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Blog / 23 Feb 2026

केरल में नई ड्रैगनफ्लाई प्रजाति लिरियोथेमिस केरलेंसिस की खोज

संदर्भ

केरल में ड्रैगनफ्लाई (व्याधपतंग) की एक नई प्रजाति, लिरियोथेमिस केरलेंसिस (Lyriothemis keralensis) की खोज हुई है, जो राज्य की समृद्ध जैव विविधता को रेखांकित करती है। यद्यपि इसे पहली बार वर्ष 2013 में एर्नाकुलम जिले के वरापेट्टी क्षेत्र में दर्ज किया गया था, किंतु एक दशक से अधिक समय तक इसे लिरियोथेमिस एसिगस्ट्रा (Lyriothemis acigastra) समझा  गया।

यह प्रजाति ओडोनेट (Odonate) समूह से संबंधित है, जिसमें शिकारी और उभयचर प्रकृति के कीट शामिल होते हैं। इनकी विशेषता है- जलीय लार्वा अवस्था और पंखों वाले वयस्क रूप। विस्तृत आकृतिगत (morphological) अध्ययनों के माध्यम से इसकी विशिष्ट पहचान की पुष्टि की गई, जिससे केरल की समृद्ध कीट विविधता और अधिक स्पष्ट हुई। 



आवास और विशेषताएँ

लिरियोथेमिस केरलेंसिस, केरल के निम्न-भूमि तटीय मैदानी क्षेत्रों में स्थित छायादार अनानास और रबर के बागानों के भीतर वनस्पति युक्त जलकुंडों तथा सिंचाई नहरों में पाई जाती है।

यह अपेक्षाकृत छोटी प्रजाति है, जिसकी लंबाई लगभग 3 सेंटीमीटर होती है। इसमें स्पष्ट लैंगिक द्विरूपता (sexual dimorphism) पाई जाती है। नर चमकीले रक्त-लाल रंग के होते हैं, जिन पर काले चिह्न और पतला उदर (abdomen) होता है, जबकि मादा अपेक्षाकृत भारी शरीर वाली और पीले रंग की होती है, जिन पर काले चिह्न पाए जाते हैं।

यह प्रजाति मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून (मई के अंत से अगस्त तक) के दौरान दिखाई देती है। वर्ष के शेष समय में यह जलीय लार्वा अवस्था में रहती है। एक शिकारी कीट के रूप में यह मच्छरों, मक्खियों, मिज़ (midges), पतंगों और तितलियों जैसे कीटों का भक्षण करती है।

संरक्षण और पारिस्थितिक महत्व

लिरियोथेमिस केरलेंसिस की अधिकांश आबादी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर पाई जाती है, जिससे यह बागान-प्रधान परिदृश्यों में भूमि उपयोग परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है।

ओडोनेट प्रजातियों को स्वस्थ आर्द्रभूमि पारितंत्रों के जैव-संकेतक (bioindicators) के रूप में व्यापक रूप से माना जाता है। अतः इस नई प्रजाति की खोज मानव-प्रभावित परिदृश्यों में सूक्ष्म आवासों (microhabitats) के संरक्षण के पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करती है।

इस स्थानिक (endemic) प्रजाति के संरक्षण तथा केरल की उच्च कीट जैव विविधता को बनाए रखने के लिए सतत भूमि उपयोग प्रथाओं को अपनाना अत्यंत आवश्यक होगा।