संदर्भ:
केंद्रीय बजट 2026 में भारत सरकार ने लद्दाख में दो अत्याधुनिक दूरबीनों की स्थापना को मंज़ूरी दी है। इनमें नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप (एनएलएसटी) और नेशनल लार्ज ऑप्टिकल-नियर इन्फ्रारेड टेलिस्कोप (एनएलओटी) शामिल हैं। साथ ही मौजूदा हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप (HCT) के आधुनिकीकरण को भी स्वीकृति दी गई है। यह पहल भारत की प्रेक्षणीय खगोल विज्ञान क्षमता को वैश्विक स्तर पर मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप (एनएलएसटी) के बारे में:
नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप (एनएलएसटी) एक 2-मीटर अपर्चर वाली उन्नत सौर दूरबीन होगी, जिसे पैंगोंग त्सो के निकट मेराक (Merak) क्षेत्र में स्थापित किया जाएगा। यह दूरबीन ‘विजिबल’ (दृश्यमान) और ‘नियर-इंफ्रारेड’ (अवरक्त) तरंगदैर्घ्य में कार्य करेगी, जिससे सूर्य की सूक्ष्म संरचनाओं का विस्तृत अध्ययन संभव होगा।
महत्त्व:
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- सौर चुम्बकीय क्षेत्र और सौर गतिशील प्रक्रियाओं का गहन अध्ययन
- सौर ज्वालाओं और उच्च-ऊर्जा घटनाओं की सटीक निगरानी
- अंतरिक्ष मौसम का विश्लेषण, जो उपग्रहों, संचार प्रणालियों और अंतरिक्ष अभियानों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है
- भारत के अंतरिक्ष आधारित सौर मिशन आदित्य-L1 के पूरक के रूप में कार्य
- एनएलएसटी, कोडाइकनाल और उदयपुर के बाद भारत की तीसरी ज़मीनी सौर वेधशाला होगी। इसकी उच्च ऊँचाई वायुमंडलीय विकृति को कम करती है, जिससे सूर्य की अधिक स्पष्ट और उच्च-गुणवत्ता वाली छवियाँ प्राप्त होंगी।
- सौर चुम्बकीय क्षेत्र और सौर गतिशील प्रक्रियाओं का गहन अध्ययन
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नेशनल लार्ज ऑप्टिकल-नियर इन्फ्रारेड टेलिस्कोप (एनएलओटी) के बारे में:
नेशनल लार्ज ऑप्टिकल-नियर इन्फ्रारेड टेलिस्कोप (एनएलओटी) एक 13.7-मीटर व्यास की खंडित दर्पण वाली दूरबीन होगी। यह विश्व की सबसे बड़ी प्रकाशीय–अवरक्त दूरबीनों में से एक मानी जाएगी।
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- मुख्य विशेषताएँ:
- 90 षट्भुजाकार दर्पण खंड, जो मिलकर एक एकीकृत मुख्य दर्पण का निर्माण करेंगे
- हानले के उच्च, शीत और शुष्क वातावरण में स्थापना
- न्यूनतम वायुमंडलीय विवर्तन, जिससे अत्यंत तीक्ष्ण और स्पष्ट चित्र प्राप्त होंगे
- 90 षट्भुजाकार दर्पण खंड, जो मिलकर एक एकीकृत मुख्य दर्पण का निर्माण करेंगे
- अनुसंधान की संभावनाएँ:
- बाह्य ग्रहों की खोज और अध्ययन
- तारों तथा आकाशगंगाओं के विकास की प्रक्रिया का विश्लेषण
- सुपरनोवा और अन्य अस्थायी खगोलीय घटनाओं का अध्ययन
- ब्रह्मांड की उत्पत्ति और संरचना से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत
- थर्टी मीटर टेलीस्कोप परियोजना में भारत की भागीदारी ने ऐसी उन्नत प्रणालियों के निर्माण के लिए देश की तकनीकी विशेषज्ञता को और सुदृढ़ किया है।
- बाह्य ग्रहों की खोज और अध्ययन
- मुख्य विशेषताएँ:
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खगोल विज्ञान के लिए लद्दाख क्यों उपयुक्त है?
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- लगभग 4,500 मीटर की ऊँचाई
- पतला और अत्यंत शुष्क वायुमंडल
- न्यूनतम प्रकाश प्रदूषण
- डार्क स्काई रिज़र्व का दर्जा
- लगभग 4,500 मीटर की ऊँचाई
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ये सभी कारक वायुमंडलीय विकृति को कम करते हैं और प्रेक्षण की सटीकता बढ़ाते हैं। लद्दाख का हानले क्षेत्र पहले से ही भारतीय खगोलीय वेधशाला की मेज़बानी करता है तथा इसे भारत का पहला डार्क स्काई रिज़र्व घोषित किया गया है। यही कारण है कि यह क्षेत्र उच्च-स्तरीय खगोलीय अनुसंधान के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है।
रणनीतिक और वैज्ञानिक महत्त्व:
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- भारत को सौर भौतिकी और गहन अंतरिक्ष खगोल विज्ञान में अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित करना
- वैश्विक दक्षिण के वैज्ञानिक अनुसंधान में भारत की भूमिका को सशक्त बनाना
- भारतीय वैज्ञानिकों के लिए प्राथमिक प्रेक्षण समय सुनिश्चित करना
- उन्नत प्रकाशिकी और सूक्ष्म अभियांत्रिकी में स्वदेशी तकनीकी क्षमता को बढ़ावा देना
- बेहतर अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान के माध्यम से अंतरिक्ष सुरक्षा को मजबूत करना
- भारत को सौर भौतिकी और गहन अंतरिक्ष खगोल विज्ञान में अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित करना
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निष्कर्ष:
दो अत्याधुनिक दूरबीनों (एनएलएसटी और एनएलओटी) की स्थापना तथा वर्तमान (एचसीटी) के आधुनिकीकरण के साथ भारत के खगोलीय बुनियादी ढाँचे में एक ऐतिहासिक परिवर्तन हो रहा है। ये परियोजनाएँ न केवल सूर्य और ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को मजबूत करेंगी, बल्कि भारत की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता, वैश्विक प्रतिष्ठा और अंतरिक्ष विज्ञान में रणनीतिक क्षमता को भी नई दिशा देंगी। इन पहलों के परिणामस्वरूप लद्दाख को ज़मीनी खगोल विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सकेगा।

