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Blog / 29 Jun 2026

परमाणु-आधारित कॉपर–क्लोरीन (Cu–Cl) हाइड्रोजन उत्पादन सुविधा

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत ने विश्व की पहली परमाणु-आधारित कॉपरक्लोरीन (Copper–Chlorine: Cu–Cl) थर्मोकेमिकल चक्र पर आधारित हाइड्रोजन उत्पादन सुविधा का उद्घाटन किया है। यह संयंत्र फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (Fast Breeder Test Reactor - FBTR) से प्राप्त परमाणु प्रक्रिया ऊष्मा (Nuclear Process Heat) का उपयोग कर हाइड्रोजन का उत्पादन करता है। यह सुविधा इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR), कलपक्कम (तमिलनाडु) में स्थापित की गई है।

परियोजना के बारे में:

      • यह विश्व की पहली हाइड्रोजन उत्पादन सुविधा है, जो कॉपरक्लोरीन (Cu–Cl) थर्मोकेमिकल चक्र तथा परमाणु ऊष्मा का उपयोग करती है।
      • यह परियोजना आईजीसीएआर (IGCAR), कलपक्कम, तमिलनाडु में स्थापित की गई है।
      • इसका विकास परमाणु ऊर्जा विभाग (Department of Atomic Energy - DAE), भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) तथा आईजीसीएआर (IGCAR) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
      • यह परियोजना स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन एवं उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
      • यह सुविधा बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा से हाइड्रोजन उत्पादन की तकनीक को प्रदर्शित एवं सत्यापित (Technology Demonstrator) करने के उद्देश्य से विकसित की गई है।
      • यह भारत को निम्न-कार्बन (Low Carbon) ऊर्जा प्रणाली की ओर अग्रसर करने तथा दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में सहायक होगी।

India's Nuclear-Based Cu–Cl Hydrogen Facility

कॉपरक्लोरीन (Cu–Cl) थर्मोकेमिकल चक्र:

कॉपरक्लोरीन (Cu–Cl) थर्मोकेमिकल चक्र एक उन्नत तकनीक है, जिसके माध्यम से रासायनिक अभिक्रियाओं की श्रृंखला द्वारा जल (HO) को हाइड्रोजन (H) एवं ऑक्सीजन (O) में विभाजित किया जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ:

      • अन्य थर्मोकेमिकल चक्रों की तुलना में अपेक्षाकृत कम तापमान (लगभग 500°C) पर कार्य करता है।
      • इसमें ऊष्मा (Heat) तथा विद्युत (Electricity) दोनों का उपयोग किया जाता है।
      • यह बिना किसी कार्बन उत्सर्जन के हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) का उत्पादन करता है।
      • यह उन्नत परमाणु रिएक्टरों के साथ एकीकृत (Integrate) करने के लिए अत्यंत उपयुक्त है।

परमाणु ऊष्मा का उपयोग क्यों किया जाता है?

वर्तमान में अधिकांश हाइड्रोजन का उत्पादन जीवाश्म ईंधनों (Fossil Fuels) से किया जाता है, जिससे बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।

इसके विपरीत, परमाणु रिएक्टर निम्नलिखित लाभ प्रदान करते हैं-

      • निरंतर कार्बन-मुक्त विद्युत उत्पादन।
      • उच्च तापमान की प्रक्रिया ऊष्मा (High-Temperature Process Heat)
      • 24×7 विश्वसनीय संचालन।
      • बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन उत्पादन की क्षमता।

इसी कारण परमाणु ऊर्जा स्वच्छ एवं किफायती हाइड्रोजन उत्पादन का एक प्रभावी विकल्प मानी जाती है।

फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (FBTR) क्या है?

फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (FBTR) भारत का एक प्रायोगिक (Experimental) फास्ट ब्रीडर रिएक्टर है, जिसका संचालन इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) द्वारा किया जाता है।

प्रमुख तथ्य

      • स्थान कलपक्कम, तमिलनाडु
      • स्थापना (Commissioned) – 1985
      • ईंधन प्लूटोनियम-यूरेनियम कार्बाइड (Mixed Plutonium-Uranium Carbide Fuel)
      • शीतलक (Coolant) – तरल सोडियम (Liquid Sodium)
      • उद्देश्य भविष्य के फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों (Fast Breeder Reactors - FBRs) के लिए परीक्षण एवं अनुसंधान मंच के रूप में कार्य करना।

भारत के लिए महत्त्व:

1. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को गति

      • स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
      • आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम होगी।
      • ऊर्जा आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन मिलेगा।

2. डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonisation) में योगदान

      • कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के बिना हाइड्रोजन का उत्पादन।
      • इस्पात, उर्वरक एवं रिफाइनरी जैसे उद्योगों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने में सहायता।

3. ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना

      • स्वदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी का उपयोग।
      • भारत के स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों में विविधता का विस्तार।

4. वैश्विक तकनीकी नेतृत्व

      • इस तकनीक का सफल प्रदर्शन करने वाला भारत विश्व का पहला देश बना।
      • उन्नत परमाणु एवं हरित हाइड्रोजन प्रौद्योगिकी में भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा मजबूत होगी।

5. नेट-ज़ीरो (Net Zero) लक्ष्य की दिशा में कदम

यह तकनीक भारत की निम्नलिखित जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है-

      • कार्बन उत्सर्जन तीव्रता (Carbon Intensity) में कमी।
      • गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का विस्तार।
      • वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य।

प्रमुख चुनौतियाँ:

    • परियोजना की प्रारंभिक पूंजीगत लागत (Capital Cost) अत्यधिक है।
    • परमाणु ऊर्जा को लेकर जनसामान्य की सुरक्षा संबंधी चिंताएँ।
    • हाइड्रोजन के सुरक्षित भंडारण एवं परिवहन हेतु उन्नत अवसंरचना की आवश्यकता।
    • प्रदर्शन स्तर (Demonstration Scale) से व्यावसायिक स्तर (Commercial Scale) तक विस्तार की चुनौती।
    • कठोर नियामकीय (Regulatory) एवं सुरक्षा मानकों का पालन।

निष्कर्ष:

परमाणु ऊर्जा आधारित हाइड्रोजन उत्पादन, परमाणु ऊर्जा की विश्वसनीयता तथा हरित हाइड्रोजन की पर्यावरणीय स्थिरता का प्रभावी संयोजन प्रस्तुत करता है। कॉपर-क्लोरीन (Cu–Cl) थर्मोकेमिकल हाइड्रोजन उत्पादन सुविधा का सफल प्रदर्शन भारत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह न केवल देश की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा, बल्कि डीकार्बोनाइजेशन को गति देने, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को सशक्त बनाने तथा भारत को अगली पीढ़ी की स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में वैश्विक अग्रणी के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

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