संदर्भ:
हाल ही में, केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री ने राज्यसभा में बताया कि राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र (NCCR) के 1990–2022 के आकलन के आधार पर ओडिशा की 564 किमी लंबी तटरेखा का 28.3% हिस्सा कटाव का सामना कर रहा है।
कटाव क्या है?
कटाव एक भूवैज्ञानिक और भू-आकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें मिट्टी, चट्टान और पृथ्वी की अन्य सामग्रियाँ बहते पानी, हवा, हिमनदों और लहरों जैसे प्राकृतिक कारकों द्वारा घिसकर हटाई और परिवहन की जाती हैं।
कटाव को अपक्षय से अलग समझना महत्वपूर्ण है:
-
-
- अपक्षय: चट्टानों का अपने स्थान पर ही टूटना, जिसमें उनका परिवहन नहीं होता।
- कटाव: अपक्षयित पदार्थ को किसी सक्रिय कारक द्वारा हटाना और उसका परिवहन करना।
- अपक्षय: चट्टानों का अपने स्थान पर ही टूटना, जिसमें उनका परिवहन नहीं होता।
-
कटाव निम्नलिखित प्रकार का हो सकता है:
-
-
- भूवैज्ञानिक कटाव: धीमा, प्राकृतिक कटाव, जो सामान्यतः मिट्टी के निर्माण की दर के अनुरूप होता है।
- त्वरित कटाव: वनों की कटाई, अत्यधिक चराई और गलत कृषि पद्धतियों जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण होने वाला या तेज हुआ कटाव।
- भूवैज्ञानिक कटाव: धीमा, प्राकृतिक कटाव, जो सामान्यतः मिट्टी के निर्माण की दर के अनुरूप होता है।
-
मृदा और जल कटाव के प्रकार:
1. छींटा/वर्षाबूंद कटाव: वर्षा की बूंदें खुली सतह से मिट्टी के कणों को अलग कर देती हैं।
2. परत कटाव: सतही बहाव द्वारा ऊपरी मिट्टी की अपेक्षाकृत समान परत हटा दी जाती है।
3. रिल कटाव: केंद्रित बहाव से छोटी और उथली नालियाँ बनती हैं।
4. गली कटाव: रिल गहरी नालियों में विकसित हो जाते हैं, जिससे भूमि पर खेती करना कठिन हो जाता है। चंबल की बीहड़ भूमि इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
5. तटीय कटाव: लहरें, धाराएँ, ज्वार और तूफानी लहरें तटीय तलछट को हटा देती हैं, जिससे तटरेखा पीछे की ओर खिसकती है।
तटीय कटाव का विस्तार:
NCCR के आकलन से पता चलता है कि ओडिशा की 17.6% तटरेखा स्थिर है, जबकि 54.1% में अभिवृद्धि हो रही है। तटीय जिलों में जगतसिंहपुर सबसे अधिक कटाव-प्रवण है, जहाँ इसकी 47.6% तटरेखा प्रभावित है, इसके बाद गंजाम (45.7%) और केंद्रापड़ा (45%) हैं।
अन्य प्रभावित जिलों में बालासोर, पुरी और भद्रक शामिल हैं।
प्रमुख कारण:
तटीय कटाव प्राकृतिक और मानवजनित, दोनों कारकों से होता है:
-
-
- जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र-स्तर में वृद्धि
- चक्रवात, तूफानी लहरें, समुद्री लहरें और ज्वारीय गतिविधियाँ
- बंदरगाहों, हार्बर, समुद्री दीवारों और ब्रेकवाटर का निर्माण, जो तलछट के प्रवाह को बदल सकता है
- रेत खनन और अनियोजित तटीय बुनियादी ढाँचा
- तटीय तलछट की गतिशीलता में बदलाव
- जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र-स्तर में वृद्धि
-
बंगाल की खाड़ी के चक्रवातों और तूफानी लहरों के संपर्क में होने के कारण ओडिशा विशेष रूप से संवेदनशील है।
लोगों पर प्रभाव:
-
-
- तटीय कटाव आजीविका और विस्थापन की एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। सरकारी अधिकारियों ने बताया है कि समुद्र-स्तर में वृद्धि और कटाव के कारण केंद्रापड़ा के 16 गाँव पहले ही समुद्र में डूब चुके हैं, जिससे कई सौ लोग विस्थापित हुए हैं।
- गंजाम में पोडमपेटा, जहाँ कभी लगभग 500 परिवार रहते थे, समुद्र के अंदर बढ़ने के कारण वीरान हो गया है। इस तरह का विस्थापन केवल आवास को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि मछली पकड़ने, कृषि और आजीविका के अन्य साधनों को भी प्रभावित करता है।
- तटीय कटाव आजीविका और विस्थापन की एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। सरकारी अधिकारियों ने बताया है कि समुद्र-स्तर में वृद्धि और कटाव के कारण केंद्रापड़ा के 16 गाँव पहले ही समुद्र में डूब चुके हैं, जिससे कई सौ लोग विस्थापित हुए हैं।
-
सरकार द्वारा उठाए गए कदम:
-
-
- जियोटेक्सटाइल ट्यूब तटबंध: केंद्रापड़ा के पेंथा में रेत की घोल से भरी जियोटेक्सटाइल ट्यूबों का उपयोग तटीय सुरक्षा संरचनाओं के रूप में किया जा रहा है, ताकि लहरों की ऊर्जा को अवशोषित किया जा सके और कटाव को कम किया जा सके।
- समुद्री दीवार-सह-सर्विस रोड: बालासोर और गंजाम के संवेदनशील हिस्सों में ऐसी संरचनाएँ विकसित की जा रही हैं। इनमें तटीय सुरक्षा के साथ परिवहन और सार्वजनिक आवागमन की सुविधा भी शामिल है।
- जलवायु-आधारित पुनर्वास: ओडिशा ने केंद्रापड़ा में तटीय कटाव से विस्थापित लोगों के लिए एक पुनर्वास कॉलोनी स्थापित की है, जो नियोजित जलवायु अनुकूलन के महत्व को दर्शाती है।
- जियोटेक्सटाइल ट्यूब तटबंध: केंद्रापड़ा के पेंथा में रेत की घोल से भरी जियोटेक्सटाइल ट्यूबों का उपयोग तटीय सुरक्षा संरचनाओं के रूप में किया जा रहा है, ताकि लहरों की ऊर्जा को अवशोषित किया जा सके और कटाव को कम किया जा सके।
-
आगे की राह:
निष्कर्ष:
ओडिशा का तटीय कटाव दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन तेजी से मानव सुरक्षा और आजीविका का मुद्दा बनता जा रहा है। इसलिए प्रभावी तटीय प्रबंधन में विकास और पारिस्थितिक लचीलेपन के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है, साथ ही कमजोर समुदायों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक अनुकूलन सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

