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Blog / 29 Aug 2026

भारत-अमेरिका जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल डील: ₹292 करोड़ का समझौता

संदर्भ:

हाल ही में भारत और अमेरिका ने भारतीय सेना के लिए 292 करोड़ रुपये ($45 मिलियन) के 'जैवलिन' एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) समझौते को अंतिम रूप दिया है। भारतीय सेना ने अमेरिकी विदेशी सैन्य बिक्री (FMS) प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव और स्वीकृति पत्र (LOA) पर हस्ताक्षर किए। अमेरिका ने इस समझौते को दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया है तथा इसे भविष्य में सह-उत्पादन (Co-production) और रक्षा औद्योगिक सहयोग के अवसरों से जोड़ा है।  

जावेलिन मिसाइल क्या है?

      • FGM-148 जैवलिन, अमेरिका द्वारा विकसित एक मैन-पोर्टेबल, शोल्डर-लॉन्च्ड, फायर-एंड-फॉरगेट एंटी-टैंक मिसाइल प्रणाली है। इसे मुख्य रूप से टैंक, बख्तरबंद वाहनों तथा अन्य संरक्षित लक्ष्यों को नष्ट करने के लिए बनाया गया है। इसका प्रमुख गुण यह है कि प्रक्षेपण के बाद ऑपरेटर को लगातार लक्ष्य पर मिसाइल निर्देशित करने की आवश्यकता नहीं होती।
      • जावेलिन में इन्फ्रारेड सीकर का उपयोग होता है और यह टॉप-अटैक और डायरेक्ट-अटैक दोनों मोड में लक्ष्य पर प्रहार कर सकती है। टॉप-अटैक मोड में मिसाइल बख्तरबंद वाहन के अपेक्षाकृत कमजोर ऊपरी हिस्से को निशाना बनाती है, जिससे आधुनिक टैंकों के विरुद्ध इसकी प्रभावशीलता बढ़ जाती है।  

भारत-अमेरिका जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल डील

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

      • भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं के संदर्भ में जावेलिन की खरीद विशेष महत्व रखती है। पर्वतीय और दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्रों में हल्की तथा पोर्टेबल एंटी-टैंक प्रणाली पैदल सैनिकों की युद्धक क्षमता बढ़ा सकती है। विशेष रूप से चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर बदलती सैन्य परिस्थितियों के बीच आधुनिक कवच-रोधी क्षमता (anti-armour capability) भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण है।
      • पिछले वर्ष हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद पैदा हुई रणनीतिक परिस्थितियों और उत्तरी सीमाओं पर बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए इस आपातकालीन सौदे को अंतिम रूप दिया गया है। समझौते के शुरुआती चरण में भारतीय सेना को लगभग 60 जैवलिन मिसाइल राउंड और 16 से 25 लाइटवेट लॉन्च यूनिट्स प्राप्त होंगी। इन हथियारों की पहली खेप वर्ष 2026-27 के अंत तक भारत पहुंचने की उम्मीद है, जिससे अग्रिम मोर्चे पर तैनात इन्फैंट्री (पैदल सेना) की मारक क्षमता में वृद्धि होगी।

भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों में नया चरण:

जावेलिन समझौता केवल हथियार खरीद तक सीमित नहीं है। इससे दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच भविष्य के सहयोग और सह-उत्पादन के अवसर खुल सकते हैं। यह भारत की मेक इन इंडियाऔर आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की प्राथमिकताओं के अनुरूप महत्वपूर्ण संभावना है। हालाँकि, वास्तविक सह-उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, विशेषकर मिसाइल के अत्याधुनिक सीकर टेक्नोलॉजी, महत्वपूर्ण चुनौती रहेगा। पूर्व में जावेलिन के भारत में सह-उत्पादन की संभावनाओं पर चर्चा हुई थी, लेकिन तकनीकी हस्तांतरण से संबंधित मुद्दों के कारण इसे आगे बढ़ाने में बाधाएँ रही हैं।

रणनीतिक महत्व:

      • अमेरिकी जैवलिन मिसाइल तकनीक का भारतीय सेना में शामिल होना न केवल भारत की रक्षा तैयारियों को अभेद्य बनाएगा, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने में भी मददगार साबित होगा। यह रणनीतिक रक्षा सौदा ऐसे समय में हुआ है जब हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखना दोनों देशों की साझा प्राथमिकता बन चुका है।
      • जावेलिन सौदा भारत की बहु-स्रोत रक्षा खरीद नीति को भी दर्शाता है। भारत एक ओर स्वदेशी प्रणालियों के विकास पर जोर दे रहा है, वहीं दूसरी ओर तात्कालिक परिचालन आवश्यकताओं के लिए उन्नत विदेशी प्रणालियों की खरीद भी कर रहा है। इससे तत्काल क्षमता वृद्धि और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन बनाने की चुनौती सामने आती है।

निष्कर्ष:

भारत अब जैवलिन का उपयोग करने वाले चुनिंदा वैश्विक देशों के क्लब में शामिल हो गया है, जो वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती सैन्य और कूटनीतिक शक्ति को दर्शाता है। जावेलिन की खरीद भारतीय सेना की एंटी-आर्मर क्षमता को मजबूत करने के साथ-साथ भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी को क्रेता-विक्रेता संबंधसे आगे बढ़ाकर टेक्नोलॉजी, औद्योगिक सहयोग और सह-उत्पादन की दिशा में ले जाने का अवसर प्रदान करती है।

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