चर्चा में क्यों ?
हाल ही में, 24 अगस्त 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान की जोजरी नदी के किनारे उसके तट से 100 मीटर के दायरे में निर्माण एवं विकास गतिविधियों पर अंतरिम रोक लगा दी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश जोजरी नदी तंत्र में प्रदूषण और पारिस्थितिक क्षरण से संबंधित स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले में दिया।
यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी, जब तक नदी की उच्च बाढ़ रेखा (High Flood Line-HFL) तथा आवश्यक पारिस्थितिक बफर जोन का वैज्ञानिक निर्धारण और सीमांकन नहीं हो जाता। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को होगी।
जोजरी नदी का पारिस्थितिक महत्व:
जोजरी नदी, लूणी नदी तंत्र से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण मौसमी नदी है। पश्चिमी राजस्थान के शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र में मौसमी नदियाँ स्थानीय जल-निकासी, भूजल पुनर्भरण, कृषि तथा पारिस्थितिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
शुष्क क्षेत्रों में नदियों का महत्व केवल उनके स्थायी जल प्रवाह से निर्धारित नहीं होता। वर्षा के दौरान इनका प्रवाह स्थानीय जल संचयन, आर्द्रभूमि निर्माण, मिट्टी में नमी तथा भूजल पुनर्भरण को प्रभावित करता है। इसलिए ऐसी नदी प्रणालियों का क्षरण दीर्घकाल में क्षेत्र की जल-सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
जोजरी नदी में प्रदूषण की समस्या:
जोजरी नदी का संकट मुख्यतः औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू सीवेज और अनुपयुक्त अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ा है। विशेष रूप से औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला अपशिष्ट जल यदि पर्याप्त उपचार के बिना नदी तंत्र में पहुँचता है, तो जल की गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित होती है।
राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की विभिन्न रिपोर्टों में जोजरी नदी क्षेत्र में जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD), रासायनिक ऑक्सीजन मांग (COD), निलंबित ठोस पदार्थ तथा अन्य प्रदूषकों से संबंधित चिंताओं को दर्ज किया गया है। कुछ क्षेत्रों में प्रदूषित जल के कृषि में उपयोग से मृदा की गुणवत्ता, फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
उच्च बाढ़ रेखा (HFL) का महत्व:
उच्च बाढ़ रेखा (High Flood Line-HFL) उस सीमा को दर्शाती है, जहाँ तक किसी नदी का जल बाढ़ की स्थिति में फैल सकता है। HFL का वैज्ञानिक निर्धारण नदी के बाढ़-मैदान की पहचान और भूमि-उपयोग नियमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
शहरीकरण तथा औद्योगिक विस्तार के कारण जब बाढ़-मैदानों में निर्माण होता है, तो नदी की जल-वहन क्षमता प्रभावित होती है और बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए HFL आधारित योजना आपदा जोखिम न्यूनीकरण और नदी संरक्षण दोनों के लिए आवश्यक है।
भारत में नदी संरक्षण की व्यापक चुनौतियाँ:
जोजरी नदी का मामला भारत की नदी प्रणालियों के सामने मौजूद कई संरचनात्मक चुनौतियों को उजागर करता है-
नदी तटों पर अतिक्रमण: अनियोजित शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार से प्राकृतिक फ्लडप्लेन प्रभावित होते हैं।
अपर्याप्त अपशिष्ट प्रबंधन: अनुपचारित या अपर्याप्त रूप से उपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट नदी जल की गुणवत्ता को खराब करते हैं।
विखंडित प्रशासन: नदी संरक्षण से जुड़े विभिन्न विभागों और संस्थाओं के बीच समन्वय की कमी से प्रयास प्रभावी नहीं हो पाते।
वैज्ञानिक सीमांकन का अभाव: कई नदी तंत्रों में HFL, बाढ़ क्षेत्र और पारिस्थितिक बफर जोन का पर्याप्त वैज्ञानिक निर्धारण नहीं हुआ है।
कैचमेंट आधारित योजना की कमी: नदी को केवल शहर या जिला सीमा के भीतर देखने के बजाय पूरे कैचमेंट–नदी–फ्लडप्लेन तंत्र के रूप में प्रबंधित करने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष:
जोजरी नदी पर सर्वोच्च न्यायालय का अंतरिम आदेश भारत में नदी संरक्षण और बाढ़-मैदान प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह स्पष्ट करता है कि विकास की प्रक्रिया में नदियों के प्राकृतिक प्रवाह, पारिस्थितिक सीमाओं और बाढ़-मैदानों की अनदेखी दीर्घकाल में जल-सुरक्षा तथा आजीविका के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।
इसलिए जोजरी नदी का संरक्षण केवल एक न्यायिक आदेश के अनुपालन तक सीमित न रहकर वैज्ञानिक नदी-प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण, जल के पुन: उपयोग, फ्लडप्लेन संरक्षण और जनभागीदारी पर आधारित दीर्घकालिक मॉडल का रूप लेना चाहिए। यही दृष्टिकोण भारत की अन्य प्रदूषित एवं संकटग्रस्त नदी प्रणालियों के पुनर्जीवन के लिए भी उपयोगी हो सकता है।
