संदर्भ:
हाल ही में कर्नाटक ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष संकेत दिया है कि वह मौजूदा कावेरी जल-बंटवारे की व्यवस्था की समीक्षा की मांग कर सकता है। राज्य ने “असमान आवंटन” और बदली हुई जलवैज्ञानिक परिस्थितियों का हवाला दिया है। राज्य ने रिबस सिक स्टैंटिबस (rebus sic stantibus) के सिद्धांत का उल्लेख किया, जो मूलभूत परिस्थितियों में परिवर्तन होने पर किसी समझौते या व्यवस्था पर पुनर्विचार की अनुमति देता है।
कावेरी विवाद की पृष्ठभूमि:
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- कावेरी नदी कर्नाटक से निकलती है और समुद्र में मिलने से पहले तमिलनाडु से होकर बहती है। इसके जल का बंटवारा कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच होता है।
- कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण ने वर्ष 2007 में अपना अंतिम निर्णय दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 में आवंटन में संशोधन किया।
- 50% निर्भरता के आधार पर कावेरी बेसिन में कुल वार्षिक जल उपलब्धता 740 TMC फीट आंकी गई थी। इसका आवंटन इस प्रकार था:
- तमिलनाडु: 404.25 TMC फीट
- कर्नाटक: 284.75 TMC फीट
- केरल: 30 TMC फीट
- पुडुचेरी: 7 TMC फीट
- पर्यावरणीय प्रवाह: 10 TMC फीट
- समुद्र में अनिवार्य रूप से बह जाने वाला जल: 4 TMC फीट
- तमिलनाडु: 404.25 TMC फीट
- कावेरी नदी कर्नाटक से निकलती है और समुद्र में मिलने से पहले तमिलनाडु से होकर बहती है। इसके जल का बंटवारा कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच होता है।
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रिबस सिक स्टैंटिबस क्या है?
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- रिबस सिक स्टैंटिबस अंतरराष्ट्रीय कानून का एक सिद्धांत है, जिसका अर्थ है “परिस्थितियाँ जैसी हैं”।
- यह सिद्धांत बताता है कि यदि मूलभूत और अप्रत्याशित परिस्थितियों में ऐसा परिवर्तन हो जाता है, जिससे मूल व्यवस्था का आधार महत्वपूर्ण रूप से बदल जाता है, तो किसी समझौते या व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
- कर्नाटक ने तर्क दिया है कि वर्षा के बदलते पैटर्न, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय क्षरण और बढ़ते जल संकट ने कावेरी बेसिन की जलवैज्ञानिक वास्तविकताओं को बदल दिया है।
- रिबस सिक स्टैंटिबस अंतरराष्ट्रीय कानून का एक सिद्धांत है, जिसका अर्थ है “परिस्थितियाँ जैसी हैं”।
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कर्नाटक के प्रमुख तर्क:
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- कर्नाटक ने सूखे के वर्षों के दौरान मौजूदा आनुपातिक संकट-साझाकरण व्यवस्था की पर्याप्तता पर सवाल उठाया है। राज्य का तर्क है कि जल की कमी को किस प्रकार साझा किया जाए, इसे निर्धारित करने के लिए पर्याप्त रूप से वैज्ञानिक सूत्र मौजूद नहीं है।
- इसने बेसिन में वर्षा के अलग-अलग पैटर्न को भी रेखांकित किया है। दक्षिण-पश्चिम मानसून कर्नाटक के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि तमिलनाडु को उत्तर-पूर्वी मानसून से महत्वपूर्ण लाभ मिलता है।
- कर्नाटक का तर्क है कि संकट के वर्षों में पहले पीने के पानी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, इसके बाद सूखा-प्रवण क्षेत्रों की सिंचाई आवश्यकताओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
- कर्नाटक ने सूखे के वर्षों के दौरान मौजूदा आनुपातिक संकट-साझाकरण व्यवस्था की पर्याप्तता पर सवाल उठाया है। राज्य का तर्क है कि जल की कमी को किस प्रकार साझा किया जाए, इसे निर्धारित करने के लिए पर्याप्त रूप से वैज्ञानिक सूत्र मौजूद नहीं है।
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सिंधु जल संधि से संबंध:
कर्नाटक द्वारा 1960 की सिंधु जल संधि (IWT) का उल्लेख इस मुद्दे को व्यापक आयाम देता है। राज्य ने उल्लेख किया कि केंद्र सरकार ने भी बदली हुई परिस्थितियों का हवाला देते हुए IWT में बदलाव की मांग की है। हालांकि, दोनों मामले कानूनी रूप से अलग हैं: IWT भारत और पाकिस्तान के बीच एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जबकि कावेरी मामला भारत के भीतर राज्यों के बीच जल विवाद है।
संवैधानिक ढाँचा:
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- अंतर-राज्यीय नदी विवाद मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 द्वारा नियंत्रित होते हैं।
- कावेरी विवाद संवैधानिक संघवाद, स्थापित कानूनी आवंटन और बदलती पर्यावरणीय वास्तविकताओं के बीच संतुलन बनाने की जटिलताओं को दर्शाता है।
- अंतर-राज्यीय नदी विवाद मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 द्वारा नियंत्रित होते हैं।
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चुनौतियाँ:
आवंटन को दोबारा खोलने के प्रयास का तमिलनाडु और अन्य हितधारकों द्वारा विरोध किया जा सकता है। इसके लिए यह स्थापित करने हेतु मजबूत वैज्ञानिक प्रमाणों की भी आवश्यकता होगी कि मौजूदा जलवैज्ञानिक परिस्थितियों में मूलभूत परिवर्तन हुआ है।
आगे की राह:
भारत को वैज्ञानिक आँकड़ों पर आधारित अनुकूलनशील नदी-बेसिन प्रबंधन की आवश्यकता है, जिसमें आवंटन की समय-समय पर समीक्षा, कुशल सिंचाई, जल संरक्षण, जलवायु मॉडलिंग और बेसिन के राज्यों के बीच बेहतर समन्वय शामिल हो।
निष्कर्ष:
कावेरी मुद्दा कानूनी निश्चितता और बदलती पारिस्थितिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। एक टिकाऊ समाधान के लिए सहकारी संघवाद, वैज्ञानिक संकट-साझाकरण तंत्र और नदी के जल की उपलब्धता का समय-समय पर आकलन आवश्यक है, न कि केवल कठोर ऐतिहासिक आवंटन पर निर्भर रहना।

