संदर्भ:
प्रोफेसर माधव धनंजय गाडगिल (1942–7 जनवरी 2026), भारत के सबसे प्रतिष्ठित पारिस्थितिकीविदों और पर्यावरण चिंतकों में से एक, का पुणे में संक्षिप्त बीमारी के बाद 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनकी वैज्ञानिक सटीकता, नैतिक प्रतिबद्धता तथा प्रकृति और समाज दोनों के प्रति गहरी संवेदनशीलता ने उन्हें भारत के पर्यावरणीय विमर्श के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व बनाया।
जन-केंद्रित संरक्षण का पक्षधर:
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- समावेशी पर्यावरणवाद का दर्शन:
- पर्यावरणीय संरक्षण के उन संरक्षणवादी मॉडलों के विपरीत, जो प्रायः वन-आश्रित समुदायों को हाशिये पर धकेल देते हैं, गाडगिल का तर्क था कि लोग, विशेषकर आदिवासी, वनवासी और कृषक समुदाय परितंत्रों का अभिन्न अंग हैं और उन्हें संरक्षण की राह में बाधा नहीं, बल्कि प्रकृति के घटक के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। दशकों तक उन्होंने पर्यावरणीय शासन के एक लोकतांत्रिक, सहभागितामूलक दृष्टिकोण का समर्थन किया, जो पारिस्थितिक अखंडता को मानवाधिकारों और आजीविकाओं के साथ संतुलित करता है।
- पर्यावरणीय संरक्षण के उन संरक्षणवादी मॉडलों के विपरीत, जो प्रायः वन-आश्रित समुदायों को हाशिये पर धकेल देते हैं, गाडगिल का तर्क था कि लोग, विशेषकर आदिवासी, वनवासी और कृषक समुदाय परितंत्रों का अभिन्न अंग हैं और उन्हें संरक्षण की राह में बाधा नहीं, बल्कि प्रकृति के घटक के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। दशकों तक उन्होंने पर्यावरणीय शासन के एक लोकतांत्रिक, सहभागितामूलक दृष्टिकोण का समर्थन किया, जो पारिस्थितिक अखंडता को मानवाधिकारों और आजीविकाओं के साथ संतुलित करता है।
- पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (डब्ल्यूजीईईपी):
- 2010 में भारत सरकार द्वारा नियुक्त, गाडगिल ने पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (लोकप्रिय रूप से गाडगिल आयोग) की अध्यक्षता की। इसकी 2011 की रिपोर्ट एक मील का पत्थर सिद्ध हुई: इसमें पश्चिमी घाट के अधिकांश क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील घोषित किया गया, क्रमबद्ध संरक्षण क्षेत्रों की संस्तुति की गई, तथा जैव विविधता और स्थानीय आजीविकाओं की रक्षा हेतु समुदाय-प्रेरित पारिस्थितिक प्रबंधन और नियंत्रित विकास पर बल दिया गया। इस रिपोर्ट ने व्यापक बहस और प्रतिरोध को जन्म दिया, किंतु भारत में पारिस्थितिक संवेदनशीलता और विकास-संघर्षों की समझ को मूलतः रूपांतरित कर दिया।
- 2010 में भारत सरकार द्वारा नियुक्त, गाडगिल ने पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (लोकप्रिय रूप से गाडगिल आयोग) की अध्यक्षता की। इसकी 2011 की रिपोर्ट एक मील का पत्थर सिद्ध हुई: इसमें पश्चिमी घाट के अधिकांश क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील घोषित किया गया, क्रमबद्ध संरक्षण क्षेत्रों की संस्तुति की गई, तथा जैव विविधता और स्थानीय आजीविकाओं की रक्षा हेतु समुदाय-प्रेरित पारिस्थितिक प्रबंधन और नियंत्रित विकास पर बल दिया गया। इस रिपोर्ट ने व्यापक बहस और प्रतिरोध को जन्म दिया, किंतु भारत में पारिस्थितिक संवेदनशीलता और विकास-संघर्षों की समझ को मूलतः रूपांतरित कर दिया।
- समावेशी पर्यावरणवाद का दर्शन:
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नीति और व्यवहार में विरासत:
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- पश्चिमी घाट के अलावा भी गाडगिल का प्रभाव व्यापक रहा:
- वे जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रमुख शिल्पियों में से एक थे जो यह स्थानीय निकायों की सहभागिता के साथ न्यायसंगत जैव विविधता संरक्षण का कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
- उन्होंने वन शासन में सामुदायिक अधिकारों के प्रारूपण और कार्यान्वयन का समर्थन किया, जिससे पारिस्थितिक संरक्षकता में आदिवासी और हाशिये पर पड़े समुदायों की भूमिका सुदृढ़ हुई।
- उनके विचारों ने भारत भर में संयुक्त वन प्रबंधन और सहभागितामूलक संरक्षण मॉडलों को आकार देने में सहायता की।
- 2024 में, पारिस्थितिक सततता और समुदाय-उन्मुख संरक्षण में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का “चैम्पियन्स ऑफ़ द अर्थ” सम्मान प्रदान किया गया।
- वे जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रमुख शिल्पियों में से एक थे जो यह स्थानीय निकायों की सहभागिता के साथ न्यायसंगत जैव विविधता संरक्षण का कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
- पश्चिमी घाट के अलावा भी गाडगिल का प्रभाव व्यापक रहा:
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निष्कर्ष:
माधव गाडगिल एक ऐसी समृद्ध विरासत छोड़ गए हैं, जो समग्र पारिस्थितिकी, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक सहभागिता में निहित है। संरक्षण को विज्ञान और समाज के बीच संवाद के रूप में पुनर्परिभाषित करते हुए, उन्होंने बहिष्करणकारी संरक्षण से आगे बढ़कर जन-प्रेरित प्रकृति-संरक्षण की अवधारणा को प्रतिष्ठित किया। जैव विविधता ह्रास और सामाजिक समानता की परस्पर जुड़ी चुनौतियों से जूझते भविष्य में, मानव गरिमा के साथ पारिस्थितिक संरक्षण और सतत विकास के सामंजस्य हेतु उनका जीवन-कार्य भारत के लिए एक मार्गदर्शक प्रतिमान बना रहेगा।
