संदर्भ:
हाल ही में दिल्ली में इन्फ्लुएंजा ए (एच1एन1) के मामलों में तेज़ वृद्धि देखी गई है। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के आँकड़ों के अनुसार, 12 अगस्त तक 1,449 मामले सामने आए, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 229 मामले दर्ज किए गए थे।
इन्फ्लुएंजा एच1एन1 क्या है?
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- इन्फ्लुएंजा विषाणु ऑर्थोमाइक्सोविरिडी कुल से संबंधित होते हैं। एच1एन1, इन्फ्लुएंजा ए का एक उपप्रकार है। इसका नाम इसकी सतह पर पाए जाने वाले दो प्रोटीनों, हीमैग्लूटिनिन (एच) और न्यूरामिनिडेज़ (एन) के आधार पर रखा गया है। एच1एन1 में इन प्रोटीनों के एच1 और एन1 उपप्रकार पाए जाते हैं। ये प्रोटीन विषाणु को मेज़बान कोशिकाओं में प्रवेश करने तथा शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ परस्पर क्रिया करने में सहायता करते हैं।
- “स्वाइन फ्लू” शब्द इसलिए प्रचलित हुआ क्योंकि 2009 की महामारी के लिए उत्तरदायी विषाणु में मनुष्यों, सूअरों और पक्षियों से संबंधित इन्फ्लुएंजा विषाणुओं से प्राप्त आनुवंशिक सामग्री मौजूद थी।
- इन्फ्लुएंजा विषाणु ऑर्थोमाइक्सोविरिडी कुल से संबंधित होते हैं। एच1एन1, इन्फ्लुएंजा ए का एक उपप्रकार है। इसका नाम इसकी सतह पर पाए जाने वाले दो प्रोटीनों, हीमैग्लूटिनिन (एच) और न्यूरामिनिडेज़ (एन) के आधार पर रखा गया है। एच1एन1 में इन प्रोटीनों के एच1 और एन1 उपप्रकार पाए जाते हैं। ये प्रोटीन विषाणु को मेज़बान कोशिकाओं में प्रवेश करने तथा शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ परस्पर क्रिया करने में सहायता करते हैं।
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2009 की एच1एन1 महामारी:
भारत में एच1एन1 का पहला मामला मई 2009 में हैदराबाद में सामने आया। जून 2009 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एच1एन1 को वैश्विक महामारी घोषित किया। इसके बाद यह विषाणु मनुष्यों में फैलने वाले मौसमी इन्फ्लुएंजा विषाणुओं में से एक के रूप में स्थापित हो गया।
एच1एन1 क्यों फैल रहा है?
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- इन्फ्लुएंजा एक मौसमी बीमारी है। भारत में इसके प्रकोप पर मौसम की परिस्थितियों, विशेषकर मानसून के समय, का प्रभाव पड़ता है। लोगों के बीच बढ़ता संपर्क, अधिक जनसंख्या घनत्व और स्थानीय मौसम की परिस्थितियाँ इसके प्रसार को बढ़ावा दे सकती हैं।
- हालाँकि, मामलों में अचानक वृद्धि का वास्तविक कारण जानने के लिए आनुवंशिक और महामारी-विज्ञान संबंधी अध्ययन आवश्यक हैं। विषाणु में होने वाले परिवर्तन भी उसके प्रसार तथा पहले से मौजूद प्रतिरक्षा से बच निकलने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
- इन्फ्लुएंजा एक मौसमी बीमारी है। भारत में इसके प्रकोप पर मौसम की परिस्थितियों, विशेषकर मानसून के समय, का प्रभाव पड़ता है। लोगों के बीच बढ़ता संपर्क, अधिक जनसंख्या घनत्व और स्थानीय मौसम की परिस्थितियाँ इसके प्रसार को बढ़ावा दे सकती हैं।
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प्रतिजनिक विचलन और प्रतिजनिक परिवर्तन:
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- प्रतिजनिक विचलन: प्रतिजनिक विचलन इन्फ्लुएंजा विषाणुओं में होने वाले छोटे और धीरे-धीरे होने वाले आनुवंशिक परिवर्तनों को कहा जाता है। इन परिवर्तनों से एचए और एनए प्रोटीनों की संरचना में बदलाव हो सकता है, जिससे पहले से मौजूद प्रतिरक्षी कम प्रभावी हो सकते हैं। प्रतिजनिक विचलन मौसमी प्रकोपों में योगदान देता है और यही एक कारण है कि इन्फ्लुएंजा के टीकों को समय-समय पर अद्यतन करना पड़ता है।
- प्रतिजनिक परिवर्तन: प्रतिजनिक परिवर्तन इन्फ्लुएंजा ए विषाणु में होने वाला अचानक और बड़ा परिवर्तन है। इससे इन्फ्लुएंजा का ऐसा नया उपप्रकार उत्पन्न हो सकता है, जिसके विरुद्ध मनुष्यों में बहुत कम या बिल्कुल भी प्रतिरक्षा न हो। ऐसे परिवर्तन इन्फ्लुएंजा महामारी का कारण बन सकते हैं, जैसा कि 2009 में हुआ था।
- प्रतिजनिक विचलन: प्रतिजनिक विचलन इन्फ्लुएंजा विषाणुओं में होने वाले छोटे और धीरे-धीरे होने वाले आनुवंशिक परिवर्तनों को कहा जाता है। इन परिवर्तनों से एचए और एनए प्रोटीनों की संरचना में बदलाव हो सकता है, जिससे पहले से मौजूद प्रतिरक्षी कम प्रभावी हो सकते हैं। प्रतिजनिक विचलन मौसमी प्रकोपों में योगदान देता है और यही एक कारण है कि इन्फ्लुएंजा के टीकों को समय-समय पर अद्यतन करना पड़ता है।
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लक्षण और अधिक जोखिम वाले समूह:
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- सामान्य लक्षणों में बुखार, खाँसी, सिरदर्द, थकान, मांसपेशियों में दर्द, ठंड लगना और पसीना आना शामिल हैं। गंभीर संक्रमण के कारण निमोनिया या श्वसन विफलता हो सकती है।
- वृद्धजन, बच्चे, गर्भवती महिलाएँ तथा मधुमेह, दमा, हृदय रोग या कमजोर प्रतिरक्षा जैसी स्थितियों वाले लोगों में गंभीर बीमारी का जोखिम अधिक होता है।
- सामान्य लक्षणों में बुखार, खाँसी, सिरदर्द, थकान, मांसपेशियों में दर्द, ठंड लगना और पसीना आना शामिल हैं। गंभीर संक्रमण के कारण निमोनिया या श्वसन विफलता हो सकती है।
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उपचार और बचाव:
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- उपचार मुख्यतः सहायक चिकित्सा पर आधारित होता है। ओसेल्टामिविर, एक विषाणुरोधी औषधि, उचित मामलों में विशेष रूप से बीमारी की शुरुआत में देने पर प्रभावी हो सकती है। प्रतिजैविक औषधियाँ विषाणुजनित इन्फ्लुएंजा का उपचार नहीं करती हैं।
- बचाव के उपायों में हर वर्ष टीकाकरण, हाथों की स्वच्छता बनाए रखना, खाँसते और छींकते समय उचित श्वसन शिष्टाचार अपनाना, पर्याप्त वायु-संचार रखना तथा लक्षण होने पर निकट संपर्क से बचना शामिल हैं।
- उपचार मुख्यतः सहायक चिकित्सा पर आधारित होता है। ओसेल्टामिविर, एक विषाणुरोधी औषधि, उचित मामलों में विशेष रूप से बीमारी की शुरुआत में देने पर प्रभावी हो सकती है। प्रतिजैविक औषधियाँ विषाणुजनित इन्फ्लुएंजा का उपचार नहीं करती हैं।
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निष्कर्ष:
एच1एन1 के दोबारा बढ़ते मामलों से आनुवंशिक निगरानी, टीकाकरण, शीघ्र निदान और ‘वन हेल्थ’ आधारित तैयारी के महत्त्व का पता चलता है। प्रतिजनिक विचलन और प्रतिजनिक परिवर्तन को समझना मौसमी प्रकोपों को रोकने तथा भविष्य में संभावित इन्फ्लुएंजा महामारियों के लिए तैयार रहने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

