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Blog / 19 Oct 2026

केरलम वन्यजीव सर्वेक्षण में दर्ज की गईं 36 नई प्रजातियां

संदर्भ:

हाल ही में, केरल वन एवं वन्यजीव विभाग ने ट्रावणकोर नेचर हिस्ट्री सोसाइटी (TNHS) के सहयोग से 8 से 11 अक्टूबर, 2026 तक चार दिवसीय वन्यजीव सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण में केरल के तीन अभयारण्यों में वन्यजीवों के 36 नए रिकॉर्ड दर्ज किए गए। सर्वेक्षण में पक्षियों, तितलियों और ड्रैगनफ्लाई एवं डैम्सलफ्लाई (Odonates) की कुल 395 प्रजातियाँ दर्ज की गईं, जिनमें पश्चिमी घाट की 24 स्थानिक प्रजातियाँ शामिल हैं।

सर्वेक्षण के प्रमुख निष्कर्ष:

      • इस सर्वेक्षण में दस आधार शिविरों के माध्यम से निम्नलिखित क्षेत्रों को शामिल किया गया:
        • चिम्मोनी वन्यजीव अभयारण्य
        • पीची-वाझानी वन्यजीव अभयारण्य
        • चुलन्नूर मोर अभयारण्य
      • प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित थे:
        • पक्षी: 165 प्रजातियाँ, जिनमें चेकलिस्ट में 8 नई प्रविष्टियाँ शामिल हैं।
        • तितलियाँ: 174 प्रजातियाँ, जिनमें चेकलिस्ट में 22 नई प्रविष्टियाँ शामिल हैं।
        • ओडोनेट्स (ड्रैगनफ्लाई और डैम्सलफ्लाई): 56 प्रजातियाँ, जिनमें चेकलिस्ट में 6 नई प्रविष्टियाँ शामिल हैं।
      • सर्वेक्षण में पतंगों की 52 प्रजातियाँ, चींटियों की 22 प्रजातियाँ, सिकाडा की 5 प्रजातियाँ और मकड़ियों की लगभग 30 प्रजातियाँ भी दर्ज की गईं। इस क्षेत्र में बाघ, तेंदुए, एशियाई हाथी और गौर भी पाए गए।

दर्ज की गई प्रमुख प्रजातियाँ:

      • प्रमुख प्रजातियों में मालाबार लार्क, पर्पल हेरॉन, साइबेरियन स्टोनचैट और ईस्टर्न येलो वैगटेल शामिल हैं।
      • पश्चिमी घाट की स्थानिक प्रजातियों में मालाबार ग्रे हॉर्नबिल, मालाबार पैराकीट, मालाबार बैंडेड पीकॉक, मालाबार रोज़ और ट्रावणकोर बैम्बूटेल दर्ज की गईं।
      • ये निष्कर्ष क्षेत्रीय जैव विविधता के बारे में जानकारी बढ़ाते हैं। इन नए रिकॉर्ड का अर्थ मौजूदा प्रजाति-सूचियों में नई प्रविष्टियाँ जुड़ना है, न कि आवश्यक रूप से विज्ञान के लिए नई प्रजातियों की खोज होना।

जैव विविधता संरक्षण के लिए महत्त्व:

      • पश्चिमी घाट की जैव विविधता: पश्चिमी घाट वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट है, जहाँ प्रजातियों की समृद्ध विविधता और स्थानिक प्रजातियों की अधिकता पाई जाती है।
      • पारिस्थितिकी तंत्र का स्वास्थ्य: तितलियाँ परागण में योगदान देती हैं, जबकि ड्रैगनफ्लाई और डैम्सलफ्लाई कीटों की आबादी को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। ये मीठे पानी के आवासों की स्थिति के संकेतक भी हो सकते हैं।
      • वैज्ञानिक अनुसंधान: सत्यापित प्रजाति-सूचियाँ उनके वितरण के स्वरूप को समझने में मदद करती हैं और संरक्षण की आवश्यकता वाले आवासों की पहचान करने में सहायक होती हैं।
      • साक्ष्य-आधारित प्रबंधन: विश्वसनीय जैव विविधता संबंधी आँकड़े आवासों के पुनर्स्थापन, संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन और वन्यजीवों की दीर्घकालिक निगरानी में सहायता करते हैं।

चुनौतियाँ:

आवासों का विखंडन, जलवायु परिवर्तन, मानव-वन्यजीव संघर्ष, आधारभूत आँकड़ों की कमी और दुर्लभ प्रजातियों की पहचान शामिल हैं। एक ही मौसम में किए गए सर्वेक्षणों में प्रवासी या मौसमी प्रजातियाँ भी छूट सकती हैं।

कानूनी और संवैधानिक ढाँचा:

      • अनुच्छेद 48A: राज्य को पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करने तथा वनों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा करने का निर्देश देता है।
      • अनुच्छेद 51A(g): नागरिकों के लिए प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना तथा जीवित प्राणियों के प्रति करुणा रखना एक मौलिक कर्तव्य निर्धारित करता है।
      • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: यह वन्यजीव संरक्षण, शिकार पर प्रतिबंध और संरक्षित क्षेत्रों के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है। इसके 2022 के संशोधन ने आक्रामक विदेशी प्रजातियों और अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव व्यापार से संबंधित प्रावधानों को मजबूत किया।
      • जैव विविधता अधिनियम, 2002: यह जैव विविधता संरक्षण, सतत उपयोग और लाभों के न्यायसंगत बँटवारे को बढ़ावा देता है। इसके 2023 के संशोधन ने नियामक ढाँचे को अद्यतन किया।
      • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986: यह केंद्र सरकार को पर्यावरण की गुणवत्ता की रक्षा और उसमें सुधार करने के लिए व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है।

निष्कर्ष:

वन्यजीवों के 36 अतिरिक्त रिकॉर्ड दर्ज होना केरल के वन क्षेत्रों के पारिस्थितिक महत्त्व को उजागर करता है। नियमित, वैज्ञानिक रूप से सत्यापित और अलग-अलग मौसमों में किए जाने वाले जैव विविधता सर्वेक्षण संरक्षण रणनीतियों को मजबूत कर सकते हैं तथा पश्चिमी घाट की दीर्घकालिक सुरक्षा में योगदान दे सकते हैं।

 

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