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Blog / 11 Feb 2026

नीति आयोग की ऊर्जा सुधार संबंधी रिपोर्ट

संदर्भ:

हाल ही में नीति आयोग द्वारा प्रकाशित अध्ययनविकसित भारत और नेट ज़ीरो की ओर परिदृश्य” (Scenarios Towards Viksit Bharat and Net Zero) में एक ऐसी परिकल्पना प्रस्तुत की गई है, जिसके अंतर्गत भारत वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य (Net-Zero) कार्बन उत्सर्जन प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित करता है। हालांकि, ये महत्वाकांक्षी लक्ष्य साहसिक ऊर्जा सुधारों, बड़े पैमाने पर निवेश तथा सामाजिक एवं संसाधन-आधारित समझौतों के संतुलित प्रबंधन पर निर्भर करते हैं।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:

      • रिपोर्ट दो संभावित मार्ग प्रस्तुत करती है:
        • वर्तमान नीतिगत परिदृश्य
        • नेट-ज़ीरो परिदृश्य
      • नेट-ज़ीरो परिदृश्य के अंतर्गत भारत की जीडीपी लगभग ग्यारह गुना तक बढ़ने की सम्भावना है, जबकि ऊर्जा मांग में अपेक्षाकृत सीमित वृद्धि होती है। यह आर्थिक वृद्धि और ऊर्जा उपभोग के बीच अलगाव (Decoupling) उन्नत ऊर्जा दक्षता, बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण तथा विभिन्न क्षेत्रों में परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के सिद्धांतों को अपनाने से संभव होता है।
        • विद्युत ऊर्जा संपूर्ण ऊर्जा तंत्र की आधारशिला बनकर उभर रही है और अंतिम ऊर्जा मांग में इसकी हिस्सेदारी नेट-ज़ीरो परिदृश्य में उल्लेखनीय रूप से बढ़ती है।
        • मध्य शताब्दी तक नवीकरणीय ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा विद्युत उत्पादन पर प्रभुत्व स्थापित कर लेते हैं, जबकि जीवाश्म ईंधनों की भूमिका 2070 तक सीमित रह जाती है।
        • हरित हाइड्रोजन, जैव-ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण जैसी स्वच्छ प्रौद्योगिकियाँ उन क्षेत्रों के डीकार्बोनाइजेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जहाँ उत्सर्जन कम करना कठिन है।
      • यह मार्ग प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत को मानव विकास की आवश्यकताओं के अनुरूप बढ़ने की अनुमति देता है, जबकि यह OECD देशों के स्तर से काफी नीचे बनी रहती है जो यह दर्शाता है कि उच्च आर्थिक विकास और उत्सर्जन नियंत्रण साथ-साथ संभव हैं।

प्रमुख चुनौतियाँ:

      • ऊर्जा संक्रमण का पैमाना अत्यंत व्यापक है। भारत को वर्ष 2070 तक लगभग 22.7 ट्रिलियन डॉलर के संचयी निवेश की आवश्यकता होगी, जिसमें से लगभग आधा निवेश विद्युत क्षेत्र में जाएगा। वार्षिक आधार पर यह लगभग 500 अरब डॉलर प्रति वर्ष के बराबर है, जो वर्तमान स्वच्छ-ऊर्जा निवेश स्तर से कहीं अधिक है।
        • वित्तीय अंतराल (Financing Gap): पूंजी बाजारों में संरचनात्मक सुधारों के बावजूद लगभग 6.5 ट्रिलियन डॉलर का वित्तीय अंतर बना रहेगा, जिसे मुख्यतः बाहरी वित्तपोषण से पूरा करना पड़ सकता है।
        • भूमि और जल की सीमाएँ: नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना और कृषि के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, विशेषकर जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में।
        • रोजगार में परिवर्तन: स्वच्छ-ऊर्जा संक्रमण रोजगार सृजन के अवसर प्रदान करेगा, किंतु क्षेत्रीय असमानताओं को संतुलित करने हेतु लक्षित कौशल-विकास कार्यक्रमों और सामाजिक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होगी।

सतत संक्रमण के लिए नीतिगत सुझाव:

      • रिपोर्ट इस चुनौती की गंभीरता को स्वीकार करते हुए कई रणनीतिक हस्तक्षेपों का सुझाव देती है:
        • मांग-पक्षीय उपाय: ऊर्जा दक्षता में सुधार, व्यवहारिक परिवर्तन को प्रोत्साहन, सुदृढ़ भवन संहिता का अनुपालन तथा सार्वजनिक परिवहन आधारित शहरी नियोजन को बढ़ावा देना।
        • वित्तीय सुधार: बांड बाजारों का विस्तार, मिश्रित वित्त (Blended Finance) को प्रोत्साहन तथा घरेलू एवं विदेशी पूंजी को आकर्षित करने हेतु समर्पित हरित-वित्त संस्थानों की स्थापना।
        • संस्थागत समन्वय: प्रधानमंत्री की जलवायु परिवर्तन परिषद के अंतर्गत मिशन मोड शासन ढाँचे को अपनाकर केंद्र और राज्यों के बीच समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष:

भारत का नेट-ज़ीरो संक्रमण विकास पर प्रतिबंध नहीं, बल्कि विकास की पुनर्परिभाषा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो यह एक स्वच्छ, अधिक लचीले और समावेशी विकास मॉडल की आधारशिला रख सकता है तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए वैश्विक उदाहरण स्थापित कर सकता है। हालांकि, यदि इस दिशा में देरी होती है तो संक्रमण की लागत बढ़ सकती है और कार्बन-लॉक-इन का जोखिम भी उत्पन्न हो सकता है। अतः वर्तमान दशक में निर्णायक कदम उठाना अत्यंत आवश्यक है।