लोकपाल ने अभियोजन की अनुमति की प्रक्रिया स्पष्ट करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से मांगा मार्गदर्शन
संदर्भ:
हाल ही में भारत के भ्रष्टाचार-रोधी निकाय लोकपाल ने सुप्रीम कोर्ट से लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत सरकारी अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने (अभियोजन) की अनुमति देने की सही प्रक्रिया को स्पष्ट करने का अनुरोध किया है।
मामले की पृष्ठभूमि:
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- यह मुद्दा तब सामने आया जब दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि इस अधिनियम के तहत चार्जशीट दाखिल करने और अभियोजन शुरू करने के लिए अलग-अलग अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
- इस व्याख्या के कारण कानून की सही प्रक्रिया को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई। इसी वजह से लोकपाल ने अंतिम और स्पष्ट व्याख्या के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
- यह विवाद महुआ मोइत्रा से जुड़े कथित “कैश-फॉर-क्वेरी” (पैसे लेकर संसद में प्रश्न पूछने) मामले की जांच के दौरान सामने आया।
- सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर विचार करने के लिए सहमति दे दी है और जब तक इस प्रश्न पर स्पष्टता नहीं हो जाती, तब तक इस मामले में आगे की अभियोजन प्रक्रिया पर अस्थायी रोक लगा दी है।
- यह मुद्दा तब सामने आया जब दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि इस अधिनियम के तहत चार्जशीट दाखिल करने और अभियोजन शुरू करने के लिए अलग-अलग अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न:
इस मामले का मुख्य कानूनी प्रश्न लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 20 की व्याख्या से जुड़ा है।
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- अदालत को यह तय करना है कि:
- क्या दो अलग-अलग अनुमतियाँ आवश्यक हैं?
- एक अनुमति चार्जशीट दाखिल करने के लिए
- दूसरी अनुमति अभियोजन शुरू करने के लिए
- एक अनुमति चार्जशीट दाखिल करने के लिए
- क्या दो अलग-अलग अनुमतियाँ आवश्यक हैं?
- अदालत को यह तय करना है कि:
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या
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- क्या एक ही संयुक्त अनुमति पर्याप्त है, जो चार्जशीट दाखिल करने और अभियोजन शुरू करने दोनों को शामिल करती हो?
- क्या एक ही संयुक्त अनुमति पर्याप्त है, जो चार्जशीट दाखिल करने और अभियोजन शुरू करने दोनों को शामिल करती हो?
- अदालत से यह भी अपेक्षा की जा रही है कि वह अधिनियम की धारा 20(7)(a) और धारा 20(8) के बीच संबंध को स्पष्ट करे।
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लोकपाल के बारे में:
भारत में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक स्वतंत्र लोकपाल संस्था स्थापित करने का विचार सबसे पहले 1960 के दशक में प्रशासनिक सुधार आयोग ने प्रस्तुत किया था। कई प्रयासों के बाद इसे अंततः लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के माध्यम से लागू किया गया।
संरचना (Composition):
लोकपाल में निम्न सदस्य होते हैं:
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- एक अध्यक्ष (जो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश या कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति हो सकता है)
- अधिकतम आठ सदस्य
- इनमें कम से कम 50% सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि से होने चाहिए और 50% सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक या महिला वर्ग से होने चाहिए।
- एक अध्यक्ष (जो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश या कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति हो सकता है)
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अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction):
लोकपाल निम्न व्यक्तियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर सकता है:
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- प्रधानमंत्री (कुछ सुरक्षा प्रावधानों के साथ)
- केंद्रीय मंत्री
- संसद सदस्य
- केंद्र सरकार के ग्रुप A, B, C और D अधिकारी
- सरकारी अनुदान प्राप्त गैर-सरकारी संगठनों के अधिकारी।
- प्रधानमंत्री (कुछ सुरक्षा प्रावधानों के साथ)
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शक्तियाँ और कार्य:
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- केंद्रीय सतर्कता आयोग या केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी एजेंसियों के माध्यम से प्रारंभिक जांच का आदेश देना।
- सीबीआई द्वारा की जा रही जांच की निगरानी करना।
- अपने अभियोजन प्रकोष्ठ के माध्यम से विशेष अदालतों में मुकदमा दायर करना।
- केंद्रीय सतर्कता आयोग या केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी एजेंसियों के माध्यम से प्रारंभिक जांच का आदेश देना।
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निष्कर्ष:
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अभियोजन की अनुमति से संबंधित प्रावधानों की स्पष्ट व्याख्या शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि लोकपाल अधिनियम के अधिकारों और प्रक्रियाओं को स्पष्ट किया जाता है, तो इससे भ्रष्टाचार के खिलाफ संस्थागत तंत्र और अधिक सशक्त होगा तथा साथ ही विधिक प्रक्रिया की निष्पक्षता भी सुनिश्चित होगी।
