नीलगिरि तहर सर्वेक्षण
संदर्भ:
हाल ही में तमिलनाडु वन विभाग ने केरल के साथ समन्वय करते हुए नीलगिरि तहर का तीसरा समन्वित सर्वेक्षण शुरू किया है। यह पश्चिमी घाट में पाई जाने वाली स्थानिक (endemic) प्रजाति है।
नीलगिरि तहर के बारे में:
नीलगिरि तहर दक्षिण भारत में पाई जाने वाली एकमात्र पर्वतीय खुरदार प्रजाति है, जबकि देश में ऐसी कुल 12 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसे एक प्रमुख (flagship) और सूचक (indicator) प्रजाति माना जाता है, जो उच्च-ऊंचाई वाले पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को दर्शाती है।
आवास और वितरण:
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- यह 1200 से 2600 मीटर की ऊँचाई पर स्थित पर्वतीय घासभूमियों (montane grasslands) में पाई जाती है।
- इसका वितरण नीलगिरि से कन्याकुमारी तक लगभग 400 किमी की संकीर्ण पट्टी तक सीमित है।
- प्रमुख आबादी एराविकुलम राष्ट्रीय उद्यान के साथ-साथ नीलगिरि और अन्नामलाई पहाड़ियों में पाई जाती है।
- वर्तमान वितरण खंडित (fragmented) है, जबकि पहले यह अधिक व्यापक क्षेत्र में पाई जाती थी।
- यह 1200 से 2600 मीटर की ऊँचाई पर स्थित पर्वतीय घासभूमियों (montane grasslands) में पाई जाती है।
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संरक्षण स्थिति (Conservation Status):
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- अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा इसे संकटग्रस्त (Endangered) श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है।
- अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा इसे संकटग्रस्त (Endangered) श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है।
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मुख्य पारिस्थितिक और जैविक विशेषताएँ:
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- अनुकूलन क्षमता: यह अत्यंत फुर्तीला और मजबूत पैर वाला होता है, जो इसे खड़ी और पथरीली ढलानों पर रहने में सक्षम बनाता है।
- सामाजिक संरचना: यह झुंडों में रहता है, जिससे कठिन पर्यावरण में इसके जीवित रहने की संभावना बढ़ती है।
- प्रजनन: सर्दियों में बच्चे पैदा करना (calving) शावकों के बेहतर जीवित रहने में मदद करता है।
- सूचक भूमिका: इसकी जनसंख्या में बदलाव पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता को दर्शाता है।
- अनुकूलन क्षमता: यह अत्यंत फुर्तीला और मजबूत पैर वाला होता है, जो इसे खड़ी और पथरीली ढलानों पर रहने में सक्षम बनाता है।
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संरक्षण प्रयास:
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- एराविकुलम राष्ट्रीय उद्यान जैसे संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना
- नियमित जनसंख्या सर्वेक्षण और आवास (habitat) का आकलन
- तकनीक आधारित निगरानी उपकरणों का उपयोग
- स्थानांतरण (translocation) के माध्यम से आनुवंशिक विविधता संरक्षण के प्रयास
- इसके अतिरिक्त, नीलगिरि तहर तमिलनाडु का राज्य पशु (State Animal) है, जिससे इसके संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता और राजनीतिक समर्थन को बढ़ावा मिलता है।
- एराविकुलम राष्ट्रीय उद्यान जैसे संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना
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पश्चिमी घाट के बारे में:
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- पश्चिमी घाट, जिसे सह्याद्रि पर्वत भी कहा जाता है, भारत के पश्चिमी तट के समानांतर लगभग 1,600 किमी लंबी पर्वत श्रृंखला है, जो गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल—इन छह राज्यों में फैली हुई है। इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है और इसमें उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य वाले 39 संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं।
- हिमालय से भी प्राचीन यह पर्वत श्रृंखला लगभग 1,40,000 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली है और मानसूनी हवाओं को रोककर वर्षा के पैटर्न को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह विश्व के आठ “सबसे गर्म जैव विविधता हॉटस्पॉट” में से एक है, जिसमें उच्च स्तर की स्थानिकता (endemism) पाई जाती है।
- यह घाट एक महत्वपूर्ण जल विभाजक (watershed) के रूप में कार्य करता है, जिससे गोदावरी नदी, कृष्णा नदी और कावेरी नदी जैसी प्रमुख नदियाँ निकलती हैं। यह प्रतिवर्ष लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके एक कार्बन सिंक के रूप में भी कार्य करता है, जिससे जलवायु संतुलन में मदद मिलती है।
- पश्चिमी घाट, जिसे सह्याद्रि पर्वत भी कहा जाता है, भारत के पश्चिमी तट के समानांतर लगभग 1,600 किमी लंबी पर्वत श्रृंखला है, जो गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल—इन छह राज्यों में फैली हुई है। इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है और इसमें उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य वाले 39 संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं।
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पारिस्थितिक रूप से, यह क्षेत्र विविध आवासों का घर है:
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- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन
- आर्द्र पर्णपाती वन
- शोला-घासभूमि तंत्र
- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन
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यहाँ लायन-टेल्ड मकाक और बंगाल टाइगर जैसी प्रमुख प्रजातियाँ पाई जाती हैं, साथ ही विश्व की लगभग 30% एशियाई हाथियों की आबादी भी इसी क्षेत्र में निवास करती है।
निष्कर्ष:
समन्वित नीलगिरि तहर सर्वेक्षण भारत की एक अद्वितीय स्थानिक प्रजाति के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। नीलगिरि तहर का संरक्षण केवल एक प्रजाति की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है, जो एक वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट है। इसके दीर्घकालिक संरक्षण के लिए सतत वैज्ञानिक निगरानी और सहयोगात्मक प्रशासन अत्यंत आवश्यक है।

