दत्तक माताओं के लिए मातृत्व अवकाश
संदर्भ:
हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सभी दत्तक माताओं को, बच्चे की आयु की परवाह किए बिना, 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश प्रदान किया। इस निर्णय में मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के उन प्रावधानों को निरस्त किया गया, जो वर्तमान में दत्तक माताओं के लिए मातृत्व लाभ को केवल तीन माह से कम आयु के बच्चों तक सीमित करते थे।
मुद्दे की पृष्ठभूमि:
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- भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह मामला दत्तक माताओं के लिए मातृत्व लाभ से संबंधित भेदभावपूर्ण प्रावधानों को लेकर उठी चिंताओं से उत्पन्न हुआ। मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(4) तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के समान प्रावधानों के तहत, दत्तक माताओं को केवल तभी 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलता था, जब गोद लिया गया बच्चा तीन माह से कम आयु का हो। इससे एक मनमाना वर्गीकरण उत्पन्न हुआ, जिसके कारण बड़े बच्चों को गोद लेने वाली माताएँ मातृत्व लाभ से वंचित रह जाती थीं।
- एक जनहित याचिका (PIL) में इस प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी गई। इसमें तर्क दिया गया कि यह दत्तक माताओं के साथ भेदभाव करता है और उनकी देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों को मान्यता नहीं देता। साथ ही, यह भी रेखांकित किया गया कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत गोद लेने की प्रक्रिया समय लेने वाली होती है, जिससे तीन माह से कम आयु के बच्चों को गोद लेना कठिन हो जाता है और अधिकांश दत्तक अभिभावकों के लिए यह लाभ अप्रभावी हो जाता है।
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह मामला दत्तक माताओं के लिए मातृत्व लाभ से संबंधित भेदभावपूर्ण प्रावधानों को लेकर उठी चिंताओं से उत्पन्न हुआ। मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(4) तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के समान प्रावधानों के तहत, दत्तक माताओं को केवल तभी 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलता था, जब गोद लिया गया बच्चा तीन माह से कम आयु का हो। इससे एक मनमाना वर्गीकरण उत्पन्न हुआ, जिसके कारण बड़े बच्चों को गोद लेने वाली माताएँ मातृत्व लाभ से वंचित रह जाती थीं।
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निर्णय के बारे में:
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- न्यायालय ने सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 60(4) को सीमित रूप से निरस्त (reading down) करते हुए दत्तक माताओं के लिए आयु-आधारित प्रतिबंध को समाप्त कर दिया और इसे संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 का उल्लंघन माना। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मातृत्व लाभ केवल प्रसव से नहीं, बल्कि देखभाल की जिम्मेदारियों से जुड़े होते हैं, और इस प्रकार दत्तक ग्रहण को प्रजनन स्वायत्तता का हिस्सा माना।
- महत्वपूर्ण रूप से, इस निर्णय में मातृत्व संरक्षण को “मौलिक मानव अधिकार” बताया गया, जो आर्थिक सुरक्षा और कार्यस्थल पर समावेशन के लिए आवश्यक है। न्यायालय ने पितृत्व अवकाश की आवश्यकता पर भी बल दिया, यह कहते हुए कि बाल देखभाल एक साझा जिम्मेदारी है और इसकी अनुपस्थिति लैंगिक रूढ़ियों को मजबूत करती है। यह व्याख्या समानता, गरिमा और सार्थक न्याय के संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करती है।
- न्यायालय ने सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 60(4) को सीमित रूप से निरस्त (reading down) करते हुए दत्तक माताओं के लिए आयु-आधारित प्रतिबंध को समाप्त कर दिया और इसे संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 का उल्लंघन माना। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मातृत्व लाभ केवल प्रसव से नहीं, बल्कि देखभाल की जिम्मेदारियों से जुड़े होते हैं, और इस प्रकार दत्तक ग्रहण को प्रजनन स्वायत्तता का हिस्सा माना।
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निर्णय का महत्व:
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- भारत के सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दत्तक माताओं को बिना आयु-सीमा के मातृत्व लाभ प्रदान करता है, जिससे अनुच्छेद 14 के तहत सार्थक समानता और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा को बढ़ावा मिलता है। मातृत्व को केवल जैविक प्रसव तक सीमित न मानकर, यह निर्णय अभिभावकीय अधिकारों के प्रति देखभाल-आधारित दृष्टिकोण को अपनाता है।
- यह निर्णय बड़े बच्चों को गोद लेने को प्रोत्साहित कर बाल कल्याण को भी मजबूत करता है। साथ ही, न्यायालय द्वारा पितृत्व अवकाश पर दिया गया जोर लैंगिक-तटस्थ देखभाल नीतियों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। समग्र रूप से, यह निर्णय लैंगिक न्याय, कार्यस्थल समावेशन और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप श्रम कानूनों के विकास को आगे बढ़ाता है।
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दत्तक माताओं को बिना आयु-सीमा के मातृत्व लाभ प्रदान करता है, जिससे अनुच्छेद 14 के तहत सार्थक समानता और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा को बढ़ावा मिलता है। मातृत्व को केवल जैविक प्रसव तक सीमित न मानकर, यह निर्णय अभिभावकीय अधिकारों के प्रति देखभाल-आधारित दृष्टिकोण को अपनाता है।
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निष्कर्ष:
यह निर्णय मातृत्व की जैविक अवधारणा से हटकर देखभाल-आधारित दृष्टिकोण की ओर एक प्रगतिशील परिवर्तन को दर्शाता है। आयु-सीमा को समाप्त कर, सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया है कि मातृत्व लाभ केवल जन्म तक सीमित नहीं, बल्कि गरिमा, समानता और बाल कल्याण पर आधारित हैं।

