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Blog / 24 Feb 2026

गुजरात में विवाह पंजीकरण

संदर्भ:

हाल ही में, गुजरात सरकार ने गुजरात विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2006 में संशोधन प्रस्तावित किए हैं, जिनके तहत सभी विवाह पंजीकरणों के लिए माता-पिता को सूचित करना और उनकी सहमति की घोषणा अनिवार्य की जाएगी। मसौदा नियमों के अनुसार, दंपतियों को आवेदन करने से पहले यह बताना होगा कि क्या उन्होंने अपने माता-पिता को सूचित किया है, अपने माता-पिता के संपर्क और पहचान संबंधी विवरण प्रदान करने होंगे और पंजीकरण अधिकारियों को प्रक्रिया के दौरान औपचारिक रूप से परिवारों को सूचित करना होगा, साथ ही पंजीकरण पूर्ण होने से पहले 30 दिनों की प्रतीक्षा अवधि होगी। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो वयस्क विवाहों में राज्य द्वारा माता-पिता की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाने वाला गुजरात भारत का पहला राज्य बन सकता है।

सरकार का पक्ष:

      • राज्य सरकार का कहना है कि यह कदम धोखाधड़ी, भागकर विवाह (एलोपमेंट) तथा विवाह पंजीकरण प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है, विशेषकर उन मामलों में जहाँ झूठी पहचान या दबाव शामिल हो सकता है। 
      • यह प्रस्ताव विधानसभा में उठाई गई चिंताओं और विभिन्न समुदायों से प्राप्त सुझावों के आधार पर तैयार किया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह वास्तविक प्रेम विवाहों के विरोध में नहीं है, बल्कि धोखे और शोषण की घटनाओं को रोकना चाहती है।

कानूनी और संवैधानिक चुनौतियाँ:

      • आलोचकों का तर्क है कि यह प्रस्ताव संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रताओं, विशेष रूप से अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) के विपरीत है। अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जीवनसाथी चुनने और अपनी इच्छा से विवाह करने के अधिकार को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा माना है।
      • न्यायालय ने शफीन जहां बनाम अशोकन (हादिया मामला, 2018) तथा लक्ष्मीबाई चंदरागी बी बनाम कर्नाटक राज्य (2021) में स्पष्ट किया कि वयस्कों के विवाह के लिए परिवार या समुदाय की सहमति आवश्यक नहीं है। न्यायालय ने कहा कि विवाह की स्वतंत्रता व्यक्ति की गरिमा और स्वायत्तता से जुड़ी हुई है।
      • कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यद्यपि विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत विवाह से पहले 30 दिन की सार्वजनिक सूचना देना आवश्यक है, किंतु वयस्कों के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य नहीं है। अतः यदि कोई राज्य कानून ऐसी सहमति को अनिवार्य बनाता है, तो उसे मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

दोनों पक्षों के तर्क:

      • समर्थकों के अनुसार, यह नियम सुरक्षा और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए हैं, जिससे परिवार की जानकारी सुनिश्चित होगी और संभावित धोखाधड़ी को रोका जा सकेगा।
      • विरोधियों (जिनमें संपादकीय लेखक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता शामिल हैं) का मत है कि यह कदम संरक्षणवादी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विपरीत है। उनका कहना है कि इससे विशेष रूप से महिलाओं की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है, क्योंकि यह संकेत देता है कि वयस्क अपने जीवनसाथी का निर्णय स्वयं लेने में सक्षम नहीं हैं। उनके अनुसार, इससे परिवार को अप्रत्यक्ष रूप से वीटो (अस्वीकृति का अधिकार) मिल सकता है, जबकि न्यायपालिका पहले ही ऐसी सोच को अस्वीकार कर चुकी है।

निष्कर्ष:

गुजरात सरकार का यह प्रस्ताव राज्य की नीतियों और संवैधानिक स्वतंत्रताओं के बीच संभावित टकराव को उजागर करता है। जहाँ सरकार इसे एक सुरक्षात्मक उपाय के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय स्पष्ट करते हैं कि वयस्कों को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का हिस्सा है। अतः ऐसा कोई भी कानून, जो पारिवारिक स्वीकृति को व्यक्तिगत अधिकारों से ऊपर रखता हो, स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत माना जा सकता है।