संदर्भ:
21 अगस्त 2026 को भारतीय नौसेना ने कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL), कोच्चि द्वारा निर्मित तीसरा एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) ‘मंगरोल’ प्राप्त किया। इसके नौसेना में शामिल होने से उथले और तटीय जलक्षेत्रों में पानी के नीचे मौजूद खतरों का पता लगाने और उनका मुकाबला करने की भारत की क्षमता मजबूत हुई है।
ASW-SWC क्या है?
एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट एक विशेष प्रकार का नौसैनिक पोत है, जिसे तटीय और उथले जलक्षेत्रों में पनडुब्बियों का पता लगाने, उनका पीछा करने और उन पर कार्रवाई करने के लिए डिजाइन किया गया है। इन छोटे आकार के युद्धपोतों को अक्सर “पॉकेट वॉरशिप” कहा जाता है। ये ऐसे क्षेत्रों में विशेष रूप से उपयोगी होते हैं, जहाँ उथले समुद्री क्षेत्र और जटिल जलमग्न परिस्थितियों के कारण बड़े विध्वंसक पोत (Destroyers) और फ्रिगेट्स प्रभावी रूप से काम नहीं कर पाते हैं।
मंगरोल की प्रमुख विशेषताएँ:
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- मंगरोल, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा निर्मित माहे-क्लास ASW शैलो वॉटर क्राफ्ट है, जिसमें 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है।
- इसमें वॉटरजेट प्रणोदन प्रणाली (Waterjet Propulsion) का उपयोग किया गया है, जो इसे उथले तटीय जलक्षेत्रों में बेहतर गतिशीलता प्रदान करती है। यह लगभग 25 नॉट की गति प्राप्त कर सकता है और इसकी परिचालन क्षमता लगभग 1,800 समुद्री मील है।
- यह पोत आधुनिक टॉरपीडो, एंटी-सबमरीन रॉकेट, रडार और सोनार प्रणालियों से लैस है, जो पानी के भीतर निगरानी और पनडुब्बियों का पता लगाने में सहायता करती हैं।
- पनडुब्बी रोधी युद्ध के अलावा, यह कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों (Low-Intensity Maritime Operations—LIMO), माइन वारफेयर तथा तटीय सुरक्षा अभियानों में भी भूमिका निभा सकता है। इस प्रकार यह तटीय क्षेत्रों में एक बहुउद्देशीय नौसैनिक प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करता है।
- मंगरोल, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा निर्मित माहे-क्लास ASW शैलो वॉटर क्राफ्ट है, जिसमें 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है।
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ASW-SWC कार्यक्रम के बारे में:
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- भारतीय नौसेना के ASW-SWC कार्यक्रम के तहत कुल 16 पोतों के निर्माण की योजना है। इनमें से 8 पोत कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) और 8 पोत गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) द्वारा निर्मित किए जा रहे हैं।
- CSL द्वारा निर्मित पोत माहे-क्लास का हिस्सा हैं, जबकि GRSE द्वारा निर्मित पोत b के अंतर्गत आते हैं।
- इस कार्यक्रम का उद्देश्य पुराने हो चुके नौसैनिक प्लेटफॉर्मों को प्रतिस्थापित करना तथा उथले जलक्षेत्रों में भारतीय नौसेना की विशेष युद्धक क्षमताओं को मजबूत करना है।
- भारतीय नौसेना के ASW-SWC कार्यक्रम के तहत कुल 16 पोतों के निर्माण की योजना है। इनमें से 8 पोत कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) और 8 पोत गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) द्वारा निर्मित किए जा रहे हैं।
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रणनीतिक महत्त्व:
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- समुद्री सुरक्षा को मजबूती: भारत की लंबी तटरेखा और बढ़ते समुद्री हितों को देखते हुए ASW-SWC महत्वपूर्ण हैं। ये पोत भारतीय तटरेखा, नौसैनिक अड्डों और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के निकट सक्रिय पनडुब्बियों की निगरानी और उनसे निपटने के लिए समर्पित क्षमता प्रदान करते हैं।
- आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा: 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री के साथ निर्मित मंगरोल भारतीय शिपयार्डों और घरेलू रक्षा उद्योग की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है। यह रक्षा उत्पादन में अधिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के सरकार के लक्ष्य को समर्थन देता है।
- तटीय युद्ध क्षमता में वृद्धि: वॉटरजेट प्रणोदन प्रणाली इन पोतों को बेहतर गतिशीलता प्रदान करती है और उन्हें उथले तटीय क्षेत्रों में संचालन के लिए उपयुक्त बनाती है। इनका बहुउद्देशीय डिजाइन इन्हें माइन वारफेयर और कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों में भी उपयोगी बनाता है।
- समुद्री सुरक्षा को मजबूती: भारत की लंबी तटरेखा और बढ़ते समुद्री हितों को देखते हुए ASW-SWC महत्वपूर्ण हैं। ये पोत भारतीय तटरेखा, नौसैनिक अड्डों और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के निकट सक्रिय पनडुब्बियों की निगरानी और उनसे निपटने के लिए समर्पित क्षमता प्रदान करते हैं।
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नामकरण का महत्त्व:
मंगरोल का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित तटीय शहर और छोटे बंदरगाह मंगरोल के नाम पर रखा गया है। यह नाम भारतीय नौसेना के पूर्व आईएनएस मंगरोल की विरासत को भी आगे बढ़ाता है। आईएनएस मंगरोल एक भारतीय नौसेना का माइनस्वीपर पोत था, जिसने वर्ष 2004 तक सेवा दी।
निष्कर्ष:
मंगरोल का भारतीय नौसेना को सौंपा जाना भारत के नौसैनिक आधुनिकीकरण और स्वदेशी रक्षा उत्पादन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उथले जलक्षेत्रों में पनडुब्बी रोधी क्षमताओं को मजबूत करने के साथ-साथ विदेशी प्लेटफॉर्मों पर निर्भरता कम करने की दिशा में ASW-SWC कार्यक्रम महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह कार्यक्रम भारत को अधिक आत्मनिर्भर, तकनीकी रूप से सक्षम और सुरक्षित समुद्री शक्ति के रूप में विकसित करने में सहायक होगा।
