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Blog / 27 Feb 2026

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की पूर्ण सदस्यता के लिए भारत का प्रयास

संदर्भ:

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की पेरिस में आयोजित मंत्रीस्तरीय बैठक में भारत द्वारा पूर्ण सदस्यता के लिए किए गए औपचारिक अनुरोध पर हुई प्रगति को स्वीकार किया गया। यह वैश्विक ऊर्जा शासन के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण विकास है। भारत वर्ष 2017 से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का सहयोगी (एसोसिएट) सदस्य रहा है और अब निर्णयनिर्माण प्रक्रिया में अधिक प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पूर्ण सदस्यता प्राप्त करना चाहता है।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के बारे में:

      • स्थापना: अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की स्थापना वर्ष 1973 के वैश्विक तेल संकट के बाद वर्ष 1974 में की गई थी, ताकि भविष्य में ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े संकटों से सामूहिक रूप से निपटा जा सके।
      • उद्देश्य: प्रारंभिक उद्देश्य प्रमुख उपभोक्ता देशों के बीच तेल आपूर्ति की सुरक्षा, भंडारण और आपातकालीन समन्वय सुनिश्चित करना था। समय के साथ इसका कार्यक्षेत्र विस्तृत हुआ और अब यह ऊर्जा संक्रमण, जलवायु परिवर्तन शमन, नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता तथा महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति जैसे विषयों पर भी सक्रिय भूमिका निभाती है।
      • सदस्यता ढांचा: शुरुआत में इसकी पूर्ण सदस्यता केवल आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के सदस्य देशों तक सीमित थी, जिससे यह मुख्यतः विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह माना जाता रहा।
      • एसोसिएट सदस्यता: वर्ष 2015 से गैर- आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) देशों के लिए सहयोगी (एसोसिएट) सदस्यता की व्यवस्था शुरू की गई। इसके तहत भारत जैसे देश संगठन की गतिविधियों में भाग ले सकते हैं, लेकिन उन्हें पूर्ण सदस्य के समान मतदान अधिकार प्राप्त नहीं होते।

India Seeks Full Membership of the International Energy Agency (IEA)

चुनौतियाँ:

भारत के पूर्ण सदस्य बनने के प्रयास के समक्ष कुछ प्रमुख कानूनी और संस्थागत बाधाएँ हैं:

      • OECD सदस्यता की अनिवार्यता: अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के संस्थापक समझौतेअंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कार्यक्रम समझौता (IEPA)” के अनुसार पूर्ण सदस्यता केवल OECD सदस्य देशों को ही प्रदान की जा सकती है। चूँकि भारत OECD का सदस्य नहीं है और निकट भविष्य में उसमें शामिल होने की योजना भी नहीं है, इसलिए वर्तमान नियमों के तहत वह स्वतः पूर्ण सदस्य नहीं बन सकता।

इस स्थिति में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के सामने दो विकल्प हैं:

      • अपने संस्थापक समझौते में संशोधन कर OECD से बाहर के देशों को भी पात्रता देना या
      • भारत और ब्राज़ील जैसे अन्य देशों को विशेष अपवाद के रूप में पूर्ण सदस्यता प्रदान करना।

इन दोनों विकल्पों के लिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के वर्तमान सदस्य देशों की सर्वसम्मति आवश्यक होगी, जिससे यह प्रक्रिया कानूनी और राजनीतिक रूप से जटिल बन जाती है।

संस्थागत और भू-राजनीतिक पहलू:

      • संस्थागत पहचान: अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी को पारंपरिक रूप से विकसित अर्थव्यवस्थाओं के उपभोक्ता देशों के समूह के रूप में देखा जाता रहा है। पूर्ण सदस्यता का विस्तार इस पहचान को बदल सकता है और निर्णयनिर्माण के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
      • भू-राजनीतिक आयाम: भारत और ब्राज़ील जैसे वैश्विक दक्षिण के प्रमुख देशों को शामिल करना बहुध्रुवीय ऊर्जा व्यवस्था की ओर परिवर्तन का संकेत देता है। कुछ मौजूदा सदस्य इसे विकसित देशों के प्रभाव में कमी के रूप में देख सकते हैं, इसलिए इस विषय में संतुलित कूटनीति आवश्यक होगी।

भारत की संभावित पूर्ण सदस्यता का महत्व:

      • यदि भारत सहयोगी सदस्य सदस्य से पूर्ण सदस्य बनता है, तो इसके व्यापक प्रभाव होंगे:
        • ऊर्जा शासन: वैश्विक ऊर्जा नीतियों और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र के निर्माण में भारत की भूमिका और प्रभाव बढ़ेगा।
        • वैश्विक ऊर्जा संक्रमण: डीकार्बोनाइजेशन, स्वच्छ ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और मजबूत होगा।
        • भू-राजनीतिक प्रभाव: भारत विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच ऊर्जा संवाद में एक सेतु की भूमिका और प्रभावी ढंग से निभा सकेगा।
      • यह विकास वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में हो रहे बदलाव को दर्शाता है, जहाँ गैर-OECD देश अब वैश्विक ऊर्जा मांग और प्रभाव का बड़ा हिस्सा रखते हैं।

निष्कर्ष:

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की पूर्ण सदस्यता के लिए भारत का प्रयास केवल सदस्यता प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक संस्थागत ढांचे में सुधार और उसे समकालीन ऊर्जा वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने का प्रयास भी है। यद्यपि इस दिशा में सकारात्मक संकेत मिले हैं, फिर भी OECD-आधारित सदस्यता की कानूनी शर्त और सर्वसम्मति की आवश्यकता प्रमुख चुनौतियाँ बनी हुई हैं। इसका परिणाम न केवल भारत की ऊर्जा कूटनीति को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भी निर्धारित करेगा कि बदलती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में वैश्विक ऊर्जा शासन किस प्रकार विकसित होता है।