भारत के नए श्रम संहिता और उनका कार्यान्वयन
प्रसंग:
हाल ही में, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने सभी चार श्रम संहिताओं (Labour Codes) के अंतिम नियम अधिसूचित किए हैं। इनके कार्यान्वयन के साथ भारत के श्रम नियामक ढांचे में एक बड़ा परिवर्तन (overhaul) हुआ है, जिसका उद्देश्य कानूनों को सरल बनाना, अनुपालन को बेहतर करना और श्रमिकों के संरक्षण का दायरा बढ़ाना है।
नए श्रम संहिताओं के बारे में:
भारत सरकार ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को मिलाकर चार नए श्रम संहिताएं (वेतन, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध, और व्यावसायिक सुरक्षा) अधिसूचित की हैं। इनका मुख्य उद्देश्य व्यवसायों को सुगम बनाना (Ease of Doing Business), सभी के लिए न्यूनतम वेतन, 48 घंटे का कार्य सप्ताह, और अनुबंध श्रमिकों के लिए भी बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
श्रम कानूनों का संवैधानिक आधार:
श्रम, भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची (सूची III) के अंतर्गत आता है। इसका अर्थ है कि श्रम से संबंधित विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। इसी कारण राष्ट्रीय स्तर पर एकरूप (harmonised) श्रम संहिताओं की आवश्यकता पड़ी।
चार श्रम संहिताओं की प्रमुख विशेषताएँ:
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- ये चार संहिताएँ निम्नलिखित हैं:
- वेतन संहिता (Code on Wages, 2019)
- औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code, 2020)
- सामाजिक सुरक्षा संहिता (Social Security Code, 2020)
- व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थिति संहिता (Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020)
- वेतन संहिता (Code on Wages, 2019)
- ये चार संहिताएँ निम्नलिखित हैं:
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प्रमुख प्रावधान:
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- केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन (National Floor Wage) निर्धारित किया जाएगा
- 8 घंटे का कार्यदिवस और सप्ताह में अधिकतम 48 घंटे की सीमा अनिवार्य
- सभी श्रमिकों के लिए वेतन पर्ची (wage slips) और पारदर्शी अनुपालन व्यवस्था
- गिग और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा कवरेज
- नियोक्ताओं के लिए एकल पंजीकरण (single registration) और लाइसेंस प्रणाली
- केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन (National Floor Wage) निर्धारित किया जाएगा
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प्रमुख नीतियाँ:
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- राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन (National Floor Wage) को भोजन, वस्त्र और आवास जैसी न्यूनतम जीवन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया जाएगा। यह एक आधार स्तर के रूप में कार्य करेगा, जिसके नीचे राज्य वेतन तय नहीं कर सकेंगे।
- हालाँकि, अंतिम नियमों में न्यूनतम वेतन निर्धारण के लिए एक निश्चित सूत्र (fixed formula) को हटाए जाने से चिंताएँ बढ़ी हैं।
- राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन (National Floor Wage) को भोजन, वस्त्र और आवास जैसी न्यूनतम जीवन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया जाएगा। यह एक आधार स्तर के रूप में कार्य करेगा, जिसके नीचे राज्य वेतन तय नहीं कर सकेंगे।
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श्रमिकों पर प्रभाव:
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- औपचारिक श्रमिक: बेहतर नियमन, वेतन सुरक्षा और सुरक्षा मानकों में सुधार
- असंगठित श्रमिक: सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में शामिल होने की संभावना, हालांकि इसका क्रियान्वयन महत्वपूर्ण रहेगा
- गिग श्रमिक: एक समर्पित राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड के माध्यम से प्रतिनिधित्व और कल्याण कवरेज सुनिश्चित
- महिला श्रमिक: सहमति के साथ रात्रि शिफ्ट की अनुमति, सुरक्षित परिवहन और कार्यस्थल सुरक्षा उपाय
- औपचारिक श्रमिक: बेहतर नियमन, वेतन सुरक्षा और सुरक्षा मानकों में सुधार
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व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) पर प्रभाव:
ये संहिताएँ अनुपालन को सरल बनाती हैं, जैसे:
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- बहु-राज्य ठेकेदारों के लिए एकल लाइसेंस प्रणाली
- डिजिटल पंजीकरण प्रक्रिया
- अनेक कानूनों को एकीकृत ढांचे में समाहित करना
- इससे नियामकीय बोझ कम होता है और श्रम बाजार में लचीलापन बढ़ता है।
- बहु-राज्य ठेकेदारों के लिए एकल लाइसेंस प्रणाली
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चिंताएँ और आलोचनाएँ:
मुख्य चिंताएँ इस प्रकार हैं:
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- न्यूनतम वेतन निर्धारण के लिए स्पष्ट सूत्र का अभाव
- राज्यों के बीच संभावित वेतन असमानताएँ
- संघीय समन्वय के कारण कार्यान्वयन की चुनौतियाँ
- श्रमिकों की सौदेबाजी शक्ति (bargaining power) में कमी की आशंका
- श्रमिक संघों का मानना है कि यह लचीलापन श्रमिक सुरक्षा की कीमत पर आ सकता है।
- न्यूनतम वेतन निर्धारण के लिए स्पष्ट सूत्र का अभाव
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निष्कर्ष:
चार श्रम संहिताओं का कार्यान्वयन भारत की श्रम शासन प्रणाली में एक संरचनात्मक परिवर्तन का प्रतीक है। ये औपचारिकीकरण, व्यापार सुगमता और श्रमिक सुरक्षा को बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन उनकी सफलता संतुलित कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी।

