संदर्भ:
हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने नई दवाएँ और क्लिनिकल ट्रायल (एनडीसीटी) नियम, 2019 में संशोधन की अधिसूचना जारी की है। इन संशोधनों का मुख्य उद्देश्य नियामक प्रक्रियाओं को अधिक सरल और पारदर्शी बनाना, स्वीकृति से जुड़ी समय-सीमा को कम करना तथा भारत के औषधि और क्लिनिकल अनुसंधान क्षेत्र में व्यवसाय करने की सुगमता को बढ़ावा देना है।
संशोधनों के बारे में:
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- परीक्षण लाइसेंस की आवश्यकता में ढील:
- पूर्व में, शोध उद्देश्यों के लिए कम मात्रा में दवाओं के निर्माण हेतु कंपनियों को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन से परीक्षण लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य था।
- अब इस व्यवस्था को सरल बनाते हुए केवल पूर्व ऑनलाइन सूचना देने की प्रणाली लागू की गई है।
- अपवाद: साइटोटॉक्सिक, मादक तथा मनःप्रभावी जैसी उच्च जोखिम वाली दवाओं के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता पहले की तरह बनी रहेगी।
- सीडीएससीओ परीक्षण लाइसेंस एक अनिवार्य नियामक अनुमति है, जिसके अंतर्गत दवाओं, चिकित्सा उपकरणों या सौंदर्य प्रसाधनों की सीमित मात्रा को केवल परीक्षण, जांच, विश्लेषण अथवा क्लिनिकल ट्रायल के लिए आयात या निर्माण की अनुमति दी जाती है, न कि व्यावसायिक बिक्री के लिए।
- पूर्व में, शोध उद्देश्यों के लिए कम मात्रा में दवाओं के निर्माण हेतु कंपनियों को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन से परीक्षण लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य था।
- समय-सीमा में कमी:
- जिन श्रेणियों में लाइसेंस की आवश्यकता बनी हुई है, उनके लिए आवेदन की प्रक्रिया की समय-सीमा 90 दिनों से घटाकर 45 दिन कर दी गई है।
- जिन श्रेणियों में लाइसेंस की आवश्यकता बनी हुई है, उनके लिए आवेदन की प्रक्रिया की समय-सीमा 90 दिनों से घटाकर 45 दिन कर दी गई है।
- जैव-उपलब्धता और जैव-समतुल्यता अध्ययन सरल किए गए:
- कम जोखिम वाले जैव-उपलब्धता और जैव-समतुल्यता अध्ययनों के लिए अब पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होगी।
- ऐसे अध्ययन सीडीएससीओ को ऑनलाइन सूचना देने के पश्चात प्रारंभ किए जा सकते हैं।
- कम जोखिम वाले जैव-उपलब्धता और जैव-समतुल्यता अध्ययनों के लिए अब पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होगी।
- डिजिटल क्रियान्वयन;
- ऑनलाइन नियामक मॉड्यूल को सुगम पोर्टल तथा राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली के साथ एकीकृत किया जाएगा।
- ऑनलाइन नियामक मॉड्यूल को सुगम पोर्टल तथा राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली के साथ एकीकृत किया जाएगा।
- परीक्षण लाइसेंस की आवश्यकता में ढील:
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नियामक पृष्ठभूमि:
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- शासक कानून:
- औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940
- औषधि और प्रसाधन सामग्री नियम, 1945
- नई दवाएँ और क्लिनिकल ट्रायल नियम, 2019
- औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940
- नियामक प्राधिकरण:
- केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन, जो औषधि महानियंत्रक के अधीन कार्य करता है।
- केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन, जो औषधि महानियंत्रक के अधीन कार्य करता है।
- क्लिनिकल ट्रायल के चरण:
- चरण एक: सुरक्षा का आकलन, जिसमें पहली बार मनुष्यों पर परीक्षण किया जाता है।
- चरण दो: दवा की प्रभावशीलता का मूल्यांकन।
- चरण तीन: बड़े स्तर पर परीक्षण द्वारा परिणामों की पुष्टि।
- चरण चार: विपणन के बाद दवा की निगरानी।
- चरण एक: सुरक्षा का आकलन, जिसमें पहली बार मनुष्यों पर परीक्षण किया जाता है।
- शासक कानून:
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लाभ और प्रभाव:
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- औषधि उद्योग के लिए:
- अनुसंधान और नवाचार की प्रक्रिया अधिक तीव्र, सरल और प्रभावी बनेगी।
- प्रतिवर्ष लगभग 30,000 से 35,000 परीक्षण लाइसेंस आवेदनों से जुड़ा अनुपालन भार उल्लेखनीय रूप से कम होगा।
- जेनेरिक दवाओं के विकास को सशक्त प्रोत्साहन मिलेगा, क्योंकि हर वर्ष लगभग 4,000 से 4,500 जैव-उपलब्धता और जैव-समतुल्यता अध्ययन किए जाते हैं।
- अनुसंधान और नवाचार की प्रक्रिया अधिक तीव्र, सरल और प्रभावी बनेगी।
- नियामकों के लिए:
- सीडीएससीओ के मानव संसाधनों का अधिक प्रभावी और उद्देश्यपूर्ण उपयोग संभव होगा।
- प्रक्रियागत स्वीकृतियों के स्थान पर जोखिम-आधारित नियामक निगरानी को बढ़ावा मिलेगा।
- सीडीएससीओ के मानव संसाधनों का अधिक प्रभावी और उद्देश्यपूर्ण उपयोग संभव होगा।
- भारत के औषधि पारिस्थितिकी तंत्र के लिए:
- वैश्विक नियामक सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ बेहतर सामंजस्य स्थापित होगा।
- भारत को औषधि अनुसंधान, विकास और क्लिनिकल ट्रायल के वैश्विक केंद्र के रूप में और अधिक मजबूती मिलेगी।
- वैश्विक नियामक सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ बेहतर सामंजस्य स्थापित होगा।
- चिंताएँ और सुरक्षा उपाय:
- सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उच्च जोखिम वाली दवाओं के लिए लाइसेंस की व्यवस्था जारी रहेगी।
- नैतिक मानकों, सूचित सहमति तथा परीक्षण के बाद निगरानी की अनिवार्यता बनी रहेगी।
- जहाँ आवश्यक होगा, वहाँ पूर्व-नैदानिक पशु परीक्षण की शर्त पूर्व की तरह बनी रहेगी।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उच्च जोखिम वाली दवाओं के लिए लाइसेंस की व्यवस्था जारी रहेगी।
- औषधि उद्योग के लिए:
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निष्कर्ष:
एनडीसीटी नियम, 2019 में किए गए ये संशोधन भारत के औषधि क्षेत्र में शोध-आधारित विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नियामक सुधार हैं। स्वीकृति की समय-सीमा में कमी, डिजिटल प्लेटफॉर्म के प्रभावी उपयोग और जोखिम-आधारित दृष्टिकोण को अपनाकर इन सुधारों ने व्यवसाय करने में आसानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित किया है। इन उपायों से नवाचार की गति तेज होने, नियामक दक्षता में वृद्धि होने तथा भारत को वैश्विक औषधि अनुसंधान और क्लिनिकल ट्रायल के लिए एक पसंदीदा गंतव्य बनाने में सहायता मिलने की संभावना है।

