संदर्भ:
11 अक्टूबर 2026 को इस्पात मंत्रालय ने राष्ट्रीय इस्पात नीति–विजन 2047 (Draft National Steel Policy – Vision 2047) का मसौदा सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया। इस मसौदे पर सुझाव देने की अंतिम तिथि 30 अक्टूबर 2026 निर्धारित की गई है। इसका उद्देश्य वर्ष 2047 तक भारत के इस्पात क्षेत्र के विकास, कच्चे माल की उपलब्धता, तकनीकी आधुनिकीकरण और कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए दीर्घकालिक रोडमैप तैयार करना है।
पृष्ठभूमि: भारत में राष्ट्रीय इस्पात नीति की आवश्यकता
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- भारत ने वर्ष 2018 में विश्व के दूसरे सबसे बड़े इस्पात उत्पादक देश का स्थान प्राप्त किया और इसे बनाए रखा है। वर्ष 2025–26 में देश का कच्चे इस्पात का उत्पादन लगभग 168.4 मिलियन टन तथा तैयार इस्पात की खपत 163.7 मिलियन टन रही।
- राष्ट्रीय इस्पात नीति, 2017 में वर्ष 2030–31 तक कच्चे इस्पात की उत्पादन क्षमता 300 मिलियन टन और उत्पादन 255 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा गया था। इसके साथ ही उच्च गुणवत्ता वाले ऑटोमोटिव, विद्युत और विशेष इस्पात के घरेलू उत्पादन तथा कोकिंग कोयले पर आयात निर्भरता कम करने पर जोर दिया गया था।
- हालाँकि, पिछले दशक में भारत की इस्पात उत्पादन क्षमता और घरेलू माँग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, हरित इस्पात, ऊर्जा दक्षता और वैश्विक व्यापार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसी नई चुनौतियों ने वर्ष 2047 तक के लिए एक नई नीति की आवश्यकता पैदा की है।
- भारत ने वर्ष 2018 में विश्व के दूसरे सबसे बड़े इस्पात उत्पादक देश का स्थान प्राप्त किया और इसे बनाए रखा है। वर्ष 2025–26 में देश का कच्चे इस्पात का उत्पादन लगभग 168.4 मिलियन टन तथा तैयार इस्पात की खपत 163.7 मिलियन टन रही।
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प्रस्तावित नीति के प्रमुख लक्ष्य:
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- इस्पात उत्पादन क्षमता: वर्तमान लगभग 220 मिलियन टन से बढ़ाकर 2047 तक 604 मिलियन टन प्रतिवर्ष।
- तैयार इस्पात की माँग: वित्त वर्ष 2025-26 के 164 मिलियन टन से बढ़कर 505 मिलियन टन।
- प्रति व्यक्ति खपत: 116 किलोग्राम से बढ़कर 302 किलोग्राम।
- निर्यात: 2047 तक तैयार इस्पात का निर्यात 45 मिलियन टन तक पहुँचाना।
- उत्सर्जन तीव्रता: प्रति टन कच्चे इस्पात पर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को 2.54 टन से घटाकर लगभग 1.54 टन करना।
- यह प्रस्ताव वर्ष 2017 की राष्ट्रीय इस्पात नीति का स्थान लेगा, जिसमें 2030-31 तक 300 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा गया था।
- इस्पात उत्पादन क्षमता: वर्तमान लगभग 220 मिलियन टन से बढ़ाकर 2047 तक 604 मिलियन टन प्रतिवर्ष।
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प्रमुख चुनौती:
इस्पात उत्पादन की कुल लागत में कच्चे माल का हिस्सा लगभग 65–70% है। भारत लौह अयस्क के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर है, लेकिन अपनी कोकिंग कोयले की लगभग 92% आवश्यकता आयात से पूरी करता है। कोकिंग कोयला पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस प्रक्रिया में कोक बनाने के लिए आवश्यक है, जो ईंधन के साथ लौह अयस्क से ऑक्सीजन हटाने में भी सहायक होता है।
नीति में निम्नलिखित उपाय प्रस्तावित हैं:
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- घरेलू कोयला खदानों और कोयला धुलाई संयंत्रों की क्षमता बढ़ाना।
- ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और रूस जैसे देशों से आयात के अतिरिक्त स्रोत विकसित करना।
- विदेशों में खनिज परिसंपत्तियों में निवेश तथा दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते करना।
- लौह अयस्क और कोकिंग कोयले के परिवहन के लिए स्लरी पाइपलाइन विकसित करना।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से कोयले के मिश्रण और आयात की निगरानी को बेहतर बनाना।
- इसके अतिरिक्त, लौह अयस्क की माँग 2047 तक बढ़कर 772 मिलियन टन होने का अनुमान है। इसलिए उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क की उपलब्धता भी महत्त्वपूर्ण होगी।
- घरेलू कोयला खदानों और कोयला धुलाई संयंत्रों की क्षमता बढ़ाना।
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पर्यावरणीय चुनौतियाँ एवं हरित इस्पात:
इस्पात उद्योग ऊर्जा-प्रधान होने के कारण कार्बन उत्सर्जन का एक प्रमुख स्रोत है। प्रस्तावित नीति में उत्सर्जन तीव्रता को 2047 तक लगभग 39% घटाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए चार प्रमुख उपाय महत्त्वपूर्ण हैं:
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- ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना।
- स्क्रैप आधारित इस्पात उत्पादन को प्रोत्साहित करना।
- हरित हाइड्रोजन आधारित प्रत्यक्ष अपचयन लौह (DRI) तकनीक अपनाना।
- कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) जैसी तकनीकों का विकास करना।
- ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना।
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भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्व:
इस्पात सड़क, रेलवे, आवास, रक्षा, मशीनरी, नवीकरणीय ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्रों का प्रमुख आधार है। उत्पादन क्षमता बढ़ने से रोजगार, औद्योगिक निवेश, निर्यात और घरेलू मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही, विशेष इस्पात के स्वदेशी उत्पादन से उच्च तकनीक वाले आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
निष्कर्ष:
राष्ट्रीय इस्पात नीति—विजन 2047 भारत को वैश्विक इस्पात विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव है। इसकी सफलता केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर नहीं, बल्कि कच्चे माल की आपूर्ति, तकनीकी आधुनिकीकरण, श्रमिक सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता पर भी निर्भर करेगी। अतः भारत को प्रतिस्पर्धी, संसाधन-कुशल और कम-कार्बन इस्पात उद्योग विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

