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Blog / 01 Apr 2026

भारत में मातृ मृत्यु दर: कारण, राज्यों के बीच असमानताएँ और SDG 2030 की चुनौती

भारत में मातृ मृत्यु दर

संदर्भ:

हाल ही में 'द लैंसेट ऑब्सटेट्रिक्स, गायनेकोलॉजी एंड विमेंस हेल्थ' जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन ने भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र के समक्ष एक गंभीर चिंता व्यक्त की है। अध्ययन के अनुसार, भारत के लिए वर्ष 2030 तक सतत विकास लक्ष्य (SDG 3.1) के तहत मातृ मृत्यु दर (MMR) को प्रति 1 लाख जीवित जन्मों पर 70 से नीचे लाना एक कठिन चुनौती बनता जा रहा है।

अध्ययन के मुख्य बिंदु:

      • वर्तमान स्थिति:
        • अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत की मातृ मृत्यु दर (MMR) लगभग 116 दर्ज की गई। यद्यपि भारत ने 1990 के 508 के स्तर की तुलना में लगभग 80% की उल्लेखनीय गिरावट हासिल की है, परंतु 2015 के बाद इस गिरावट की गति में स्पष्ट कमी देखी गई है।
        • वर्तमान में, विश्व भर में होने वाली कुल मातृ मृत्यु का लगभग 10% (करीब 24,700 मौतें) भारत में होता है।
      • क्षेत्रीय असमानता: भारत की प्रगति में राज्यों के बीच व्यापक असमानता एक प्रमुख बाधा है:
        • अग्रणी राज्य: केरल (20), महाराष्ट्र (38) और तेलंगाना (45) सहित 8 राज्यों ने पहले ही SDG लक्ष्य (70 से कम) प्राप्त कर लिया है।
        • पिछड़े राज्य: असम (205), उत्तर प्रदेश (167) और मध्य प्रदेश (163) जैसे राज्यों में स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई है। इन राज्यों में स्वास्थ्य अवसंरचना की कमी तथा सामाजिक-आर्थिक कारण मृत्यु दर को उच्च बनाए रखते हैं।

Maternal Mortality Rate in India

मृत्यु के मुख्य कारण:

अध्ययन के अनुसार, 40% से अधिक मातृ मृत्यु रोकी जा सकती हैं। इनके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

      • प्रसवोत्तर रक्तस्राव (Postpartum Haemorrhage): प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव।
      • उच्च रक्तचाप विकार: प्री-एक्लेम्प्सिया एवं एक्लेम्प्सिया।
      • संक्रमण (Sepsis): अस्वच्छ प्रसव परिस्थितियों के कारण उत्पन्न संक्रमण।
      • एनीमिया: भारतीय महिलाओं में कुपोषण एक दीर्घकालिक समस्या बनी हुई है।

सरकारी पहल:

भारत सरकार ने 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन' (NHM) के अंतर्गत कई महत्वपूर्ण योजनाएँ लागू की हैं:

      • जननी सुरक्षा योजना (JSY): संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करने हेतु नकद प्रोत्साहन।
      • सुमन (SUMAN): सुरक्षित मातृत्व आश्वासन योजना, जो निःशुल्क गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित करती है।
      • लक्ष्य (LaQshya): लेबर रूम एवं ऑपरेशन थिएटर में देखभाल की गुणवत्ता सुधारने हेतु।
      • प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA): प्रत्येक माह की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं के लिए निःशुल्क प्रसवपूर्व जाँच।

आगे की राह:

      • निगरानी तंत्र: उच्च मातृ मृत्यु दर वाले जिलों में मैटरनल डेथ सर्विलांस एंड रिस्पांस’ (MDSR) प्रणाली को सुदृढ़ करना, ताकि प्रत्येक मृत्यु के कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण हो सके।
      • मानव संसाधन: ग्रामीण क्षेत्रों में कुशल प्रसव सहायकों (Skilled Birth Attendants) एवं एनेस्थेटिस्ट्स की कमी को दूर करना।
      • पोषण पर ध्यान: केवल प्रसव नहीं, बल्कि किशोरियों एवं गर्भवती महिलाओं के पोषण (जैसे एनीमिया मुक्त भारत’) पर निवेश बढ़ाना आवश्यक है।
      • गुणवत्तापूर्ण देखभाल: संस्थागत प्रसव में वृद्धि के साथ अब ध्यान देखभाल की गुणवत्तापर केंद्रित करना होगा, ताकि अस्पताल पहुँचने के बाद किसी भी महिला की मृत्यु न हो।

निष्कर्ष:

भारत ने मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, किन्तु द लैंसेटकी रिपोर्ट एक गंभीर चेतावनी प्रस्तुत करती है। यदि वर्ष 2030 तक 70 के लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो नीतिगत प्रयासों को विशेष रूप से पिछड़े राज्योंतथा अंतिम पंक्ति की महिलाकी स्वास्थ्य सुरक्षा पर केंद्रित करना होगा।