सन्दर्भ:
हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को जल्द लागू करने के लिए महत्वपूर्ण विधेयकों को मंजूरी दे दी है। यह कदम न केवल महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि देश की विधायी संरचना में एक व्यापक बदलाव का संकेत भी है।
पृष्ठभूमि और घटनाक्रम:
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- सितंबर 2023 में संसद द्वारा पारित 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (128वां संविधान संशोधन विधेयक) में यह प्रावधान था कि आरक्षण जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation) के बाद ही प्रभावी होगा। हालांकि, जनगणना में हो रही देरी को देखते हुए सरकार ने अब एक रणनीतिक बदलाव किया है।
- मंत्रिमंडल ने तय किया है कि महिला कोटा लागू करने की प्रक्रिया को अगली जनगणना से 'डिलिंक' (अलग) कर दिया जाए। इसके बजाय, 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके परिसीमन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव है, ताकि 2029 के आम चुनावों तक महिला आरक्षण पूरी तरह से लागू हो सके।
- सितंबर 2023 में संसद द्वारा पारित 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (128वां संविधान संशोधन विधेयक) में यह प्रावधान था कि आरक्षण जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation) के बाद ही प्रभावी होगा। हालांकि, जनगणना में हो रही देरी को देखते हुए सरकार ने अब एक रणनीतिक बदलाव किया है।
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संसद के स्वरूप में बड़ा बदलाव:
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- इस निर्णय का सबसे बड़ा प्रभाव लोकसभा की सीटों की संख्या पर पड़ेगा। मौजूदा सीटों में कटौती किए बिना 33% कोटा सुनिश्चित करने के लिए, सरकार ने लोकसभा की सीटों में 50% वृद्धि का प्रस्ताव रखा है।
- इसके तहत सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो जाएगी, जिनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसमें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों के भीतर भी 33% कोटा महिलाओं के लिए होगा।
- इस निर्णय का सबसे बड़ा प्रभाव लोकसभा की सीटों की संख्या पर पड़ेगा। मौजूदा सीटों में कटौती किए बिना 33% कोटा सुनिश्चित करने के लिए, सरकार ने लोकसभा की सीटों में 50% वृद्धि का प्रस्ताव रखा है।
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महत्व:
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- यह निर्णय भारतीय राजनीति में महिलाओं की 'सांकेतिक उपस्थिति' को 'सक्रिय भागीदारी' में बदलने की क्षमता रखता है।
- वर्तमान में लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या लगभग 15% है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।
- 33% आरक्षण से नीति-निर्माण में लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ेगी और जमीनी स्तर के मुद्दों को अधिक प्राथमिकता मिलेगी।
- यह निर्णय भारतीय राजनीति में महिलाओं की 'सांकेतिक उपस्थिति' को 'सक्रिय भागीदारी' में बदलने की क्षमता रखता है।
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चुनौतियाँ:
हालांकि, 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का विस्तार एक जटिल प्रक्रिया हो सकती है, विशेषकर उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन को लेकर।
अन्य दलों और नागरिक समाज की नजर अब इस बात पर होगी कि सरकार इन भौगोलिक और जनसांख्यिकीय असंतुलन को कैसे संभालती है।
निष्कर्ष:
महिला आरक्षण बिल की मंजूरी भारत के समावेशी विकास के संकल्प को दोहराती है। यदि यह 2029 तक सफलतापूर्वक लागू होता है, तो यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए एक नए युग की शुरुआत होगी, जहाँ 'नारी शक्ति' राष्ट्र के भविष्य को गढ़ने में बराबर की हिस्सेदार होगी।

