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Blog / 23 Mar 2026

लोकपाल के जांच और अभियोजन विभाग

संदर्भ:

हाल ही में, एक संसदीय स्थायी समिति ने लोकपाल के जांच और अभियोजन विभागों के संचालन की स्थिति पर जानकारी मांगी है। समिति ने इस बात पर चिंता जताई कि लोकपाल कानून लागू होने के दस साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ये विभाग पूरी तरह कार्यशील नहीं हैं। समिति ने सरकार से इन महत्वपूर्ण संस्थागत तंत्रों की वर्तमान स्थिति और स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत करने को कहा है।

लोकपाल के बारे में:

      • लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 जनवरी 2014 में लागू हुआ था, लेकिन लोकपाल केवल 2019 में अपने अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के बाद ही पूर्ण रूप से कार्यात्मक हुआ। इस अधिनियम के तहत लोकपाल एक स्वतंत्र भ्रष्टाचार-रोधी संस्था के रूप में स्थापित किया गया है। इसे सार्वजनिक अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच करने का अधिकार है, जिसमें प्रधानमंत्री, मंत्री और अन्य उच्च पदस्थ अधिकारी भी शामिल हैं।
      • कानूनी प्रावधानों के अनुसार, लोकपाल को एक जांच विभाग स्थापित करना अनिवार्य है, जिसका नेतृत्व जांच निदेशक (Director of Inquiry) करेंगे। यह विभाग भ्रष्टाचार मामलों की प्रारंभिक जांच करेगा। इसके साथ ही एक अभियोजन विभाग भी होना चाहिए, जिसका नेतृत्व अभियोजन निदेशक (Director of Prosecution) करेंगे और यह अदालतों में मामलों की कार्रवाई करेगा। ये दोनों विभाग भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वतंत्र और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
      • हालांकि, समिति ने देखा कि जांच विभाग अभी पूरी तरह कार्यशील नहीं है। प्रमुख नियुक्तियां, जैसे कि जांच निदेशक की, लंबित हैं और स्टाफिंग अधूरी है। जबकि अभियोजन विभाग को औपचारिक रूप से जून 2025 में स्थापित किया गया, इसकी कार्यप्रणाली अभी सीमित है और अभियोजन कार्य मुख्य रूप से केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा संभाला जा रहा है।

पूर्ण कार्यशील विभागों का महत्व:

      • स्वतंत्र जांच और अभियोजन सुनिश्चित करना
      • बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता कम करना
      • जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाना
      • भ्रष्टाचार विरोधी संस्थानों में सार्वजनिक विश्वास मजबूत करना

समिति की सिफारिशें:

      • जांच निदेशक की नियुक्ति तुरंत करना
      • जांच विभाग को अनुमोदित संरचना के अनुसार पूरी तरह स्टाफ करना
      • जांच एजेंसियों के साथ समन्वय मजबूत करना
      • दोनों विभागों को समयबद्ध तरीके से पूरी तरह कार्यशील बनाना
      • प्रणाली को कुशल, उत्तरदायी और स्वतंत्र बनाना सुनिश्चित करना

आगे की राह:

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 का मुख्य उद्देश्य संस्थागत क्षमता के निर्माण में तेजी लाना, पर्याप्त जनशक्ति और संसाधन सुनिश्चित करना तथा CBI, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) और न्यायपालिका के साथ समन्वय को मजबूत करना आवश्यक है। इसके साथ ही अधिनियम के तहत मामलों की ट्रैकिंग और पारदर्शिता तंत्र में सुधार किया जाना चाहिए और समय-समय पर संसदीय निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए।

निष्कर्ष:

लोकपाल को भारत के भ्रष्टाचार विरोधी ढांचे की नींव माना गया था, लेकिन इसके जांच और अभियोजन विभागों का अधूरा संचालन इसकी प्रभावशीलता को सीमित करता है। इन विभागों को पूरी तरह कार्यशील बनाना प्रभावी शासन, कानून के शासन और संस्थागत जवाबदेही के लिए अनिवार्य है।