संदर्भ:
हाल ही में, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने स्पष्ट किया कि भारत के अंतरिक्ष सुधारों का उद्देश्य निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाकर अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार करना है, जबकि इसरो को उन्नत अनुसंधान, रणनीतिक मिशनों और अग्रणी प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति देना है।
भारत का नया अंतरिक्ष-क्षेत्र मॉडल:
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- अंतरिक्ष-क्षेत्र में सुधार 2020 में शुरू हुए और इन्हें भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 के माध्यम से संस्थागत रूप दिया गया। यह ढाँचा विभिन्न हितधारकों के बीच जिम्मेदारियों को विभाजित करने का प्रयास करता है:
- ISRO: उन्नत R&D, अंतरिक्ष विज्ञान, अन्वेषण और रणनीतिक मिशन।
- IN-SPACe: गैर-सरकारी अंतरिक्ष गतिविधियों का प्राधिकरण, विनियमन और प्रोत्साहन।
- NSIL: परिपक्व इसरो प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण और उद्योग-नेतृत्व वाला उपयोग।
- निजी क्षेत्र: विनिर्माण, प्रक्षेपण, उपग्रह, अनुप्रयोग और वाणिज्यिक सेवाएँ।
- ISRO: उन्नत R&D, अंतरिक्ष विज्ञान, अन्वेषण और रणनीतिक मिशन।
- इस प्रकार, परिपक्व और बड़े पैमाने पर उपयोग की जा सकने वाली प्रौद्योगिकियाँ तेजी से उद्योग को हस्तांतरित हो सकती हैं, जिससे इसरो के वैज्ञानिक मानव संसाधन को अगली पीढ़ी की क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति मिलेगी।
- अंतरिक्ष-क्षेत्र में सुधार 2020 में शुरू हुए और इन्हें भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 के माध्यम से संस्थागत रूप दिया गया। यह ढाँचा विभिन्न हितधारकों के बीच जिम्मेदारियों को विभाजित करने का प्रयास करता है:
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ISRO बनाम निजी क्षेत्र
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पहलू |
ISRO |
निजी क्षेत्र |
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प्राथमिक भूमिका |
अग्रणी R&D और राष्ट्रीय मिशन |
व्यावसायीकरण और विस्तार |
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फोकस |
उन्नत और रणनीतिक प्रौद्योगिकियाँ |
परिपक्व और बाजार-उन्मुख प्रौद्योगिकियाँ |
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गतिविधियाँ |
मानव अंतरिक्ष उड़ान, गहरे अंतरिक्ष मिशन, अगली पीढ़ी की प्रणालियाँ |
विनिर्माण, उपग्रह, प्रक्षेपण और सेवाएँ |
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ताकत |
वैज्ञानिक और रणनीतिक विशेषज्ञता |
निवेश, नवाचार और उत्पादन का पैमाना |
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उद्देश्य |
राष्ट्रीय तकनीकी लक्ष्य |
वाणिज्यिक और वैश्विक बाजार का विकास |
भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र का विकास:
भारत के सुधारों के परिणामस्वरूप निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र का तेजी से विस्तार हुआ है। सामग्री में उद्धृत प्रभाव आकलन के अनुसार, भारत में अब 400 से अधिक सक्रिय अंतरिक्ष स्टार्टअप हैं, जबकि संचयी निजी निवेश 600 मिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है। निजी कंपनियों ने प्रक्षेपण और कक्षीय क्षमताओं का भी प्रदर्शन किया है तथा अनेक उपग्रहों और पेलोड को अंतरिक्ष में स्थापित किया है।
निजी क्षेत्रों के लिए सरकारी पहल:
प्रमुख उपायों में शामिल हैं:
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- अंतरिक्ष स्टार्टअप के लिए ₹1,000 करोड़ का वेंचर कैपिटल फंड।
- स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण के लिए ₹500 करोड़ का टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड।
- अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए उदारीकृत FDI नीति।
- इसरो की सुविधाओं और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तक पहुँच।
- कक्षा में प्रौद्योगिकी के सत्यापन के लिए POEM प्लेटफॉर्म।
- तकनीकी और कौशल-विकास सहायता।
- अंतरिक्ष-विनिर्माण क्लस्टरों को बढ़ावा।
- पृथ्वी-अवलोकन PPP पहल।
- अंतरिक्ष स्टार्टअप के लिए ₹1,000 करोड़ का वेंचर कैपिटल फंड।
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महत्व:
अधिक निजी भागीदारी से पूंजी, नवाचार, विनिर्माण क्षमता और वाणिज्यिक दक्षता आ सकती है, जबकि इसरो के वैज्ञानिक मानव संसाधन को उन्नत अनुसंधान के लिए मुक्त किया जा सकता है। इससे वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने और घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है।
इसरो के बारे में:
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- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई थी, जिसने भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (INCOSPAR) का स्थान लिया, जिसकी स्थापना 1962 में डॉ. विक्रम साराभाई के नेतृत्व में की गई थी।
- इसका प्राथमिक उद्देश्य अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का विकास करना और इसे विभिन्न राष्ट्रीय आवश्यकताओं के लिए लागू करना है। इसमें संचार, प्रसारण, मौसम विज्ञान, रिमोट सेंसिंग, नेविगेशन, आपदा प्रबंधन और संसाधन निगरानी शामिल हैं। इसरो उपग्रह विकास, प्रक्षेपण-वाहन विकास, अंतरिक्ष विज्ञान और अन्वेषण का कार्य भी करता है।
- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई थी, जिसने भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (INCOSPAR) का स्थान लिया, जिसकी स्थापना 1962 में डॉ. विक्रम साराभाई के नेतृत्व में की गई थी।
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निष्कर्ष:
भारत के अंतरिक्ष सुधारों को इसरो के निजीकरण की अपेक्षा व्यावसायीकरण और पारिस्थितिकी तंत्र के विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए। इसका उद्देश्य एक सहयोगात्मक मॉडल बनाना है, जिसमें इसरो अग्रणी विज्ञान और रणनीतिक मिशनों का नेतृत्व करे, जबकि निजी उद्योग बड़े पैमाने पर उत्पादन, नवाचार और वाणिज्यिक क्षमता प्रदान करे।

