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Blog / 16 Feb 2026

लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSDs) के लिए राष्ट्रीय बायोबैंक स्थापित

संदर्भ:

हाल ही में भारत ने लाइसोसोमल स्टोरेज विकारों (Lysosomal Storage Disorders) के लिए अपनी पहली सरकारी सहायता प्राप्त राष्ट्रीय बायोबैंक की स्थापना की है। एलएसडी 70 से अधिक दुर्लभ, आनुवंशिक चयापचय रोगों का समूह है, जो प्रायः गंभीर और जानलेवा होते हैं तथा जिनके लिए प्रभावी उपचार बहुत सीमित हैं।

लाइसोसोमल स्टोरेज विकार के बारे में:

      • एलएसडी दुर्लभ आनुवंशिक चयापचय रोग होते हैं, जो उन विशेष एंजाइमों या सहायक तत्वों की कमी के कारण उत्पन्न होते हैं, जिनकी सहायता से शरीर, वसा और शर्करा जैसे जटिल अणुओं को तोड़ता है। इनकी कमी से कोशिकाओं में विषैले पदार्थ जमा होने लगते हैं, जिससे समय के साथ विभिन्न अंगों को क्षति पहुँचती है और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
      • अनुमान है कि भारत में 12,000 से अधिक लोग एलएसडी से प्रभावित हैं।
      • वर्तमान में एलएसडी के बहुत कम रोगों के लिए ही उपचार उपलब्ध हैं, और जो उपचार उपलब्ध हैं वे अत्यंत महंगे (लगभग प्रति रोगी प्रति वर्ष ₹1 करोड़ से अधिक) होते हैं।

बायोबैंक के बारे में:

      • बायोबैंक एक विशेष सुविधा होती है, जहाँ मानव जैविक नमूनोंजैसे रक्त, ऊतक, डीएनए और मूत्रको एकत्र, संसाधित और सुरक्षित रूप से संग्रहीत किया जाता है। इनके साथ संबंधित स्वास्थ्य जानकारी भी रखी जाती है, ताकि चिकित्सा अनुसंधान किया जा सके। ऐसे संग्रह रोगों को समझने, नए उपचार विकसित करने और रोगी-केंद्रित उपचार पद्धतियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
      • बायोबैंक में नैतिक मानकों का सख्ती से पालन किया जाता है, जिससे प्रतिभागियों की गोपनीयता बनी रहे और उनकी सूचित सहमति सुनिश्चित हो।

बायोबैंक की प्रमुख विशेषताएँ:

      • राष्ट्रीय संसाधन: यह बायोबैंक देश के 15 राज्यों से पहचाने गए 530 रोगियों के जैविक नमूनों और उनके विस्तृत चिकित्सीय आँकड़ों का समेकित राष्ट्रीय संग्रह है।
      • जैविक नमूनों का व्यापक संग्रह: इसमें रक्त से प्राप्त जीनोमिक डीएनए, प्लाज़्मा और मूत्र के नमूने सुरक्षित रूप से संग्रहीत हैं। साथ ही प्रत्येक रोगी का विस्तृत क्लिनिकल विवरण, एंजाइम गतिविधि संबंधी जानकारी और आनुवंशिक प्रोफ़ाइल भी उपलब्ध है।
      • विविध रोगों का समावेश: इस बायोबैंक में लाइसोसोमल भंडारण विकारों के 27 अलग-अलग प्रकार शामिल हैं। इनमें गौशे रोग (Gaucher disease), टेसैक्स रोग (Tay-Sachs disease), म्यूकोलिपिडोसिस (Mucolipidosis) तथा मॉरक्वियो ए सिंड्रोम (Morquio A syndrome) जैसे अपेक्षाकृत अधिक पाए जाने वाले विकार भी सम्मिलित हैं।
      • केंद्रीकृत डिजिटल मंच: एक सुव्यवस्थित डिजिटल डाटाबेस के माध्यम से सभी चिकित्सीय और जीनोमिक आँकड़ों को संगठित रूप से सुरक्षित रखा गया है। इससे शोधकर्ताओं, चिकित्सकों और संस्थानों को संरचित, पारदर्शी और सुगम पहुँच प्राप्त होती है, जो प्रभावी अनुसंधान और सहयोग को बढ़ावा देती है।

अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान:

      • आँकड़ों की कमी को दूर करना: यह बायोबैंक एलएसडी के लिए लंबे समय से महसूस की जा रही राष्ट्रीय स्तर की केंद्रीकृत चिकित्सीय और जीनोमिक रजिस्ट्री की कमी को पूरा करता है।
      • उपचार विकास में सहायता: शोधकर्ता इन आँकड़ों का उपयोग जाँच उपकरणों, रोग मॉडलों और नए उपचार विकल्पों के विकास के लिए कर रहे हैं, जिनमें स्टेम सेल आधारित शोध सहयोग भी शामिल हैं।
      • सटीक चिकित्सा को बढ़ावा: यह संग्रह जीन और लक्षणों के आपसी संबंध के अध्ययन तथा रोग के प्राकृतिक इतिहास के विश्लेषण के लिए मंच प्रदान करता है, जिससे भविष्य में अधिक सटीक निदान और रोगी के अनुसार उपचार संभव हो सकेगा।
      • दुर्लभ रोग नीति से तालमेल: यह बायोबैंक भारत की राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के उद्देश्यों को मजबूत करता है, जिसका लक्ष्य दुर्लभ आनुवंशिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों की देखभाल, सहायता और उपचार तक पहुँच में सुधार करना है।

निष्कर्ष:

लाइसोसोमल भंडारण विकारों के लिए भारत की राष्ट्रीय बायोबैंक दुर्लभ रोगों के प्रबंधन, अनुसंधान ढाँचे और चिकित्सीय विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शी पहल है। यह पहल इन जटिल आनुवंशिक रोगों को बेहतर ढंग से समझने, समय पर निदान करने और भविष्य में प्रभावी उपचार विकसित करने की दिशा में नई आशा प्रदान करती है।