संदर्भ:
हाल ही में, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के किगाली संशोधन ने 15 अक्टूबर 2026 को अपनी 10वीं वर्षगाँठ पूरी की। वर्ष 2016 में अपनाए गए इस संशोधन का उद्देश्य हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) का चरणबद्ध तरीके से उपयोग कम करना है। HFCs शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं, जिनका उपयोग प्रशीतन और एयर कंडीशनिंग में किया जाता है। इससे वर्ष 2100 तक वैश्विक तापवृद्धि को 0.5°C तक रोकने में मदद मिल सकती है। वर्ष 2035 तक भारत में शीतलन की माँग दोगुने से अधिक होने का अनुमान है। ऐसे में ऊर्जा-कुशल उपकरण और रेफ्रिजरेंट का बेहतर प्रबंधन महत्त्वपूर्ण हैं।
पृष्ठभूमि:
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- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के किगाली संशोधन को 15 अक्टूबर 2016 को किगाली, रवांडा में अपनाया गया था और यह जनवरी 2019 में लागू हुआ। वर्ष 1987 में अपनाए गए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का उद्देश्य क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) और अन्य ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना है। इसने लगभग 99% नियंत्रित ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को समाप्त करने में मदद की है।
- हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) को CFCs के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया था, क्योंकि ये ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुँचाते हैं। हालाँकि, इनकी उच्च वैश्विक तापन क्षमता (GWP) इन्हें शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस बनाती है। इसलिए, किगाली संशोधन में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए HFCs के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से कम करने हेतु बाध्यकारी समय-सीमा निर्धारित की गई। भारत ने वर्ष 2021 में इस संशोधन की पुष्टि की।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के किगाली संशोधन को 15 अक्टूबर 2016 को किगाली, रवांडा में अपनाया गया था और यह जनवरी 2019 में लागू हुआ। वर्ष 1987 में अपनाए गए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का उद्देश्य क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) और अन्य ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना है। इसने लगभग 99% नियंत्रित ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को समाप्त करने में मदद की है।
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प्रमुख प्रावधान और भारत की प्रतिबद्धताएँ:
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- HFCs में चरणबद्ध कमी: अलग-अलग देशों के लिए निर्धारित समय-सीमा के अनुसार HFCs के उत्पादन और खपत में धीरे-धीरे कमी करना।
- भारत के लक्ष्य: वर्ष 2028 में HFCs के उत्पादन और खपत को स्थिर करना, वर्ष 2032 में सहमत आधार स्तर से 10% की कमी करना और वर्ष 2047 तक 85% की कमी हासिल करना।
- वित्तीय सहायता: बहुपक्षीय कोष विकासशील देशों को वैकल्पिक प्रौद्योगिकियाँ अपनाने और अनुपालन लागत को पूरा करने में सहायता प्रदान करता है।
- प्रौद्योगिकी परिवर्तन: जलवायु-अनुकूल रेफ्रिजरेंट और बेहतर शीतलन दक्षता को बढ़ावा देना।
- HFCs में चरणबद्ध कमी: अलग-अलग देशों के लिए निर्धारित समय-सीमा के अनुसार HFCs के उत्पादन और खपत में धीरे-धीरे कमी करना।
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भारत के लिए महत्त्व:
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- भारत में बढ़ते तापमान, शहरीकरण और आय में वृद्धि के कारण एयर कंडीशनर तथा प्रशीतन की माँग बढ़ रही है। ऊर्जा-कुशल उपकरण बिजली की खपत, घरेलू खर्च और विद्युत अवसंरचना पर दबाव को कम कर सकते हैं।
- यह परिवर्तन हरित विनिर्माण, तकनीकी नवाचार और रोजगार के अवसर भी प्रदान करता है। रेफ्रिजरेंट की बेहतर पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को और कम किया जा सकता है।
- भारत में बढ़ते तापमान, शहरीकरण और आय में वृद्धि के कारण एयर कंडीशनर तथा प्रशीतन की माँग बढ़ रही है। ऊर्जा-कुशल उपकरण बिजली की खपत, घरेलू खर्च और विद्युत अवसंरचना पर दबाव को कम कर सकते हैं।
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प्रमुख चुनौतियाँ:
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- किफायती शीतलन की माँग में तेजी से वृद्धि।
- ऊर्जा-कुशल उपकरणों की उच्च प्रारंभिक लागत।
- वैकल्पिक रेफ्रिजरेंट से संबंधित सुरक्षा और तकनीकी आवश्यकताएँ।
- सर्विसिंग और निपटान के दौरान रेफ्रिजरेंट का रिसाव।
- निर्माताओं और छोटे उद्यमों के लिए वित्तपोषण तथा प्रौद्योगिकी तक पहुँच संबंधी बाधाएँ।
- किफायती शीतलन की माँग में तेजी से वृद्धि।
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आगे की राह:
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- भारत को न्यूनतम ऊर्जा-प्रदर्शन मानकों को मजबूत करना चाहिए, कुशल शीतलन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना चाहिए तथा रेफ्रिजरेंट की पुनर्प्राप्ति, पुनर्चक्रण और सुरक्षित निपटान का विस्तार करना चाहिए। तकनीशियनों के कौशल विकास, छोटे व्यवसायों को वित्तीय सहायता और सतत शीतलन अवसंरचना में निवेश आवश्यक हैं।
- निष्क्रिय शीतलन, बेहतर भवन डिजाइन, शहरी हरित क्षेत्र और जिला शीतलन प्रणाली ऊर्जा-गहन एयर कंडीशनिंग पर निर्भरता को कम कर सकते हैं।
- भारत को न्यूनतम ऊर्जा-प्रदर्शन मानकों को मजबूत करना चाहिए, कुशल शीतलन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना चाहिए तथा रेफ्रिजरेंट की पुनर्प्राप्ति, पुनर्चक्रण और सुरक्षित निपटान का विस्तार करना चाहिए। तकनीशियनों के कौशल विकास, छोटे व्यवसायों को वित्तीय सहायता और सतत शीतलन अवसंरचना में निवेश आवश्यक हैं।
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निष्कर्ष:
किगाली संशोधन दर्शाता है कि बाध्यकारी लक्ष्यों, तकनीकी नवाचार और वित्तीय सहायता के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान कर सकता है। भारत के लिए HFCs में चरणबद्ध कमी को ऊर्जा-कुशल शीतलन और जिम्मेदार रेफ्रिजरेंट प्रबंधन के साथ जोड़ना बढ़ती शीतलन आवश्यकताओं तथा जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।

