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Blog / 13 Jan 2026

भारत के मत्स्य पालन क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि

संदर्भ:

हाल के वर्षों में भारत के मत्स्य पालन क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिला है। भारत सरकार के अनुसार, देश का कुल मछली उत्पादन वित्त वर्ष 2024–25 में बढ़कर लगभग 198 लाख टन हो गया है, जबकि वित्त वर्ष 2013–14 में यह मात्र 95 लाख टन था। इस प्रकार, पिछले एक दशक के दौरान भारत के मत्स्य उत्पादन में 106% से अधिक की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो इस क्षेत्र की तेज़ प्रगति, सुदृढ़ नीतिगत समर्थन तथा उत्पादक क्षमता में निरंतर विस्तार को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

निरंतर वृद्धि के प्रमुख कारक:

      • नीतिगत पहल और संस्थागत समर्थन: नीली क्रांति, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना जैसी परिवर्तनकारी सरकारी पहलों ने इस क्षेत्र को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 2014-15 से अब तक इन योजनाओं के तहत ₹32,700 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिससे बुनियादी ढांचे को मजबूती मिली है और तकनीक को अपनाने को बढ़ावा मिला है।
      • अंतर्देशीय मात्स्यिकी और एक्वाकल्चर पर फोकस: अंतर्देशीय मात्स्यिकी और एक्वाकल्चर पर बढ़ता हुआ फोकस इनके विकास का मुख्य चालक बनकर उभरा है। रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम, उन्नत फीडिंग तकनीक तथा वैज्ञानिक जल-संसाधन प्रबंधन जैसी आधुनिक पद्धतियों को अपनाने से मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र में उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
      • बुनियादी ढांचा विकास और बाजार एकीकरण: कोल्ड स्टोरेज, बर्फ संयंत्र तथा मछली परिवहन प्रणालियों जैसे बुनियादी ढांचे में किए गए सुधारों ने मछली पकड़ने के बाद होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया है। इसके साथ ही, नेशनल फिशरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 26 लाख से अधिक हितधारकों, जिनमें मछुआरे और उद्यमी शामिल हैं, का पंजीकरण किया गया है। इससे न केवल विभिन्न सरकारी सेवाओं तक पहुंच सरल हुई है, बल्कि वित्तीय सहायता और बाजार से जुड़ाव भी अधिक सुलभ और प्रभावी हुआ है।

वैश्विक स्थिति और आर्थिक प्रभाव:

      • वैश्विक उत्पादक: भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश बन गया है, जो कुल वैश्विक उत्पादन में लगभग 8% का योगदान देता है।
      • निर्यात: वित्त वर्ष 2024-25 में समुद्री खाद्य (seafood) का निर्यात ₹62,400 करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया।

सामाजिक-आर्थिक लाभ:

      • यह प्रोटीन युक्त भोजन तक पहुंच बढ़ाकर पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
      • यह उत्पादन से लेकर विपणन तक की पूरी श्रृंखला में रोजगार के अवसर पैदा करता है।
      • यह ग्रामीण और तटीय अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर पारंपरिक मछुआरा समुदायों को लाभ पहुँचाता है।
      • यह स्थिरता और संसाधन संरक्षण के साथ मत्स्य विकास को जोड़कर भारत के 'ब्लू इकोनॉमी' (Blue Economy) विजन का समर्थन करता है।

चुनौतियां:

      • प्रगति के बावजूद, मत्स्य पालन क्षेत्र में कुछ ऐसे आयाम हैं जिन पर निरंतर और विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है:
        • समुद्री भंडार के अत्यधिक दोहन को रोकने हेतु जिम्मेदार मछली पकड़ने की प्रथाओं को बढ़ावा देना।
        • जल की गुणवत्ता तथा पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताओं का प्रभावी समाधान।
        • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, जैसे समुद्र के बढ़ते तापमान और अम्लीकरण के कारण मत्स्यिकी उत्पादकता पर पड़ने वाले दीर्घकालिक जोखिम।

निष्कर्ष:

वित्त वर्ष 2024–25 में भारत का मछली उत्पादन लगभग 198 लाख टन तक पहुँचना देश में लागू प्रभावी नीतिगत ढांचे और तकनीकी नवाचारों की सफलता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। भविष्य में खाद्य सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक होगा कि उत्पादकता में वृद्धि और पारिस्थितिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।

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