संदर्भ:
हाल ही में नीति आयोग ने क्रिसिल इंटेलिजेंस के सहयोग से “भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए प्रमुख क्षेत्र – खंड-1” नामक रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट भारत को उपभोग-आधारित अर्थव्यवस्था से बदलकर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण शक्ति बनाने तथा विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को साकार करने के लिए तथ्यों एवं प्रमाणों पर आधारित मार्गदर्शिका प्रस्तुत करती है।
रिपोर्ट की प्रमुख विशेषताएँ:
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- विनिर्माण और जनसांख्यिकीय लाभांश: भारत के सकल मूल्य वर्धन में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान लगभग 17.5 प्रतिशत है। रिपोर्ट का उद्देश्य विनिर्माण क्षेत्र में मूल्यवर्धन को बढ़ाना है, जिससे भारत को 2047 तक 30 खरब अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता मिल सके। लगभग 28 वर्ष की मध्यिका आयु के साथ भारत के पास विशाल जनसांख्यिकीय लाभांश उपलब्ध है। औपचारिक तथा उत्पादक औद्योगिक रोजगार के अवसर सृजित करके भारत इस जनसांख्यिकीय क्षमता का प्रभावी उपयोग कर सकता है।
- उच्च क्षमता वाले क्षेत्रों की पहचान: 62 क्षेत्रों के चार-चरणीय मूल्यांकन के आधार पर 12 उच्च क्षमता वाले क्षेत्रों की पहचान की गई है। प्रथम खंड में निम्नलिखित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया है:
- रसायन
- वस्त्र एवं परिधान
- दूरसंचार एवं संचार-जाल उपकरण
- सौर प्रकाशवोल्टीय विनिर्माण
- अन्य प्रमुख क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक्स, मोटर वाहन, औषधि, पूंजीगत वस्तुएँ, रक्षा एवं मानव रहित विमान, इस्पात, खाद्य प्रसंस्करण तथा चमड़ा एवं जूते-चप्पल उद्योग शामिल हैं।
- रसायन
- विनिर्माण और जनसांख्यिकीय लाभांश: भारत के सकल मूल्य वर्धन में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान लगभग 17.5 प्रतिशत है। रिपोर्ट का उद्देश्य विनिर्माण क्षेत्र में मूल्यवर्धन को बढ़ाना है, जिससे भारत को 2047 तक 30 खरब अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता मिल सके। लगभग 28 वर्ष की मध्यिका आयु के साथ भारत के पास विशाल जनसांख्यिकीय लाभांश उपलब्ध है। औपचारिक तथा उत्पादक औद्योगिक रोजगार के अवसर सृजित करके भारत इस जनसांख्यिकीय क्षमता का प्रभावी उपयोग कर सकता है।
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क्षेत्र-विशिष्ट प्राथमिकताएँ:
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- रसायन क्षेत्र
- रिपोर्ट में घरेलू रसायन बाजार को वित्त वर्ष 2024-25 में 200–220 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर वित्त वर्ष 2029-30 तक 290–310 अरब अमेरिकी डॉलर करने का लक्ष्य रखा गया है।
- इसमें विशेष रसायनों के विस्तार तथा मेथनॉल और एसिटिक अम्ल जैसे आयातित कच्चे माल पर निर्भरता कम करने पर विशेष जोर दिया गया है।
- रिपोर्ट में घरेलू रसायन बाजार को वित्त वर्ष 2024-25 में 200–220 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर वित्त वर्ष 2029-30 तक 290–310 अरब अमेरिकी डॉलर करने का लक्ष्य रखा गया है।
- वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र
- भारत का लक्ष्य वित्त वर्ष 2029-30 तक 350 अरब अमेरिकी डॉलर का वस्त्र उद्योग और 100 अरब अमेरिकी डॉलर का निर्यात प्राप्त करना है।
- इसके लिए मानव-निर्मित रेशों, तकनीकी वस्त्रों, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के आधुनिकीकरण तथा कपास की उत्पादकता में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
- भारत का लक्ष्य वित्त वर्ष 2029-30 तक 350 अरब अमेरिकी डॉलर का वस्त्र उद्योग और 100 अरब अमेरिकी डॉलर का निर्यात प्राप्त करना है।
- दूरसंचार एवं संचार-जाल क्षेत्र
- रिपोर्ट में पाँचवीं और छठी पीढ़ी के दूरसंचार उपकरणों, मार्ग-संचालकों, जीपीओएन तथा प्रकाशीय प्रणालियों में घरेलू उत्पादन को और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई है।
- इसका उद्देश्य केवल उपकरणों को जोड़ने तक सीमित न रहकर उनके विभिन्न घटकों का घरेलू स्तर पर निर्माण करना तथा देश में होने वाले कुल मूल्यवर्धन को बढ़ाना है।
- रिपोर्ट में पाँचवीं और छठी पीढ़ी के दूरसंचार उपकरणों, मार्ग-संचालकों, जीपीओएन तथा प्रकाशीय प्रणालियों में घरेलू उत्पादन को और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई है।
- सौर प्रकाशवोल्टीय विनिर्माण
- भारत ऐसी एकीकृत सौर मूल्य श्रृंखला विकसित करना चाहता है, जिसमें बहुसिलिकॉन, सिल्लियाँ, वेफर, सौर-कोशिकाएँ और सौर-मॉड्यूल का देश में ही उत्पादन हो।
- इससे आयात पर निर्भरता कम करने और वर्ष 2030 तक 280 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने में सहायता मिलेगी।
- भारत ऐसी एकीकृत सौर मूल्य श्रृंखला विकसित करना चाहता है, जिसमें बहुसिलिकॉन, सिल्लियाँ, वेफर, सौर-कोशिकाएँ और सौर-मॉड्यूल का देश में ही उत्पादन हो।
- रसायन क्षेत्र
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प्रमुख चुनौतियाँ:
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- आयात पर निर्भरता: महत्वपूर्ण रासायनिक कच्चे माल, सौर वेफर तथा दूरसंचार उपकरणों के घटकों के लिए भारत काफी हद तक आयात पर निर्भर है।
- रिवर्स शुल्क संरचना: कच्चे माल और अन्य आवश्यक आदानों पर अधिक शुल्क होने से घरेलू उत्पादन की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है।
- सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों का विखंडन: छोटे उद्योगों में पुरानी तकनीक, सीमित वित्तीय संसाधन और आधुनिक सुविधाओं तक कम पहुँच जैसी समस्याएँ हैं।
- परिवहन एवं रसद संबंधी बाधाएँ: बंदरगाहों की कार्यक्षमता में कमी तथा विभिन्न परिवहन साधनों के बीच अपर्याप्त संपर्क से उत्पादन एवं परिवहन लागत बढ़ती है।
- कम उत्पादकता एवं अनुसंधान-विकास की कमी: तकनीकी पिछड़ापन तथा निजी क्षेत्र द्वारा अनुसंधान एवं विकास पर सीमित निवेश उच्च-मूल्य विनिर्माण के विस्तार में बाधा डालता है।
- आयात पर निर्भरता: महत्वपूर्ण रासायनिक कच्चे माल, सौर वेफर तथा दूरसंचार उपकरणों के घटकों के लिए भारत काफी हद तक आयात पर निर्भर है।
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प्रमुख सिफारिशें:
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- नीति आयोग ने महत्वपूर्ण प्रारंभिक एवं आधारभूत उत्पादन क्षमताओं के विकास के लिए व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण तथा उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन उपलब्ध कराने की सिफारिश की है।
- इसके साथ ही वस्तु एवं सेवा कर तथा सीमा शुल्क को तर्कसंगत बनाने, और ऐसी तैयार औद्योगिक विनिर्माण परिसरों की स्थापना करने का सुझाव दिया गया है जहाँ उद्योगों को आवश्यक आधारभूत सुविधाएँ पहले से उपलब्ध हों।
- रिपोर्ट में बंदरगाहों के आधुनिकीकरण तथा उन्हें पीएम गति शक्ति के साथ एकीकृत करने, अनुसंधान एवं विकास तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को मजबूत करने और निर्यात बाजारों का विस्तार करने के लिए रणनीतिक मुक्त व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाने की भी सिफारिश की गई है।
- नीति आयोग ने महत्वपूर्ण प्रारंभिक एवं आधारभूत उत्पादन क्षमताओं के विकास के लिए व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण तथा उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन उपलब्ध कराने की सिफारिश की है।
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महत्त्व:
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- यह रिपोर्ट भारत को निम्न-मूल्य वाले संयोजन कार्य से उच्च-मूल्य वाले विनिर्माण की ओर ले जाने का प्रयास करती है। इसके लिए कच्चे माल और घटकों से लेकर प्रौद्योगिकी, अनुसंधान एवं विकास तथा निर्यात तक पूरी उत्पादन-मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।
- इससे रोजगार के अवसर बढ़ाने, निर्यात में वृद्धि करने, आयात पर निर्भरता कम करने तथा आपूर्ति श्रृंखला को अधिक मजबूत और सुरक्षित बनाने में सहायता मिल सकती है।
- यह रिपोर्ट भारत को निम्न-मूल्य वाले संयोजन कार्य से उच्च-मूल्य वाले विनिर्माण की ओर ले जाने का प्रयास करती है। इसके लिए कच्चे माल और घटकों से लेकर प्रौद्योगिकी, अनुसंधान एवं विकास तथा निर्यात तक पूरी उत्पादन-मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।
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निष्कर्ष:
नीति आयोग द्वारा प्रस्तुत यह मार्गदर्शिका भारत में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण व्यवस्था विकसित करने के लिए एक रणनीतिक ढाँचा प्रदान करती है। प्रभावी क्रियान्वयन, तकनीकी उन्नयन तथा उत्पादन की प्रारंभिक अवस्थाओं में मजबूत क्षमताओं के विकास से भारत अपने विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार कर सकता है, उत्पादक रोजगार के अवसर सृजित कर सकता है और विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति कर सकता है।
