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Blog / 24 Feb 2026

अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय 2026

सन्दर्भ:

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार एवं अन्य मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य और स्वच्छता को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन, गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार का अभिन्न अंग घोषित किया। यह निर्णय केवल एक सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दे की मान्यता नहीं है, बल्कि यह भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र में लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय की अवधारणा को नए आयाम प्रदान करता है।

      • सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को कल्याणकारी योजनाओं के दायरे से निकालकर न्यायिक रूप से लागू किए जा सकने वाले मौलिक अधिकारों की श्रेणी में ला दिया है। यह परिवर्तन प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मक है क्योंकि अब राज्य की जिम्मेदारी केवल नीति निर्माण तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि संवैधानिक जवाबदेही के दायरे में आएगी।

संवैधानिक आधार:

      • अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवनकी व्याख्या समय के साथ विस्तृत होती रही है। न्यायालय ने इसे केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित न रखकर गरिमापूर्ण जीवनके अधिकार के रूप में विकसित किया है। इसी क्रम में मासिक धर्म स्वास्थ्य को गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता से जोड़ना इस बात की पुष्टि करता है कि जैविक वास्तविकताओं की उपेक्षा समानता की अवधारणा को खोखला बना देती है।
      • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि किसी लड़की को मासिक धर्म के दौरान सुरक्षित शौचालय, स्वच्छ जल, स्वच्छता उत्पाद या अपशिष्ट निपटान की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो यह उसकी गरिमा, निजता और समान अवसरों के अधिकार का उल्लंघन है। इस प्रकार, यह निर्णय अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (लिंग आधारित भेदभाव का निषेध) के साथ मिलकर पढ़ा जाना चाहिए।
      • यह दृष्टिकोण पूर्ववर्ती निर्णयों की संवैधानिक परंपरा में निहित है, जैसे सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन तथा के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ, जिनमें शारीरिक स्वायत्तता और निजता को मौलिक स्वतंत्रता का केंद्र माना गया था। मासिक धर्म स्वास्थ्य को इन्हीं सिद्धांतों की निरंतरता में समझा जाना चाहिए।

मासिक धर्म स्वास्थ्य मौलिक अधिकार

संरचनात्मक असमानता:

      • इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि न्यायालय ने मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं को व्यक्तिगत असुविधा या सामाजिक वर्जना का परिणाम न मानकर संरचनात्मक अधिकारों की समस्याके रूप में पहचाना।
      • ग्रामीण और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली अनेक छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान विद्यालय न जाने के लिए विवश होना पड़ता है। अलग-अलग शौचालयों का अभाव, सुरक्षित जल की कमी, सैनिटरी उत्पादों की अनुपलब्धता और अपशिष्ट प्रबंधन की असुविधा, ये सभी कारक मिलकर शिक्षा तक उनकी निरंतर पहुंच को बाधित करते हैं।
      • इस प्रकार, मासिक धर्म संबंधी अवसंरचना की कमी केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि शिक्षा, आर्थिक अवसर और समान नागरिकता के संवैधानिक वादे का प्रश्न बन जाती है। न्यायालय ने इस वास्तविकता को स्वीकारते हुए शिक्षा के अधिकार को गरिमा-आधारित मासिक धर्म स्वास्थ्य से जोड़ा है।

शिक्षा, समानता और ठोस समानता:

      • समानता का मूल सिद्धांत समान को समान व्यवहारपर आधारित है, किंतु न्यायालय ने यह संकेत दिया कि जैविक और सामाजिक भिन्नताओं की अनदेखी कर दी जाए तो औपचारिक समानता वास्तविक असमानता को और गहरा कर सकती है।
      • मासिक धर्म स्वास्थ्य को शिक्षा के अधिकार से जोड़कर न्यायालय ने ठोस समानता” (Substantive Equality) की अवधारणा को सुदृढ़ किया है। इसका तात्पर्य यह है कि राज्य को उन विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा जो महिलाओं और लड़कियों को जैविक रूप से प्रभावित करती हैं।
      • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी, महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर सम्मेलन (CEDAW) और संयुक्त राष्ट्र के जल एवं स्वच्छता संबंधी विशेष प्रतिवेदकों ने मासिक धर्म स्वच्छता को लैंगिक समानता और शिक्षा के अधिकार से जोड़ा है। इस दृष्टि से भारतीय न्यायालय का निर्णय वैश्विक मानवाधिकार विमर्श के अनुरूप है।

न्यायालय के निर्देश:

      • न्यायालय ने केवल अधिकार की घोषणा तक सीमित न रहकर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट निर्देश दिए:
        • सभी स्कूलों में कार्यात्मक एवं लिंग-विभाजित शौचालय सुनिश्चित करना।
        • सुरक्षित जल, स्वच्छ अपशिष्ट निपटान प्रणाली और मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों की उपलब्धता।
        • सरकारी स्कूलों की राज्य के प्रति जवाबदेही और अनुपालन न करने वाले निजी स्कूलों के पंजीकरण रद्द करने की संभावना।
        • इन निर्देशों से यह स्पष्ट है कि न्यायालय ने कार्यान्वयन को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया है। यह निर्णय नीतिगत सलाह से आगे बढ़कर दायित्व-आधारित प्रशासनिक संरचना की मांग करता है।

चुनौतियाँ:

      • भारतीय संवैधानिक अनुभव यह बताते है कि अधिकारों की न्यायिक मान्यता पर्याप्त नहीं होती, उनका प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, 15-24 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं द्वारा मासिक धर्म के दौरान स्वच्छ विधियों के उपयोग का प्रतिशत NFHS-4 के 57.6% से बढ़कर NFHS-5 में 77.3% हो गया है। यह प्रगति सराहनीय है, परंतु इसका अर्थ यह भी है कि लगभग एक-चौथाई युवा महिलाएं अब भी सुरक्षित और स्वच्छ मासिक धर्म प्रबंधन से वंचित हैं। इसी प्रकार, स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन संबंधी दिशानिर्देश जारी किए हैं।
      • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़े बताते हैं कि स्वच्छ मासिक धर्म विधियों का उपयोग बढ़ा है, परंतु ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में अभी भी असमानता विद्यमान है।
      • मासिक धर्म स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता मिलने के बाद सबसे बड़ी चुनौती इसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं
        • अवसंरचनात्मक कमी: कई विद्यालयों में शौचालय तो हैं पर वे कार्यात्मक नहीं हैं। जल, साबुन, सुरक्षित निपटान सुविधा और गोपनीयता के अभाव में छात्राएँ मासिक धर्म के दौरान विद्यालय नहीं आती हैं।
        • वित्तीय प्रतिबद्धता का अभाव: मासिक धर्म स्वच्छता कार्यक्रम अक्सर परियोजना-आधारित होते हैं और उनमें निरंतर बजट, निगरानी तथा सामाजिक लेखा परीक्षा का अभाव रहता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार स्वच्छ विधियों का उपयोग बढ़कर 77.3% हुआ है, फिर भी लगभग एक-चौथाई युवतियाँ इससे वंचित हैं जो संरचनात्मक असमानता को दर्शाता है।
        • सामाजिक वर्जनाएँ: मासिक धर्म को लेकर प्रचलित कलंक और चुप्पी लड़कियों के आत्मविश्वास, शिक्षा और सामाजिक भागीदारी को प्रभावित करती है।
        • पर्यावरणीय चुनौती: अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल निपटान तंत्र का अभाव है।

निष्कर्ष:

मासिक धर्म को लंबे समय तक निजी विषय माना जाता रहा है किंतु इस निर्णय ने इसे सार्वजनिक अधिकार और संस्थागत जिम्मेदारी के प्रश्न में रूपांतरित कर दिया है। यह निर्णय अनुच्छेद 21 के दायरे को निरंतर विस्तारित करने वाली न्यायिक प्रवृत्ति का हिस्सा है। मानसिक स्वास्थ्य, प्रजनन स्वायत्तता, विकलांगता पहुंच और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को भी हाल के वर्षों में गरिमामूलक जीवन के हिस्से के रूप में मान्यता मिली है। मासिक धर्म स्वास्थ्य को संवैधानिक संरक्षण देकर न्यायालय ने एक ऐसे क्षेत्र को संबोधित किया है जो ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित रहा है। यह निर्णय यह स्वीकार करता है कि असमानता हमेशा प्रत्यक्ष कानूनी भेदभाव के रूप में प्रकट नहीं होती; वह संस्थागत ढांचे और अवसंरचना की कमी में भी निहित हो सकती है।

केंद्र और राज्य सरकारें इसे सहायक कल्याणकारी व्यय के रूप में नहीं, बल्कि अनिवार्य सार्वजनिक स्वास्थ्य निवेश के रूप में देखना चाहिए। दीर्घकालिक वित्तीय प्रतिबद्धता, सामुदायिक जागरूकता अभियान और स्कूल-स्तरीय निगरानी तंत्र के बिना यह अधिकार अधूरा रहेगा। अंततः, यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र के उस वादे को सुदृढ़ करता है जिसमें समान नागरिकता केवल सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि व्यावहारिक वास्तविकता हो। यदि प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह केवल मासिक धर्म स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं रहेगा, बल्कि यह गरिमा, समानता और संवैधानिक नैतिकता की दिशा में एक निर्णायक कदम सिद्ध होगा।

 

UPSC/PCS मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न: मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य को शिक्षा और गरिमा के अधिकार से जोड़ते हुए सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय का विश्लेषण कीजिए।