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Blog / 18 Jul 2026

पुगा घाटी में भारत के पहले गहरे भू-तापीय कुएँ

संदर्भ:

हाल ही में, ओएनजीसी एनर्जी सेंटर द्वारा लद्दाख की पुगा घाटी में भारत के पहले और सबसे गहरे भू-तापीय कुओं का शुभारंभ किया गया। 14,000 फीट से अधिक ऊँचाई पर स्थित इन दोनों कुओं को प्रत्येक 1,000 मीटर की गहराई तक ड्रिल किया गया है। ये कुएँ भारत की पहली 1 मेगावाट (MW) पायलट भू-तापीय विद्युत परियोजना का समर्थन करेंगे। यह भारत के स्वच्छ ऊर्जा और वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

भू-तापीय ऊर्जा क्या है?

भू-तापीय ऊर्जा पृथ्वी की सतह के नीचे संग्रहीत ऊष्मा है, जो पृथ्वी के निर्माण और खनिजों के निरंतर रेडियोधर्मी क्षय से उत्पन्न होती है। इस ऊष्मा को गहरे कुओं के माध्यम से निकालकर बिजली उत्पादन, प्रत्यक्ष ताप प्रदान करने तथा भवनों के ताप एवं शीतलन के लिए भू-तापीय हीट पंप संचालित करने में उपयोग किया जाता है। सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, भू-तापीय ऊर्जा मौसम की परिस्थितियों से स्वतंत्र होकर निरंतर (बेस-लोड) बिजली उपलब्ध कराती है।

India's First Deep Geothermal Wells at Puga Valley

पुगा परियोजना का महत्व:

      • पुगा घाटी परियोजना भारत की पहली प्रदर्शन-स्तरीय भू-तापीय विद्युत परियोजना है। इंजीनियरों ने 400 मीटर की गहराई पर लगभग 135°C तापमान दर्ज किया, जो भू-तापीय ऊर्जा की आशाजनक संभावनाओं को दर्शाता है। इस परियोजना से भू-तापीय जलाशयों के मूल्यांकन, व्यावसायिक भू-तापीय अन्वेषण तथा उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ड्रिलिंग की स्वदेशी विशेषज्ञता के विकास में सहायता मिलने की उम्मीद है।
      • यह पहल लद्दाख की ऊर्जा सुरक्षा को भी सुदृढ़ करती है, डीज़ल आधारित बिजली उत्पादन पर निर्भरता कम करती है तथा लद्दाख को कार्बन-न्यूट्रल क्षेत्र बनाने की परिकल्पना को समर्थन देती है।

भू-तापीय ऊर्जा के लाभ:

      • ऊर्जा का नवीकरणीय एवं सतत स्रोत।
      • जीवाश्म ईंधनों की तुलना में ग्रीनहाउस गैसों का कम उत्सर्जन।
      • 24×7 निर्बाध बिजली उपलब्ध कराती है।
      • अन्य अनेक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की तुलना में अपेक्षाकृत कम भूमि की आवश्यकता होती है।
      • लद्दाख जैसे दूरस्थ एवं पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त।

चुनौतियाँ:

अपने लाभों के बावजूद, भू-तापीय ऊर्जा के समक्ष कई चुनौतियाँ हैं:

      • अन्वेषण एवं ड्रिलिंग की उच्च लागत।
      • आर्थिक रूप से व्यवहार्य भू-तापीय जलाशयों की सीमित उपलब्धता।
      • कठिन भू-भाग और अत्यधिक जलवायु परिस्थितियों के कारण तकनीकी चुनौतियाँ।
      • उन्नत ड्रिलिंग तकनीक और कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता।

आगे की राह:

भारत को भू-तापीय संसाधनों के मानचित्रण में तेजी लानी चाहिए, सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए, भू-तापीय ऊर्जा के लिए समर्पित नीतियाँ विकसित करनी चाहिए तथा ड्रिलिंग तकनीकों में अनुसंधान को प्रोत्साहित करना चाहिए। सौर और पवन ऊर्जा के साथ भू-तापीय ऊर्जा का एकीकरण ऊर्जा की विश्वसनीयता बढ़ा सकता है और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला सकता है।

निष्कर्ष:

पुगा घाटी में भारत के पहले गहरे भू-तापीय कुओं का शुभारंभ देश की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। बिजली उत्पादन से आगे बढ़कर यह परियोजना भारत की तकनीकी क्षमता को प्रदर्शित करती है, ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करती है तथा सतत विकास में योगदान देती है। यदि इसे सफलतापूर्वक बड़े पैमाने पर विकसित किया गया, तो भू-तापीय ऊर्जा भारत की नवीकरणीय ऊर्जा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण घटक बन सकती है और देश के दीर्घकालिक जलवायु एवं ऊर्जा लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

 

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