सन्दर्भ:
हाल ही में, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 को अगस्त 2026 में संसद द्वारा पारित किया गया। इसका उद्देश्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 में संशोधन करके नियामक व्यवस्था को आधुनिक बनाना, विलंबित भुगतानों को कम करना, विवादों का शीघ्र समाधान सुनिश्चित करना तथा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए व्यवसाय करने में सुगमता को बढ़ावा देना है।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का महत्व:
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम भारत की अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, इनका सकल घरेलू उत्पाद में 31.1 प्रतिशत, विनिर्माण उत्पादन में 35.4 प्रतिशत तथा निर्यात में 48.58 प्रतिशत योगदान है। अगस्त 2026 तक लगभग 9.16 करोड़ सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम उद्यम मंच पर पंजीकृत हैं, जिनमें 40 करोड़ से अधिक लोग कार्यरत हैं। ये रोजगार सृजन, उद्यमिता, निर्यात तथा समावेशी क्षेत्रीय विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
विधेयक के प्रमुख प्रावधान:
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- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का वर्गीकरण: संशोधन के अंतर्गत उद्यमों का वर्गीकरण संयंत्र एवं मशीनरी/उपकरण में निवेश तथा वार्षिक कारोबार के आधार पर किया जाएगा। इससे उद्यम के आकार का अधिक व्यापक और प्रभावी आकलन संभव होगा।
- निःशुल्क और स्वैच्छिक पंजीकरण: सभी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए पंजीकरण निःशुल्क और स्वैच्छिक होगा। केंद्र सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय डिजिटल मंच अधिसूचित किया जा सकता है, जबकि राज्य सरकारें अपने स्वयं के डिजिटल मंच स्थापित कर सकती हैं।
- व्यापार प्राप्य बट्टाकरण प्रणाली (TReDS) को सुदृढ़ करना: सभी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (CPSEs) के लिए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों से खरीदी गई वस्तुओं और सेवाओं के चालानों का निपटान व्यापार प्राप्य बट्टाकरण प्रणाली (TReDS) के माध्यम से करना अनिवार्य होगा। इससे विलंबित भुगतान के कारण उत्पन्न कार्यशील पूंजी के दबाव को कम किया जा सकेगा।
- विवादों का शीघ्र समाधान: राज्य सरकारें पर्याप्त आधारभूत संरचना और डिजिटल प्रणालियों से युक्त एक से अधिक सूक्ष्म एवं लघु उद्यम सुविधा परिषदें (MSEFCs) स्थापित कर सकेंगी। विधेयक में विवाद समाधान के लिए समय-सीमाएं निर्धारित की गई हैं—
- मध्यस्थता के लिए 90 दिन,
- मध्यस्थता विफल होने के बाद पंचाट को संदर्भित करने के लिए 30 दिन, तथा
- पक्षकारों की दलीलें पूरी होने के बाद पंचाट निर्णय देने के लिए 90 दिन।
- मध्यस्थता के लिए 90 दिन,
- सूक्ष्म एवं लघु उद्यम आपूर्तिकर्ताओं की सुरक्षा: न्यायालय कार्यवाही के दौरान जमा की गई पंचाट राशि के उचित हिस्से का भुगतान सूक्ष्म एवं लघु उद्यम आपूर्तिकर्ताओं को करने का निर्देश दे सकते हैं। यदि कोई मामला छह महीने से अधिक समय तक लंबित रहता है, तो पंचाट द्वारा निर्धारित राशि का कम से कम 50 प्रतिशत सूक्ष्म एवं लघु उद्यम आपूर्तिकर्ता को भुगतान करना अनिवार्य होगा।
- बकाया राशि की वसूली: मध्यस्थता से हुए समझौते तथा पंचाट के निर्णयों के अंतर्गत देय राशि की वसूली भूमि राजस्व के बकाये के रूप में की जा सकेगी। इसके लिए जिला कलेक्टर, उपायुक्त अथवा सरकार द्वारा अधिसूचित किसी अन्य प्राधिकारी के माध्यम से वसूली की जा सकेगी।
- अपराधों का गैर-अपराधीकरण: अनुपालन से संबंधित कुछ अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है। नई व्यवस्था में अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई को कम करते हुए चेतावनी, दंड और जुर्माने पर अधिक जोर दिया गया है, जबकि कानून के पालन को सुनिश्चित करने के लिए निवारक प्रभाव बनाए रखा गया है।
- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का वर्गीकरण: संशोधन के अंतर्गत उद्यमों का वर्गीकरण संयंत्र एवं मशीनरी/उपकरण में निवेश तथा वार्षिक कारोबार के आधार पर किया जाएगा। इससे उद्यम के आकार का अधिक व्यापक और प्रभावी आकलन संभव होगा।
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सहायक डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र:
ये सुधार उद्यम पंजीकरण, उद्यम सहायता, TReDS तथा ऑनलाइन विवाद समाधान (ODR) मंच जैसी व्यवस्थाओं के पूरक हैं। ऑनलाइन विवाद समाधान मंच जून 2025 में शुरू किया गया था, जबकि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 161 सूक्ष्म एवं लघु उद्यम सुविधा परिषदें (MSEFCs) स्थापित की जा चुकी हैं।
महत्व:
यह विधेयक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की तरलता, नियामकीय अनुपालन, विवाद समाधान तथा व्यवसाय करने में सुगमता में सुधार कर सकता है। शीघ्र भुगतान और मजबूत वसूली तंत्र से इन उद्यमों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और आर्थिक दृढ़ता बढ़ सकती है।
निष्कर्ष:
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 एक सरल, डिजिटल और समयबद्ध सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। विलंबित भुगतानों, नियामकीय बोझ और विवाद समाधान से जुड़ी समस्याओं का समाधान करके यह विधेयक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को रोजगार, निर्यात, नवाचार और समावेशी आर्थिक विकास के प्रमुख वाहक के रूप में और अधिक सशक्त बनाने में सहायक हो सकता है।

