमें जनसंपर्क भी शामिल हैं।

      स्थिरता : जलवायु कार्रवाई, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और ऐसे सतत विकास मार्गों को आगे बढ़ाना जो न्यायसंगत हों और राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप हों।

ब्रिक्स (BRICS )की बढ़ती प्रासंगिकता:

कई कारणों से BRICS का वैश्विक महत्व बढ़ा है:

      जनसांख्यिकीय भार: समूह अब दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे वैश्विक विमर्श में इसका प्रभाव बढ़ता है।

      ऊर्जा प्रभाव: प्रमुख तेल उत्पादक देशों के शामिल होने से वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों पर  ब्रिक्स ( BRICS )का असर बढ़ा है।

      संतुलनकारी भूमिका: उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अधिक न्यायसंगत और प्रतिनिधिक वैश्विक एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए गठबंधन बनाने का मंच मिलता है।

यह बढ़ती प्रासंगिकता ब्रिक्स (BRICS) को वैश्विक शासन में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की सामूहिक आवाज़ के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बनाती है, साथ ही विकास, व्यापार और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों से निपटने में भी सहायक है।

BRICS के भीतर विविधता और अंतर्विरोध

विस्तार के बावजूद BRICS एक असामान्य और जटिल गठबंधन बना हुआ है, क्योंकि इसके भीतर कई अंतर मौजूद हैं:

      राजनीतिक एवं आर्थिक विविधता: भारत और ब्राज़ील जैसे लोकतांत्रिक देश तथा चीन और रूस जैसे सत्तावादी तंत्रजिससे रणनीतिक प्राथमिकताओं में भिन्नता दिखती है।

      क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता: विशेषकर भारतचीन सीमा विवाद, जो समूह की आंतरिक गतिशीलता को प्रभावित करता है।

      मध्य पूर्व की जटिलताएँ: ईरान के सदस्य होने के बावजूद, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों की ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय रुख को लेकर अलग-अलग चिंताएँ हैं।

      भिन्न भू-राजनीतिक दृष्टिकोण: कुछ सदस्य पश्चिम-विरोधी विमर्श पर ज़ोर देते हैं, जबकि अन्य पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यावहारिक जुड़ाव अपनाते हैं।

ये अंतर्विरोध BRICS के लिए रणनीतिक और वैश्विक मुद्दों पर एकीकृत रुख अपनाने में चुनौती पेश करते हैं, भले ही समूह का प्रभाव लगातार बढ़ रहा हो।

निष्कर्ष:

2026 में भारत की BRICS अध्यक्षता, मानवता-प्रथम और जन-केंद्रित दृष्टिकोण से प्रेरित होकर, समूह को अधिक व्यावहारिक, उत्तरदायी और समावेशी बनाने का प्रयास है।

लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता को प्राथमिकता देकर भारत, दक्षिणदक्षिण सहयोग को गहरा करने, वैश्विक शासन को सुदृढ़ करने और एक जटिल व बहुध्रुवीय विश्व में समावेशी विकास को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता है।