संदर्भ:
हाल ही में, संसद के मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया। यह विधेयक एमएसएमई विकास अधिनियम, 2006 का स्थान लेता है तथा डिजिटल पंजीकरण को बढ़ावा देने, समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करने और संस्थागत वित्त तक पहुँच को आसान बनाने के माध्यम से एमएसएमई क्षेत्र को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है।
एमएसएमई विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 के बारे में:
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- यह संशोधन विधेयक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के निःशुल्क एवं स्वैच्छिक पंजीकरण के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म स्थापित करने का प्रावधान करता है।
- साथ ही, यह सभी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (CPSEs) के लिए यह अनिवार्य बनाता है कि वे एमएसएमई से की गई खरीद के भुगतान ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) के माध्यम से करें।
- इन प्रावधानों का उद्देश्य एमएसएमई क्षेत्र में औपचारिककरण (Formalisation) को बढ़ावा देना, पारदर्शिता सुनिश्चित करना तथा समय पर भुगतान उपलब्ध कराकर उनकी वित्तीय स्थिति को मजबूत बनाना है।
- यह संशोधन विधेयक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के निःशुल्क एवं स्वैच्छिक पंजीकरण के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म स्थापित करने का प्रावधान करता है।
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संशोधन की आवश्यकता:
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- एमएसएमई भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, फिर भी वे अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इनमें भुगतान में देरी, सस्ती संस्थागत ऋण सुविधा का अभाव, तकनीकी पिछड़ापन तथा जटिल नियामकीय प्रक्रियाएँ प्रमुख हैं।
- विशेष रूप से भुगतान में देरी से उनकी कार्यशील पूंजी (Working Capital) प्रभावित होती है, जिससे उत्पादन, निवेश और व्यवसाय की निरंतरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए तरलता बढ़ाने, औपचारिककरण को प्रोत्साहित करने तथा प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए मजबूत कानूनी और संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता थी।
- एमएसएमई भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, फिर भी वे अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इनमें भुगतान में देरी, सस्ती संस्थागत ऋण सुविधा का अभाव, तकनीकी पिछड़ापन तथा जटिल नियामकीय प्रक्रियाएँ प्रमुख हैं।
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एमएसएमई का महत्व:
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- सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं। ये भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 30–31%, विनिर्माण उत्पादन में लगभग 36%, तथा कुल निर्यात में लगभग 41–45% का योगदान देते हैं।
- यह क्षेत्र 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जिससे यह कृषि के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता बनता है।
- एमएसएमई उद्यमिता, नवाचार तथा स्थानीय संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा देकर समावेशी आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करते हैं। ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में इनकी व्यापक उपस्थिति संतुलित क्षेत्रीय विकास, क्षेत्रीय असमानताओं में कमी, तथा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसे राष्ट्रीय अभियानों को मजबूती प्रदान करती है।
- सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं। ये भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 30–31%, विनिर्माण उत्पादन में लगभग 36%, तथा कुल निर्यात में लगभग 41–45% का योगदान देते हैं।
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प्रमुख चुनौतियाँ:
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- महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद एमएसएमई क्षेत्र कई संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रहा है।
- बड़े उद्योगों तथा सरकारी संस्थानों द्वारा भुगतान में देरी से कार्यशील पूंजी पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। अनेक उद्यमों को सस्ती संस्थागत ऋण सुविधा नहीं मिल पाती, जिसके कारण उन्हें अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।
- इसके अतिरिक्त कम तकनीकी अपनाने, पुरानी उत्पादन तकनीकों, तथा डिजिटल क्षमताओं की कमी से उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होती है। साथ ही नियामकीय एवं अनुपालन संबंधी जटिलताएँ तथा घरेलू एवं वैश्विक बाजारों तक सीमित पहुँच एमएसएमई के विकास और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains - GVCs) में उनकी भागीदारी को सीमित करती हैं।
- महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद एमएसएमई क्षेत्र कई संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रहा है।
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सरकारी पहलें:
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- एमएसएमई क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए सरकार ने अनेक महत्वपूर्ण पहलें शुरू की हैं।
- उद्यम पंजीकरण (Udyam Registration) उद्यमों के डिजिटल एवं सरल पंजीकरण की सुविधा प्रदान करता है।
- ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) के माध्यम से एमएसएमई को समय पर भुगतान प्राप्त करने और तरलता बढ़ाने में सहायता मिलती है।
- इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) बिना जमानत के ऋण उपलब्ध कराती है।
- राइजिंग एंड एक्सेलेरेटिंग एमएसएमई परफॉर्मेंस (RAMP) कार्यक्रम संस्थागत क्षमता एवं प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाता है।
- एमएसएमई समाधान (MSME SAMADHAAN) भुगतान में देरी से जुड़े विवादों के समाधान के लिए कार्य करता है, जबकि एमएसएमई संबंध (MSME SAMBANDH) केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा एमएसएमई से की गई खरीद की निगरानी करता है।
- इसके अतिरिक्त ASPIRE तथा SFURTI जैसी योजनाएँ नवाचार, ग्रामीण उद्यमिता, क्लस्टर विकास तथा पारंपरिक उद्योगों के पुनर्जीवन को बढ़ावा देती हैं।
- एमएसएमई क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए सरकार ने अनेक महत्वपूर्ण पहलें शुरू की हैं।
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आगे की राह:
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- एमएसएमई विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 एक अधिक सशक्त, प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर एमएसएमई क्षेत्र के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि इसकी सफलता प्रभावी क्रियान्वयन, समय पर भुगतान संबंधी प्रावधानों के कड़े अनुपालन, डिजिटल तकनीकों के व्यापक उपयोग, तकनीकी उन्नयन तथा सस्ती संस्थागत ऋण सुविधा की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।
- यदि इन सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो एमएसएमई न केवल आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और रोजगार सृजन के लक्ष्यों को गति देंगे, बल्कि निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने तथा विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।
- एमएसएमई विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 एक अधिक सशक्त, प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर एमएसएमई क्षेत्र के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि इसकी सफलता प्रभावी क्रियान्वयन, समय पर भुगतान संबंधी प्रावधानों के कड़े अनुपालन, डिजिटल तकनीकों के व्यापक उपयोग, तकनीकी उन्नयन तथा सस्ती संस्थागत ऋण सुविधा की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।
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