संदर्भ:
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2025 से अब तक पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस (NiV) के केवल दो पुष्ट मामले सामने आए हैं।
मामलों में कमी के कारण:
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- केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकारों ने राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के प्रोटोकॉल के अनुसार त्वरित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया सुनिश्चित की। अपनाए गए प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं:
- प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी और सक्रिय मॉनिटरिंग को बढ़ाया गया।
- संदिग्ध मामलों और उनके संपर्क में आए लोगों की गहन प्रयोगशाला जाँच।
- संक्रमण की कड़ी को ट्रैक करने के लिए फील्ड इन्वेस्टिगेशन।
- प्रसार को रोकने के लिए पुष्ट मामलों का कंटेनमेंट और उन्हें आइसोलेशन में रखना।
- प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी और सक्रिय मॉनिटरिंग को बढ़ाया गया।
- केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकारों ने राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के प्रोटोकॉल के अनुसार त्वरित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया सुनिश्चित की। अपनाए गए प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं:
निपाह वायरस के बारे में:
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- ज़ूनोटिक वायरस: इसकी पहचान पहली बार 1998-99 में मलेशिया के 'काम्पंग सुंगई निपाह' में हुई थी। यह वायरस जानवरों से मनुष्यों में फैलता है। फ्रूट बैट (परोपोडिडे परिवार के चमगादड़) इसके प्राकृतिक वाहक हैं और सूअर इसके मध्यवर्ती मेजबान (Intermediate hosts) हो सकते हैं।
- मानव-से-मानव संचरण: निपाह वायरस मनुष्य से मनुष्य के बीच फैल सकता है, जो इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बनाता है।
- वर्गीकरण: यह 'पैरामिक्सोविरिडे' (Paramyxoviridae) परिवार के 'हेनिपावायरस' (Henipavirus) जीनस से संबंधित है और एक बायोसेफ्टी लेवल-4 (BSL-4) रोगजनक है।
- ज़ूनोटिक वायरस: इसकी पहचान पहली बार 1998-99 में मलेशिया के 'काम्पंग सुंगई निपाह' में हुई थी। यह वायरस जानवरों से मनुष्यों में फैलता है। फ्रूट बैट (परोपोडिडे परिवार के चमगादड़) इसके प्राकृतिक वाहक हैं और सूअर इसके मध्यवर्ती मेजबान (Intermediate hosts) हो सकते हैं।
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संरचना और जीनोम:
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- यह एक सिंगल-स्ट्रैंडेड, नेगेटिव-सेंस आरएनए (RNA) वायरस है।
- इसका 'न्यूक्लियोकैप्सिड' एक मैट्रिक्स प्रोटीन द्वारा सुरक्षित रहता है। इसमें मौजूद फ्यूजन प्रोटीन और ग्लाइकोप्रोटीन वायरस को कोशिकाओं में प्रवेश करने में मदद करते हैं।
- यह एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम के पास एक विशिष्ट साइटोप्लाज्मिक संरचना प्रदर्शित करता है।
- यह एक सिंगल-स्ट्रैंडेड, नेगेटिव-सेंस आरएनए (RNA) वायरस है।
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लक्षण और नैदानिक विशेषताएँ:
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- शुरुआती लक्षण: इन्फ्लूएंजा (जुकाम-बुखार) जैसे होते हैं, जिनमें बुखार, मांसपेशियों में दर्द, गले में खराश और सांस लेने में तकलीफ शामिल है।
- गंभीर स्थिति: यह बढ़कर एक्यूट एन्सेफलाइटिस (दिमाग में सूजन) का रूप ले सकता है, जिससे दौरे पड़ना, भटकाव, कोमा और मृत्यु तक हो सकती है।
- असिम्प्टोमैटिक संक्रमण: कई बार रोगियों में कोई लक्षण नहीं दिखते, जिससे निगरानी और रोकथाम कठिन हो जाती है।
- शुरुआती लक्षण: इन्फ्लूएंजा (जुकाम-बुखार) जैसे होते हैं, जिनमें बुखार, मांसपेशियों में दर्द, गले में खराश और सांस लेने में तकलीफ शामिल है।
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निदान और उपचार:
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- जाँच (Diagnosis): इसकी पुष्टि आरटी-पीसीआर , ELISA, सीरम न्यूट्रलाइजेशन टेस्ट और BSL-4 प्रयोगशालाओं में वायरस आइसोलेशन के माध्यम से की जाती है।
- उपचार: मनुष्यों या जानवरों के लिए अभी तक कोई स्वीकृत टीका (Vaccine) नहीं है। उपचार मुख्य रूप से 'सपोर्टिव केयर' और आइसोलेशन पर आधारित है।
- जाँच (Diagnosis): इसकी पुष्टि आरटी-पीसीआर , ELISA, सीरम न्यूट्रलाइजेशन टेस्ट और BSL-4 प्रयोगशालाओं में वायरस आइसोलेशन के माध्यम से की जाती है।
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हालिया प्रगति:
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- भारत में मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और रेमडेसिविर जैसी एंटीवायरल दवाओं के उपयोग से जीवित रहने की दर में सुधार हुआ है। मृत्यु दर, जो 2018 में 91% थी, 2023-25 के दौरान घटकर लगभग 33% रह गई है।
- भारत में मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और रेमडेसिविर जैसी एंटीवायरल दवाओं के उपयोग से जीवित रहने की दर में सुधार हुआ है। मृत्यु दर, जो 2018 में 91% थी, 2023-25 के दौरान घटकर लगभग 33% रह गई है।
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भारत में निपाह वायरस:
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- भारत ने पहले भी कई बार निपाह के प्रकोप का सामना किया है:
- पश्चिम बंगाल: (2007)
- केरल: (2018, 2023, 2025)
- पश्चिम बंगाल: (2007)
- इन घटनाओं ने शुरुआती पहचान, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और त्वरित चिकित्सा प्रतिक्रिया के महत्व को रेखांकित किया है।
- भारत ने पहले भी कई बार निपाह के प्रकोप का सामना किया है:
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