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Blog / 10 Feb 2026

भारत में सर्पदंश (स्नेकबाइट) की बढ़ती समस्या

संदर्भ:

ग्लोबल स्नेक बाइट टास्कफोर्स की हालिया रिपोर्ट, भारत में सर्पदंश के मामलों के प्रभावी उपचार की क्षमता में गंभीर कमी को उजागर करती है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 99 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों को एंटीवेनम देने में व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। एंटीवेनम एक जीवनरक्षक उपचार है, जो साँप के ज़हर में मौजूद विषाक्त तत्वों को निष्क्रिय करता है।

पृष्ठभूमि:

      • विश्व में सर्पदंश से होने वाली कुल मौतों में से लगभग आधी भारत में होती हैं। प्रतिवर्ष लगभग 58,000 लोगों की मृत्यु सर्पदंश के कारण होती है। भारत एंटीवेनम का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता होने के बावजूद, समय पर इलाज तक पहुँच की कमी, कमजोर ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे के कारण प्रभावी उपचार बाधित होता है।
      • सर्पदंश एक मूक संकटके रूप में उभर रहा है, जो विशेष रूप से ग्रामीण और कृषि आधारित समुदायों को प्रभावित करता है, विशेषकर मानसून के दौरान। इसके साथ ही, तेज़ शहरीकरण और खराब कचरा प्रबंधन के कारण शहरी क्षेत्रों में भी इसका जोखिम बढ़ता जा रहा है।

India’s Snakebite Burden antivenom

वैश्विक और राष्ट्रीय परिदृश्य:

      • विश्व स्तर पर हर वर्ष लगभग 5.4 मिलियन लोगों को साँप काटते हैं, जिनमें से 1.8 से 2.7 मिलियन मामलों में ज़हर शरीर में प्रवेश करता है। प्रतिवर्ष, सर्पदंश के कारण दुनिया भर में 81,410 से 137,880 के बीच मौतें होती हैं, जबकि अनेक जीवित बचे लोगों को अंग-विच्छेदन या स्थायी विकलांगता जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसकी गंभीरता को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सर्पदंश को उच्च-प्राथमिकता वाली उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी घोषित किया है।
      • भारत में विषैले साँपों की विविधता अत्यधिक है। देश में 300 से अधिक साँप प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से 60 से अधिक विषैली हैं। बिग फोर, भारतीय कोबरा, कॉमन करैत, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर, अधिकांश सर्पदंश से होने वाली मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। 2001 से 2014 के बीच किए गए एक अध्ययन के अनुसार, इस अवधि में लगभग 12 लाख मौतें और 36 लाख स्थायी विकलांगता के मामले सामने आए। इसका तात्पर्य है कि लगभग हर 250 में से एक भारतीय को अपने जीवनकाल में सर्पदंश से मृत्यु का जोखिम है।

एंटीवेनम के बारे में:

      • साँप के ज़हर में हीमोटॉक्सिन, न्यूरोटॉक्सिन और साइटोटॉक्सिन पाए जाते हैं, जो रक्त कोशिकाओं को नष्ट कर सकते हैं, तंत्रिकाओं को पंगु बना सकते हैं और शरीर के ऊतकों को क्षति पहुँचा सकते हैं। एंटीवेनम ऐसे जीवनरक्षक औषधीय पदार्थ हैं, जो ज़हर के विषैले तत्वों से जुड़कर उन्हें निष्क्रिय कर देते हैं, जिससे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उन्हें सुरक्षित रूप से बाहर निकाल सके। भारत में उपलब्ध बहुविषी एंटीवेनम मुख्यतः बिग फोरसाँपों के ज़हर के विरुद्ध प्रभावी हैं, लेकिन किंग कोबरा या पिट वाइपर जैसी अन्य प्रजातियों के ज़हर को पूरी तरह कवर नहीं करते।
      • एंटीवेनम निर्माण की प्रक्रिया में विषैले साँपों से ज़हर निकाला जाता है, फिर जानवरों (आमतौर पर घोड़े या भेड़) को उससे प्रतिरक्षित किया जाता है और बाद में उनके शरीर से एंटीबॉडी प्राप्त की जाती हैं। तमिलनाडु की इरुला जनजाति एंटीवेनम उत्पादन में प्रयुक्त लगभग 80 प्रतिशत ज़हर की आपूर्ति करती है। यह कार्य वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत नियामक अनुमति के साथ किया जाता है।

एंटीवेनम तक पहुँच में चुनौतियाँ:

      • घरेलू स्तर पर उत्पादन होने के बावजूद, एंटीवेनम की उपलब्धता कई बाधाओं से प्रभावित है:
        • भौगोलिक: दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में नज़दीकी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव।
        • सांस्कृतिक: अंधविश्वास और पारंपरिक मान्यताओं के कारण समय पर अस्पताल न पहुँचना।
        • आर्थिक: उत्पादन की उच्च लागत के कारण दवा का महँगा होना और सीमित उपलब्धता।
        • लॉजिस्टिक: ठंडे भंडारण व्यवस्था की कमजोरी, जिससे एंटीवेनम की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
      • इन समस्याओं के कारण उपचार में देरी होती है, जटिलताएँ बढ़ती हैं और अनेक ऐसी मौतें होती हैं जिन्हें रोका जा सकता है।

आगे की राह:

सर्पदंश से होने वाली मृत्यु दर को कम करने के लिए समग्र और व्यवस्थित प्रयास आवश्यक हैं। इसके अंतर्गत प्राथमिक और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों के बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करना, उचित भंडारण और प्रभावी वितरण व्यवस्था के साथ एंटीवेनम की व्यापक उपलब्धता सुनिश्चित करना, तथा स्वास्थ्यकर्मियों को सर्पदंश प्रबंधन और एंटीवेनम के सुरक्षित उपयोग का प्रशिक्षण देना शामिल है। साथ ही, समुदाय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा देना आवश्यक है, ताकि लोग समय पर अस्पताल पहुँचें और पारंपरिक या अवैज्ञानिक उपचारों पर निर्भर रहने से होने वाली देरी को रोका जा सके।

 

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