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Blog / 08 Jan 2026

घासभूमियों के लिए राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं की आवश्यकता

संदर्भ:

संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2026 को रेंजभूमि और चरवाहा समुदायों का अंतरराष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है, जिसका उद्देश्य घासभूमियों तथा उन पर निर्भर समुदायों की आजीविका के वैश्विक महत्व को रेखांकित करना है। इसके बावजूद, ब्राज़ील में आयोजित COP30 में चर्चा का मुख्य केंद्र वन ही रहे। ट्रॉपिकल फॉरेस्ट फॉरएवर फैसिलिटी जैसी पहलों ने इस वन-केंद्रित दृष्टिकोण को और स्पष्ट किया। इसके विपरीत घासभूमियों और अन्य खुले पारितंत्रों को बहुत कम महत्व दिया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उन्हें राष्ट्रीय और वैश्विक जलवायु एजेंडे में शामिल करना अब अत्यंत आवश्यक है।

घासभूमियों के बारे में:

      • घासभूमियाँ विस्तृत खुले क्षेत्र होते हैं, जहाँ घास प्रमुख वनस्पति के रूप में पाई जाती है। ये पृथ्वी की कुल स्थलीय सतह के लगभग 20 से 40 प्रतिशत हिस्से को आच्छादित (Covered) करती हैं। सामान्यतः ये ऐसे संक्रमण क्षेत्रों में विकसित होती हैं, जहाँ वर्षा की मात्रा इतनी होती है कि भूमि मरुस्थलीकरण से बची रहे, परंतु इतनी नहीं कि घने वनों का विकास संभव हो सके।
      • कार्बन के दीर्घकालिक संचितकरण, जैव विविधता के संरक्षण तथा स्थानीय समुदायों की आजीविका सुनिश्चित करने में घासभूमियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद, ये विश्व के सबसे अधिक संकटग्रस्त पारितंत्रों में शामिल हैं। वैश्विक जलवायु वार्ताओं में प्रायः वनों को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि घासभूमियाँ कृषि विस्तार, आक्रामक विदेशी प्रजातियों का प्रसार, अनुचित वृक्षारोपण तथा पारंपरिक स्थानीय भूमि प्रबंधन प्रणालियों के दमन के कारण तीव्र गति से क्षरण का सामना कर रही हैं। जब तक घासभूमियों को स्वतंत्र और महत्त्वपूर्ण पारितंत्र के रूप में स्पष्ट मान्यता नहीं दी जाती, तब तक जलवायु शमन और अनुकूलन से जुड़ी रणनीतियाँ अपूर्ण ही बनी रहेंगी।

Need for National Climate Plans on Grasslands

वैश्विक स्तर पर दबाव में घासभूमियाँ:

      • ऑस्ट्रेलिया: ऑस्ट्रेलिया की रेगिस्तानी घासभूमियाँ अत्यधिक तापमान, लंबे समय तक पड़ने वाले सूखे, अचानक आने वाली बाढ़ तथा बफेल घास जैसी आक्रामक विदेशी प्रजातियों के गंभीर दबाव में हैं। इन परिस्थितियों में इंडिजिनस डेज़र्ट एलायंस जैसे आदिवासी संगठनों द्वारा अपनाए जा रहे सांस्कृतिक रूप से अनुकूल अग्नि प्रबंधन, आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण तथा निरंतर निगरानी उपाय इन नाज़ुक पारितंत्रों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
      • ब्राज़ील: ब्राज़ील की सेराडो सवाना, जो देश की बारह में से आठ प्रमुख नदी प्रणालियों के लिए जीवनरेखा का कार्य करती है, अमेज़न क्षेत्र की तुलना में लगभग दोगुनी गति से नष्ट हो रही है। इसका प्रमुख कारण कृषि विस्तार, खनन गतिविधियाँ तथा प्राकृतिक अग्नि चक्रों का दमन है। इस क्षेत्र में आदिवासी एवं अफ्रीकी मूल के समुदायों के भूमि अधिकारों को सुरक्षित करना केवल पारिस्थितिक संरक्षण का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी एक अहम मुद्दा बन गया है।
      • घासभूमियाँ कार्बन भंडारण, जल प्रवाह का विनियमन तथा जैव विविधता के संरक्षण जैसी पारितंत्र सेवाएँ प्रदान करती हैं, जो कार्यात्मक रूप से वनों के समान ही महत्वपूर्ण हैं। इसके बावजूद, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों में इन्हें अब तक अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया है।

घासभूमि संरक्षण:

      • घासभूमियों का प्रभावी संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न संयुक्त राष्ट्र ढाँचों के बीच समन्वय और एकीकृत नीति अत्यंत आवश्यक है:
        • जलवायु परिवर्तन रूपरेखा संधि (UNFCCC): जलवायु शमन और कार्बन प्रबंधन पर केंद्रित, जिससे घासभूमियों के कार्बन भंडारण क्षमता का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
        • जैव विविधता संधि (CBD): पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित, ताकि घासभूमियों में पाए जाने वाले वनस्पति और जीव-जंतु सुरक्षित रहें।
        • मरुस्थलीकरण निरोधक संधि (UNCCD): भूमि क्षरण को रोकने और भूमि स्थिरता बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित, जो घासभूमियों की सतत उपयोग और पुनर्स्थापन में मदद करता है।
      • विश्व वन्यजीव कोष (WWF) और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) जैसी संस्थाओं की रिपोर्टें पारितंत्र-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की समर्थन करती हैं। इन रिपोर्टों में यह सुझाया गया है कि घासभूमियों को राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं में शामिल किया जाए और इन तीनों संधियों के बीच संस्थागत दूरी को कम किया जाए। उदाहरण के लिए, UNCCD COP16 में रेंजभूमियों को जटिल सामाजिक-पारिस्थितिक प्रणालियों के रूप में मान्यता दी गई और सुरक्षित भूमि अधिकार सुनिश्चित करने तथा सतत प्रबंधन में निवेश बढ़ाने का आह्वान किया गया।

भारत में घासभूमियाँ:

      • भारत में घासभूमियाँ लगभग 18 विभिन्न मंत्रालयों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं, जिससे नीतियाँ अक्सर बिखरी हुई और कई बार एक-दूसरे के विपरीत होती हैं। उदाहरण के लिए, पर्यावरण मंत्रालय इन्हें प्रायः वृक्षारोपण योग्य भूमि के रूप में देखता है, जबकि ग्रामीण विकास मंत्रालय ने कई बार इन्हें बंजर भूमिमानकर उपयोग परिवर्तन के लिए उपयुक्त बताया है।
      • यदि घासभूमियों को स्वतंत्र पारितंत्र के रूप में, महत्वपूर्ण कार्बन भंडार और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र के रूप में मान्यता दी जाए, तो यह भारत की जलवायु कार्रवाई को केवल वनों तक सीमित रखने के दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर एक समग्र और संतुलित जलवायु रणनीति की दिशा में योगदान कर सकता है।

आगे की राह:

      • घासभूमियों को उनके स्वतंत्र पारितंत्र स्वरूप में मान्यता देना।
      • राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं और योगदानों में घासभूमियों को शामिल करना।
      • स्थानीय और आदिवासी समुदायों के भूमि अधिकार और प्रबंधन भूमिका सुनिश्चित करना।
      • विभिन्न संयुक्त राष्ट्र ढाँचों के बीच बेहतर समन्वय को बढ़ावा देना।
      • जीवाश्म ईंधन और बड़े कृषि हितों की बजाय विज्ञान-आधारित नीति और नागरिक समाज की भागीदारी को प्राथमिकता देना।

निष्कर्ष:

घासभूमियों की रक्षा केवल जलवायु सुरक्षा का दायित्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय का भी महत्वपूर्ण पहलू है। बहुपक्षीय सहयोग, समन्वित नीतियाँ और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना इस दिशा में आवश्यक कदम हैं। इन उपेक्षित लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण पारितंत्रों को वह सम्मान और संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए, जिसके वे वास्तविक रूप से हकदार हैं।