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Blog / 12 Feb 2026

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव

संदर्भ:

हाल ही में कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन सहित विपक्षी दलों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस प्रस्तुत किया है। इस प्रस्ताव पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। विपक्ष का आरोप है कि बजट सत्र के दौरान अध्यक्ष का आचरण निष्पक्ष नहीं रहा। भारतीय संसदीय इतिहास में यह चौथा अवसर है जब लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ इस प्रकार का प्रस्ताव लाया गया है, जो इसकी गंभीरता को दर्शाता है।

हटाने का संवैधानिक आधार:

      • लोकसभा अध्यक्ष का पद संविधान के अनुच्छेद 93 के अंतर्गत स्थापित एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है। अध्यक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वे सदन की कार्यवाही को निष्पक्ष, संतुलित और नियमों के अनुरूप संचालित करें। संविधान के अनुच्छेद 94(ग) में अध्यक्ष को हटाने का प्रावधान किया गया है:
        • अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को लोकसभा द्वारा पारित एक प्रस्ताव के माध्यम से हटाया जा सकता है।
        • इस प्रस्ताव के पारित होने के लिए सदन के उस समय के कुल सदस्यों के बहुमत का समर्थन आवश्यक होता है।
        • यह प्रावधान केवल लोकसभा पर लागू होता है; राज्यसभा के सभापति के लिए अलग व्यवस्था है।
      • इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 94 के अनुसार अध्यक्ष निम्न परिस्थितियों में पद रिक्त करते हैं:
        • यदि वे लोकसभा की सदस्यता समाप्त कर देते हैं या उनकी सदस्यता समाप्त हो जाती है (94(क))
        • यदि वे उपाध्यक्ष को संबोधित लिखित इस्तीफा दे देते हैं (94(ख))
        • यदि लोकसभा द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से उन्हें हटा दिया जाता है (94(ग))

हटाने की प्रक्रिया:

      • यह प्रक्रिया लोकसभा की कार्यसंचालन नियमावली के नियम 200 से 203 के अंतर्गत निर्धारित की गई है:
        • नोटिस: अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव के लिए महासचिव को लिखित नोटिस दिया जाता है, जिस पर कम से कम दो सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। नोटिस देने के बाद कम से कम 14 दिनों की अवधि अनिवार्य है।
        • कार्यसूची में शामिल करना: निर्धारित नोटिस अवधि पूरी होने के बाद ही प्रस्ताव को सदन की कार्यसूची में सूचीबद्ध किया जाता है।
        • न्यूनतम समर्थन: प्रस्ताव पर विचार की अनुमति के लिए कम से कम 50 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है। यदि यह समर्थन नहीं मिलता, तो प्रस्ताव स्वतः निरस्त हो जाता है।
        • चर्चा और मतदान: यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो उसे 10 दिनों के भीतर चर्चा के लिए लिया जाता है। चर्चा केवल प्रस्ताव में उल्लिखित आरोपों तक सीमित रहती है। प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाले सदस्य को अधिकतम 15 मिनट बोलने की अनुमति होती है। प्रस्ताव पारित करने के लिए पूर्ण बहुमत आवश्यक होता है।

शर्तें और अध्यक्ष की भूमिका:

लोकसभा के कार्य संचालन और प्रक्रिया नियमों के नियम 200क (200A) के अनुसार प्रस्ताव स्पष्ट, विशिष्ट और तथ्यों पर आधारित होना चाहिए तथा उसमें मानहानिकारक या व्यंग्यात्मक अभिव्यक्तियाँ नहीं होनी चाहिए। अनुमति मांगते समय किसी प्रकार का भाषण नहीं दिया जाता। चर्चा के दौरान अध्यक्ष को अपना पक्ष रखने का अधिकार होता है, किंतु निष्पक्षता की परंपरा को बनाए रखने हेतु वे सामान्यतः पीठासीन नहीं होते। ओम बिरला ने भी इसी परंपरा का पालन किया। मतदान के संबंध में अध्यक्ष की भूमिका सीमित होती है और वे सामान्य परिस्थितियों में मतदान में भाग नहीं लेते।

निष्कर्ष:

लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव अत्यंत दुर्लभ घटनाएँ रही हैं। इससे पूर्व जी.वी. मावलंकर (1954), हुकम सिंह (1966) और बलराम जाखड़ (1987) के विरुद्ध ऐसे प्रस्ताव लाए गए थे, परंतु किसी भी मामले में अध्यक्ष को पद से नहीं हटाया गया। वर्तमान प्रस्ताव संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक जवाबदेही के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। इसका परिणाम भविष्य में अध्यक्ष के आचरण, निष्पक्षता की अपेक्षा तथा संसदीय मानकों को प्रभावित कर सकता है।