संदर्भ:
हाल ही में, कर्नाटक ने पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों के प्रस्तावित कार्यान्वयन को लेकर चिंता व्यक्त की है। राज्य का तर्क है कि प्रस्तावित पारिस्थितिक प्रतिबंध कई जिलों में किसानों और स्थानीय निवासियों की आजीविका को प्रभावित कर सकते हैं।
पृष्ठभूमि:
-
-
- माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाले पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) की सिफारिशों की समीक्षा करने के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय कार्य समूह (HLWG) का गठन किया गया था।
- पश्चिमी घाट गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु राज्यों में फैले हुए हैं। इन्हें एक प्रमुख जैव-विविधता हॉटस्पॉट के रूप में मान्यता प्राप्त है तथा यह कई महत्वपूर्ण नदियों का प्रमुख जल-स्रोत क्षेत्र भी है।
- माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाले पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) की सिफारिशों की समीक्षा करने के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय कार्य समूह (HLWG) का गठन किया गया था।
-
प्रमुख सिफारिशें:
-
-
- 37% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करना: कस्तूरीरंगन समिति ने पश्चिमी घाट के लगभग 37% क्षेत्रफल, यानी करीब 60,000 वर्ग किमी, को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Sensitive Area–ESA) घोषित करने की सिफारिश की।
- प्राकृतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य: समिति ने इस क्षेत्र को दो भागों में विभाजित किया:
- प्राकृतिक परिदृश्य (Natural Landscape): इसमें वन और उच्च पारिस्थितिक महत्त्व वाले क्षेत्र शामिल हैं, जहां अधिक मजबूत संरक्षण की आवश्यकता है।
- सांस्कृतिक परिदृश्य (Cultural Landscape): इसमें बस्तियां, कृषि क्षेत्र और बागान शामिल हैं, जहां स्थानीय लोगों की आजीविका से जुड़े पहलुओं को महत्त्व दिया गया है।
- प्राकृतिक परिदृश्य (Natural Landscape): इसमें वन और उच्च पारिस्थितिक महत्त्व वाले क्षेत्र शामिल हैं, जहां अधिक मजबूत संरक्षण की आवश्यकता है।
- गतिविधियों का विनियमन: रिपोर्ट में ऐसी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव किया गया, जिनका पर्यावरण पर अधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जैसे:
- खनन और उत्खनन
- रेत खनन
- अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योग
- नई ताप विद्युत परियोजनाएं
- कुछ विकास गतिविधियों, जिनमें जलविद्युत परियोजनाएं भी शामिल हैं, को पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और पर्यावरणीय आकलन के अधीन रखने का प्रस्ताव किया गया।
- खनन और उत्खनन
- 37% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करना: कस्तूरीरंगन समिति ने पश्चिमी घाट के लगभग 37% क्षेत्रफल, यानी करीब 60,000 वर्ग किमी, को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Sensitive Area–ESA) घोषित करने की सिफारिश की।
-
कर्नाटक इसका विरोध क्यों कर रहा है?
राज्य सरकार और स्थानीय समुदायों के कुछ वर्गों ने निम्नलिखित चिंताएं व्यक्त की हैं:
-
-
- प्रस्तावित ESA सीमाओं के अंतर्गत कृषि और बागान भूमि के शामिल होने की संभावना।
- आर्थिक गतिविधियों पर संभावित प्रतिबंध।
- किसानों और स्थानीय लोगों की आजीविका पर प्रभाव।
- उपग्रह आधारित मानचित्रण और सीमा निर्धारण की सटीकता पर सवाल।
- भविष्य में भूमि उपयोग को लेकर स्थानीय निवासियों में भय और अनिश्चितता।
- इसी कारण राज्य सरकार ने प्रस्तावित सीमाओं पर अधिक व्यापक परामर्श और पुनर्विचार की मांग की है।
- प्रस्तावित ESA सीमाओं के अंतर्गत कृषि और बागान भूमि के शामिल होने की संभावना।
-
गाडगिल बनाम कस्तूरीरंगन:
|
पहलू |
गाडगिल समिति |
कस्तूरीरंगन समिति |
|
दृष्टिकोण |
व्यापक पारिस्थितिक संरक्षण |
लक्षित संरक्षण |
|
ESA का कवरेज |
लगभग 64% |
लगभग 37% |
|
पद्धति |
पारिस्थितिक आकलन |
भू-स्थानिक (Geospatial) + पारिस्थितिक आकलन |
|
मानव बस्तियां |
अधिक व्यापक नियामक कवरेज |
सांस्कृतिक परिदृश्य का अधिक स्पष्ट विभेदीकरण |
|
मुख्य फोकस |
संरक्षण-केंद्रित |
संरक्षण और विकास के बीच संतुलन |
महत्व:
यह विवाद पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती को उजागर करता है। पश्चिमी घाट जैव-विविधता, जल सुरक्षा, जलवायु विनियमन और विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करते हैं। वहीं, स्थानीय समुदाय कृषि, बागान और अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए इन क्षेत्रों पर निर्भर हैं।
निष्कर्ष:
पश्चिमी घाट को मजबूत पारिस्थितिक संरक्षण की आवश्यकता है, लेकिन संरक्षण संबंधी उपायों में स्थानीय समुदायों की वास्तविक आजीविका संबंधी चिंताओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उद्देश्य “सतत विकास के साथ संरक्षण” (Conservation with Sustainable Development) होना चाहिए, न कि पर्यावरण और विकास को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखना।

