चर्चा में क्यों?
हाल ही में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में आदिवासी ग्रामीणों, विशेष रूप से महिलाओं ने केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना (KBLP) के विरोध को तेज कर दिया है। प्रदर्शनकारी इस परियोजना और इससे जुड़ी सिंचाई योजनाओं से प्रभावित परिवारों के लिए बेहतर पुनर्वास और अधिक मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना (KBLP) के बारे में:
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- केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना भारत की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (NPP) के अंतर्गत नदियों को जोड़ने वाली पहली परियोजना है। इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 दिसंबर 2024 को किया था।
- इस परियोजना का उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी से अतिरिक्त जल को बेतवा नदी में पहुंचाना है। दोनों नदियां यमुना नदी की सहायक नदियां हैं। इस परियोजना का लक्ष्य सूखा प्रभावित बुंदेलखंड क्षेत्र (मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश) में जल संकट को कम करना है।
- केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना भारत की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (NPP) के अंतर्गत नदियों को जोड़ने वाली पहली परियोजना है। इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 दिसंबर 2024 को किया था।
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परियोजना के प्रमुख घटक:
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- चरण-I:
- दौधन बांध का निर्माण।
- 221 किलोमीटर लंबी लिंक नहर का निर्माण।
- जल विद्युत गृहों और सुरंग का निर्माण।
- दौधन बांध का निर्माण।
- चरण-II:
- लोअर ओर्र बांध का विकास।
- बीना कॉम्प्लेक्स का निर्माण।
- कोठा बैराज का निर्माण।
- लोअर ओर्र बांध का विकास।
- चरण-I:
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अपेक्षित लाभ:
इस परियोजना से महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है:
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- सिंचाई सुविधा: लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई के लिए जल उपलब्ध होगा।
- पेयजल आपूर्ति: लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।
- विद्युत उत्पादन: 103 मेगावाट जल विद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होगा।
- क्षेत्रीय विकास: बुंदेलखंड में बेहतर कृषि उत्पादकता, सूखे का कम जोखिम और बेहतर जल सुरक्षा।
- सिंचाई सुविधा: लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई के लिए जल उपलब्ध होगा।
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विरोध के कारण:
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि:
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- कई प्रभावित परिवारों को पुनर्वास योजनाओं में शामिल नहीं किया गया है।
- भूमि और आजीविका के नुकसान की तुलना में मुआवजा पर्याप्त नहीं है।
- जंगलों और नदियों पर निर्भर आदिवासी समुदायों को विस्थापन और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़ेगा।
- वे भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता के अधिकार अधिनियम, 2013 के सही क्रियान्वयन की मांग कर रहे हैं।
- कई प्रभावित परिवारों को पुनर्वास योजनाओं में शामिल नहीं किया गया है।
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प्रमुख मांगें:
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- पुनर्वास मुआवजे को ₹12.5 लाख से बढ़ाकर ₹25 लाख किया जाए।
- सभी प्रभावित परिवारों को पुनर्वास पैकेज में शामिल किया जाए।
- मझगांव और रुनझ सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा दिया जाए।
- भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए।
- पुनर्वास मुआवजे को ₹12.5 लाख से बढ़ाकर ₹25 लाख किया जाए।
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पर्यावरणीय चिंताएं:
इस परियोजना की पर्यावरणविदों द्वारा आलोचना की गई है क्योंकि दौधन बांध के निर्माण से पन्ना टाइगर रिजर्व का लगभग 6,000 हेक्टेयर क्षेत्र जलमग्न हो जाएगा। इससे बाघों के महत्वपूर्ण आवास और जैव विविधता पर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
मुख्य चिंताएं:
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- वन क्षेत्रों का नुकसान।
- वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास का विभाजन।
- नदी पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव।
- बाघ, घड़ियाल, गिद्ध और स्थानीय मछली प्रजातियों पर खतरा।
- जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में तथाकथित "अतिरिक्त जल" के स्थानांतरण की दीर्घकालिक स्थिरता पर सवाल।
- वन क्षेत्रों का नुकसान।
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आगे की राह:
इस परियोजना की सफलता विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने पर निर्भर करती है। इसके लिए उचित पुनर्वास, पर्याप्त मुआवजा, आदिवासी एवं वन अधिकारों की सुरक्षा तथा मजबूत पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना आवश्यक है। साथ ही, ग्राम सभाओं और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से परियोजना का प्रभावी और न्यायपूर्ण क्रियान्वयन किया जाना चाहिए।

